मनबोध मास्टर पूछलें -बाबा का हाल बा? बाबा बतवलें -हाल बड़ा बेहाल बा। कहीं स्कूल में सुखार बा, कहीं स्कूल में बहार बा। गार्जियन लाचार बा। जेकरा दु चार ठे छोट बच्चा होवे ओकर बंटा ढार बा। सरकारी स्कूल में सब फ्री बा, कॉपी -किताब, कपड़ा लत्ता, भोजन पताई लेकिन एगो चीज नईखे, जवना के नाम ह पढाई। अगर साचो सरकारी स्कूल में पढ़ाई रहित त ओही सरकारी स्कूल के मास्स साहब अपनी बेटवा के प्राइवेटवा में दाखिला ना करइतन। लोग कहता कि सरकारी स्कूल की मास्टर से लाख रुपया पगार बा। अरे भाई इहो त देखीं उनकी लगे हजार को सरकारी काम बा। जब सरकार चाहें जहां नाध दे। प्राइवेट के हाल उ बा जेईसे बड़े बड़े माॉल। एक ही छत के नीचे कई प्रकार के ब्यापार। अपनी बच्चा के दाखिला कराई, सीधे कल्लटर बना के छोड़िहे। बारहों महीना एडमिशन ओपेन बा। नाम लिखवाई। कई हजार के कॉपी किताब ले जाई। कई हजार के ड्रेस ले जाईं। जूता मोजा, टाई सब ओहिजा बिकाई। गनीमत बा अबे रेस्टोरेंट नईखे खुलल ना त बबुआ के टिफिन भी घर से ना जाइत। घर से बस आई जाई। लईका ले आईं सीधे कल्लटर बनायीं। हाइस्कूल फेल स्कूल की निदेशक की येह मॉल पर पांच हजार पगार के नौकर रउरी लेडिकन के एकदम पढा लिखा के टंच क दिहे। कुछ कमी बेसी होई त घरही ट्यूशन लगवा दीं।
सरकार लगातार शिक्षा में सुधार के झाल बजावत बा। मुफ्त शिक्षा के व्यवस्था बा। सरकारी स्कूल में योग्य शिक्षक बाड़न। लाख रुपया से ऊपर पगार बा, लेकिन पढ़ाई अइसन की गाँव गाँव में खुलल सरकारी स्कूल में उहे लड़िका पढ़े जात हवें जेकर माई -बाबू गरीब बाड़न। बाकी ज्यादातर सामान्य परिवार के लड़िका त प्राइवेट में ही पढ़ता। सरकार के येह प्राइवेट स्कूल पर कवनो नियंत्रण नईखे। अधिकारी से लेके नेता तक सबकी जेब में कुछ न कुछ लाभान्स जाता। अख़बार के भी पेट भरता, खूब विज्ञापन छपत बा। सालोसाल त मॉल से माल मिलते बा। पंद्रह अगस्त आ छब्बीस जनवरी के विशेष रूप से पत्रकार लोग भी बहत गंगा में हाथ धोवत हवें।