मनबोध मास्टर पूछलें बाबा! का हाल बा? बाबा बतवलें - हाल त बड़ा बेहाल बा। अइसन डेंजर बाजा के प्रचलन बढ़ल की मुर्गी होखे चाहें मनई, यह बाजा से मर जालें लेकिन सरकार यह पर रोक आज तक ना लगवलसि। अखिलेश भईया के सरकार रहे चाहें योगी बाबा के। इ बाजा बाजी त बाजी। कान फाडू संगीत से दहलत करेजा काम कईल बंद क दे त बंद क दे लेकिन बाजा ना बंद होई। सुने में आईल येही डेंजर बाजा जवना के डीजे कहल जाता ओकर आवाज़ 140 मुर्गी ना बर्दाश्त क पवली। संगीत की ऐके धुन में सदा के लिए सुत गईलीं। मुर्गी रहली त मरलो पर उनकर मांस कामे आ गईल। कुछ बरात में कुछ होटल में कमे दाम में खपत हो गईल। आदमी के मांस त कवनो कामे भी ना आई। मुर्गा समाज ही ना मनई समाज के लिए भी इ दिन याद रखल जाई। कमजोर करेजा पर धक्क धक्क लागे वाला इ डीजे बहुत लोकप्रिय भी ह। अब त एकरा आभाव में दुर्गा जी, सरस्वती जी, गणेश जी के विदाई भी सुन लागत बा। तिलक, बरात, परछावन ही ना मटकोड़वा में भी डी जे बाजत बा। लोग के करेजा पर हाथोंड़ी जैसे चोट करे चाहें घन जईसे, जिम्मेदारन की कान में आवाज़ ना जाई। बड़की अदालत भी तेज बजावला पर रोक लगवले बा। लेकिन वाह रे सरकार! ओकरा त डीजे के अवजिये ना सुनाई देत बा, हाँ महजिदे के लाउडस्पीकर से तेज आवाज़ वाला डीजे काहें नईखे सरकार का सुनात? मुर्गा मुर्गी का त मरहि के बा चाहे बाजा से मरें चाहे बिरियानी बन के मरें, लेकिन मनई पर त दया दिखाई। बुढ़ बीमार मनई के डीजे से करेजा हिला के जनि मारी। अइसन घटिया आ कलंकित बाजा पर पूरा रोक लगाई। फेरु मिलब अगिला हफ्ते, पढ़ल करीं रफ्ते रफ्ते...
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