मंगलवार, 18 सितंबर 2018

जीयते बेटवा हाल न पूछे, मरते पीपर पानी

जीयते बेटवा हाल न पूछे, मरते पीपर पानी

घर घर के इहे कहानी बा। जीयते बेटवा हाल न पूछे, मरते पीपर पानी। घर के बूढ़ पुरनिया जीयते भले एक गिलास पानी खातिर हाय हाय करीहें। पानी मिली की ना मिली इ परिजन की ऊपर बा। लेकिन ई बात सोरहो आना साँच बा कि मरला पर पीपर की पेंड़ पर घंट बाँध के पानी दिआई। राजनीति में भी कुछ अइसही चलत बा। काल की कपाल पर रोज लिखत मेटावत आपन कविता सुनावत राजनीति के चमकत नक्षत्र अटल बिहारी जी 2004 की बाद से ही हासिये पर धकियावत धकिआवत 2014 में भाजपा की बैनर पोस्टर से भी धकिया के बाहर क दिहल गईलें। एगो मदारी अईसन आइल की झूठ, प्रपंच की सहारे चार साल सत्ता चलवलसि। ओह बीच न अटल चाचा याद अइलन, न जोशी आडवाणी। कारण ई रहे कि 56 इंच के सीना वाला प्रधानमन्त्री देश की गद्दी पर बैठ गईल। 14 में जनता के ललचवलस धारा 370 कश्मीर से हटाईब। विदेश से काला धन स्वदेश लाइब। सबकी खाता में 15 लाख देईब। रामजी के मन्दिर बनवाईब। गो हत्या बन्द कराईब। देश में समान नागरिक संहिता ले आईब। 18 ले कुछ ना क पवलसि। येही बीचे भारत के महान सपूत 9 साल से बिस्तर पकडले पकडले आखिरकार बिस्तरवो छोड़ दिहलें। 16 अगस्त 18 के घोषणा हो गईल की अटल चाचा दुनिया छोड़ डीहलीं। अब शुरू भईल लाश आ राख के राजनीति। जवना अटल चाचा पर महंगाई के आरोप लगा के मनोज तिवारी गाना गावत रहलें- वाह रे अटल चाचा, पिअजुईआ अनार हो गईल। तेल पीके सरसों के, ई देशवा बेमार हो गईल। ओहि अटल चाचा की लाश पर राजनीति शुरू हो गईल। देश के ध्यान महंगाई औ भरष्टाचार से हटावे खातिर। आपन कईल वादा जवन पूरा ना भईल ओह से ध्यान हटावे खातिर अटल चाचा के अस्थि देश के सजो नदी में विसर्जित क के आंसू बहावल गईल। हद त तब भईल की सबकर पुण्यतिथि एक साल में मनावल जाला, अटल जी के मासिक पुण्य तिथि अटल काब्यञ्जलि की नाम से जगह जगह मनल। राजनीति ही ना, घर घर के इहे कहानी बा। एहिसे कहिलें-
जीयते बेटवा हाल न पूछे, मरते पीपर पानी।
राजनीती ही ना ये भाई। घर घर के इहे कहानी।।
जब ग्राफ लगल घटल। तब जपें अटल अटल।


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