मनबोध मास्टर पूछलें -बाबा! का हाल बा। बाबा बतवलें-हाल बहुते बेहाल बा। मलाल येह बात के बा की - "मंत्री - नेता, रोये-धोये, अफसर पर नहीं लगाम...। जनता बैठे माथा पीटे, सूझे न एको काम।।" यूपी में बड़ा कानाफुसी बा। साझे की सरकार में मंत्री भी लाचार हवें। जवना मंत्री का जनता की दुख दर्द पर भी दिल ना पसीजेला उहो मंत्री पुक्का फाड़ फाड़ रोवत हवें। मंत्री जी के आंसू गिल्सरिन लगा के ना निकरत रहे। उ घड़िआली आंसू भी ना रहे। उ बिरादरी के कष्ट देख के करेजा से निकलल हुक रहे। मंत्री जी की रोवला से बिरादरी ओतना दुखित ना भइल जेतना एम पी साहब, मंत्री की आंसू पर ठट्ठा मारत रहलेन। अब एम पी साहब के भी महादेव ही रक्षा करिहै। एम पी साहब का शायद पता ना होखे, उनकी क्षेत्र में जेतना बाभन-ठाकुर-बनिया ना बाड़न ओतना त मंत्री जी के बिरादरी वाला लोग बा। बिरादरी के लोग अपना मंत्री जी के भगवान अइसन मानेला। कबो पैर दबावेला, कबो आरती उतारेला। एमपी साहब, खिल्ली उड़ावत हवा त उड़ा ल, अबकी मंत्री के बिरादरी तोहार नाव डूबा के मानी। दिल्ली के राह छोड़ के फेरु मुंबई न जाएके पर जा। हरहर महादेव, बिरादरी में गुस्सा बहुत बा। अबकी बाबा भी ना बचा पईहें। मुंहे के जब्बर हो गईल बाड़s त अबकी फरिया जाई। मंत्री जी, इहो कहलेन कि कवनो अफसर हमार बतिये नईखे सुनत। अब मंत्री जी के कईसे समझावल जा कि भईया अपनी इहाँ खाली बाबा के चलेला।
एक जने दूसर मंत्री जी हवें। पुलिस विभाग के नौकरी छोड़ के सियासत के चस्का लागल त पार्टी ज्वाइन क लिहले। अगर विभाग में रहितन त येह समय सबसे बड़का पद पर रहितन। एडीजी, आई जी, डीआईजी सलाम ठोकतन। उनकी ईमानदार छवि के बहुत चर्चा रहल। राजनीति में भी समाज के कल्याण ईमानदारी से करे लन। एगो कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचल रहलें। हर मंत्री के प्रोटोकाल होला, लेकिन देखल गईल कि कार्यक्रम में डीएम के का कहल जा एगो कवनो एसडीएम भी ना पहुंचले। ईमानदार आ स्वछ छवि वाला मंत्री जी के स्वाभिमान जागल, कार्यक्रम छोड़ के चल दिहले। ठीके कहल गईल बा - आवत ही हरसे नहीं, नैनन नहीं स्नेह। तुलसी वहाँ ना जाईये, कंचन बरसत मेह।
फेरू मिलब अगिला हफ्ते, पढ़ल करीं रफ्ते रफ्ते..
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