रविवार, 31 मई 2026

31 मई 2026 की अंक में प्रकाशित

मास्टर की माथे पर भूसा भरल बोरा 
मनबोध मास्टर पूछलें -बाबा! का हाल बा? बाबा बतवलें -हाल त बेहाल बा। बड़ा बवाल बा। पहिले बरेली की बाजार में झुमका गिरत रहे, अब मास्टर साहब की कपारे की बोरा से भूसा झरत बा। उहे मास्स साहब जवन ज्ञान के गंठरी  राखत रहलें, आ हम्मन के लरिकाई में कहें कि -तोरे दिमाग़ में भूसा भरल बा। ज्ञान के गंठरी बहुत ढोवलें। अब भूसा ढोवत बाड़न। कहल जात रहे मास्टरे के नोकरी राजा के नोकरी ह। अब इ सजा के नोकरी हो गईल। अब रिटायर के उमिर आईल त कहल जाता टीईटी पास करा। सरकार एगो परीक्षा त सुबहित कराई नइखे पावत, पेपरे लिक हो जाता। ऊपर से लइका हो हल्ला करत हवें त पुलिस वाला कहत हवें भविष्य खराब क देईब। अरे भईया जवन पेपरवा लिक करत हवें सब उनहन के भविष्य ठीक करा।
मास्टर अइसन जीव हो गइल बाड़न कि सरकार के जहां मन करे ओही लगा द-मंदिर के न मजार के, भूसा की बजार के। पूरा भीखमंगई के दशा हो गईल बा। गर्मी के छुट्टी भइल त सोचलें मनाली घूम आईं तनि मनफेवट हो जाई। आखिर त सालो साल आटा-दाल-चावल के हिसाब करहि के बा, चाहें घर के होखे चाहे स्कूल के। ऊपर से मास्टर की जिम्मे एतना काम की जेतना ज्ञान के गंठरी नईखे ओहसे कई गुना दूसरे विभाग के फाईल के गंठरी ढोवेके परेला। बाल गणना, मकान गणना, वोटर गणना, एस आई आर, जनगणना... आदि आदि बहुत गणना की बाद अब भूसा के भीखमंगई। 
भीनहि-भीनहि बोरा उठाईं आ दुआरे दुआरे जाईं। कुछ सरकारी गो सेवा के पुन्य कमाईं। गाँव में कम होत चौपाया, नदारद होत खूंटा आ खोप, ढहत घारी- घोठा- बहरघरा आ बनत कोठ- कटरा की युग में दुआरे से उजरत नाद के चरन। चुउवा रखले ही केतना लोग बा? बैल त हईये नईखे। गाय जेकरा बा, उ कुंतल की भाव से भूसा खरीद के धइले बा, उ दान देई की अपने गाय के खिआई। खीअवले की दुखे त जब जब गईया बाछा दिहलसि बिसुकते बछरु हंका गईले। पहिले कसाई काट के हजम करत रहलें त एतना छुट्टा बछरु ना लउकत रहलें। अब सरकार उनके रहे, खाये, पिये के बंदोबस्त कईलस त ज्यादातर गो शाला में "राज" भोगत हवें आ कुछ चट्टी चौराहा पर मुंह मारत लट्ठ खात हवें। सब मशीनी युग के प्रभाव बा, ना त खेती आ पशुपालन एक दूसरे के सहयोगी रहल त हजार में एगो कवनो बड़मनई होखें जवन अपनी बच्छा के सांड दाग़ के छोड़ दें। बाकी लोग बैल बना के जोतत रहे। तब बछरु के क़ीमत रहे अब बछरु बेकार बा, लाचार बा। जेकरी नियत में घूंट घूंट के मरे के लिखल बा। चाहें गौतस्कर की हाथे कत्लखाना जाके मरे चाहें गो आश्रय केंद्र की चाहरदिवारी में छटपटा-छटपटा के मरे। जेसीबी आई, खोनाई आ दफनाई। इहे बछरु की जीवन के सच्चाई बा। मास्टर साहब लोग से भूसा जुटावल भले कवनो बीएसए के फरमान होखे की भूसादान में योगदान भी एगो पुन्य काम ह। हो सकेला उ बीएसए धरमात्मा होंखे, हमरे इहाँ त बीएसए पर पच्चीस हजार के ईनाम बा आ ओके पकड़े में पुलिस विभाग के टंगरी काँपत बा। 
फेरु मिलब अगिला हफ्ते, पढ़ल करीँ रफ्ते-रफ्ते..

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