शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

कुंभ में अमृत झरत रहे..

 
कुंभ। अमृत से परिपूर्ण कुंभ। हरिद्वार, प्रयाग, पंचवटी आ उज्जैन में हर बारह साल बाद लगे वाला कुंभ। समुद्र मंथन से निकले वाला कुंभ। बैकुंठ के समतुल्य पवित्र कुंभ। क्षीरसागर के देव-दानव की साझा मंथन से निकरल कुंभ। धंवंतरीरूपधारी भगवान विष्णु की हाथ में शोभायमान कुंभ। बहुत महिमा ह कुंभ के। कुंभ की येही महिमा की बीच प्रयाग में लगेवाला 2013 के कुंभ बहुत कुछ छोड़ गइल-सोचे, विचारे आ बतकही खातिर। मनबोध मास्टर त ‘ मन चंगा त कठवति में गंगा ’ की विचार धारा के पोषक हवें। कबीर बाबा के पंक्ति- ‘ जल में कुंभ, कुंभ में पानी.., यह तथ कथौ ज्ञयानी’। दुहरावत रहें। भीड़, भगदड़ आ भेड़ियाधंसान से बहुत दूर रहे वाला मनबोध मास्टर आज मगन ना गमगीन हवें। गम के कारण बा कुंभ हादसा। बहुत खुरपेचला पर बोल पड़लें- जेकरा मन में बहुत दिन से कुंभ नहइला के लालसा रहल उहे न प्रयाग गइल। कुंभ नहइला के पुन्य कमइला के होड़ मौनी अमावस्या के सबसे अधिक रहल। कुंभ में अमृत झरत रहे। अमृत से नहइला की बादो लोग काहे मरत रहे? पुन्य केतना मिलल, येह सांसारी आंखि से ना लउकी। जवन लउकल तवन त बहुत दुखदायी रहे। कुंभ की अमृत खातिर राहु आपन शीश कटा दिहले रहे, लोग अमृत में नहइला की बादे अपना घरे जल्दी लौटला की चक्कर में जान गंवा दिहल। कुंभ की पुन्य की चक्कर में केहू आपन माई गवां के रोवत बा, केहू भाई गवां के रोवत बा। केहू के जीवनसाथी बीच मझधार में ही साथ छोड़ के चलि गइल, सदा खातिर बिछड़ गइल। बहस जारी बा। केकर जिम्मेदारी बा। प्रदेश सरकार केंद्र वाली रेल व्यवस्था पर त केंद्र प्रदेशवाली प्रशासनिक मशीनरी पर कुंभ हादसा के ठीकरा फोरत बा। हादसा में मोक्ष पवले लोग के समय पर पचास रूपया के कफन भले नसीब ना भइल। सरकारी घोषणा में परिजन लोग सात लाख पइहें। सरकार सात लाख दे या सत्रह लाख। जे चलि गइल, उ ना लौटी। जायेके त सबका बा। दुनिया के रीति ह- ‘ आया है सो जायेगा, राजा रंक फकीर..’। असो के कुंभ एक बात साफ क दिहलसि। धरती पर धरम अबहिन जिंदा बा। अइसने धरम-करम की बल पर धरती टिकल बा। तीन करोड़ धार्मिक लोगन के प्रयाग की धरती पर संगम भइल। अगर सात्विकता ना रहित, धार्मिक प्रवृत्ति ना रहित त काहें लोग कुंभ नहाये जाइत। उम्मीद से अधिक आस्था जागल रहे। सरकारी ताम-झाम भले बहुत रहे, इंतजाम कम रहे। एतवत बड़वर आयोजन में कुछ बात के सावधानी भी जरूरी बा। पुन्य कमइला की बाद, घरे लौटला के जल्दी ना रहे के चाहीं। भेड़ियाधंसान प्रवृत्ति से भी बचे के चाहीं। आस्था के एतना बड़वर सैलाब के कंट्रोल ना कवनो सरकार क सकेले ना कवनो व्यवस्था। कुंभ में मोक्ष पवले लोग की प्रति आपन श्रद्धा प्रस्तुत करत बस इहे कविता-
कुंभ में अमृत झरत रहे, नहइला की बाद भी लोग मरत रहे।
 जे मरल मोक्ष पा गइल, परिजन की आंख से आंसू ढरत रहे।।
एतवत बड़वर भीड़ के संभालल, आसान ना रहल।
व्यवस्था में लागल लोग इंसान रहल, भगवान ना रहल।।
 जे आइल बा, जइबे करी, जन्म की बाद मृत्यु के अवस्था ह।
पचास रुपया के कफन ना मिलल, अब मिली सात लाख इ व्यवस्था ह।।
 
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य 14/2/13 को प्रकाशित है .

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