सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

आज है धनतेरस

कुबेर, यम व धन्वंतरि के पूजन की त्रयोदशी


कात्तिर्क कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानी तीन देवों के पूजन की तिथि। आज के दिन धन के देवता कुबेर , मृत्यु के देवता यमराज व सेहत के देवता धन्वंतरि का पूजन किया जाता है। इस वर्ष यह महापर्व 24 अक्टूबर को पड़ रहा है। कात्तिर्क कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को पारंपरिक रूप से धनतेरस कहा जाता है। इस तिथि का महत्व इस लिए है कि आज ही के दिन देवताओं के वैद्य ऋषि धन्वंतरिअमृत कलश के साथ सागर मंथन से प्रकट हुए थे। तभी से इस तिथि को धन्वंतरि जयंती मनायी जाती है। सेहत के देवता को विशेष रूप से वैद्य-हकीम मनाते हैं। स्वस्थ्य सेहत और निरोग काया की इच्छा भला किसमें नहीं होती। इस लिए भी धन्वंतरि की पूजा की जाती है। इस धरती पर धन की इच्छा भला किसमें नहीं होती। कहा गया है अर्थ बिना दुनिया व्यर्थ। कुबेर धन के देवता हैं। धनतेरस के दिन कुबेर की पूजा के लिए दीप दान करते हैं। यह कामना करते हैं कि मेरे घर में धन की वष्रा हो। इस दिन चांदी खरीदने की परंपरा है । इसके पीछे यह कारण बताया जाता है कि चांदी चंद्रमा का प्रतीक है। यह शीतलता भी प्रदान करता है। मान्यता है कि चांदी खरीदने से संतोष रूपी धन का भी हृदय में वास होता है। त्रयोदशी के दिन यम की भी पूजा की जाती है। इस पूजन में घर से दक्षिण दिशा में यम का दीप(जम्हु के दीया)जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि यम दीप जलाने से घर में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती। इस संबंध में एक लोक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि किसी समय में हेम नाम के एक राजा हुए। उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योतिषियों ने राजकुमार की कुंडली देखकर बताया कि जब इसका विवाह होगा तो चार दिन बाद मृत्यु हो जायेगी। राजा ने राजकुमार को ऐसी जगह भेजवा दिया जहां किसी स्त्री की परछायीं भी राजकुमार को देखने को न मिले। दैव योग से जहां राजकुमार रहता था, एक दिन उधर से एक राजकुमारी आ गई। दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये। राजकुमार ने उसके साथ गंधर्व विवाह कर लिया। विवाह के चार दिन बाद ही यम के दूत उसके प्राण हरने पहुंच गये। नवविवाहिता विलाप करने लगी। उसके करुण कंद्रन से एक यमदूत भावुक हो गया। उसने हिम्मत करके यमराज से कहा कि क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है कि किसी की अकाल मृत्यु न हो। यमदूत के बिनीत भाव को सुनकर यमराज ने कहा कि कात्तिर्क कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन जिस परिवार में मेरे नाम की दीपमाला दक्षिण दिशा को जलेगी उसके घर किसी की अकाल मृत्यु नहीं होगी। कहा जाता है कि उस दिन भी त्रयोदशी थी, जिस दिन यमदूत राजकुमार के प्राण हरने गये थे। यम दूत के बताने के अनुसार नवविवाहिता ने यम दीप जलाया और यमराज की आज्ञा से उसके प्राण छोड़ दिये। कात्तिर्क कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन यम, कुबेर व धन्वंतरि का पूजन किया जाता है। धनतेरस के दिन चांदी के अलावा बर्तन भी खरीदने की परंपरा है।
नर्वदेश्वर  पांडेय देहाती का यह लेख राष्ट्रीय सहारा में २४ -१०-११ को प्रकाशित है .

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

आंचल में बा लाश, झरे आंखिन से पानी.।

आंचल में बा लाश, झरे आंखिन से पानी.।
पौराणिक काल में बहुत राक्षसन के नाम सुनले होखब सभे। येह समय बीमारी के रूप में डोढ़ी, ताड़का, जम्हु, नरकासुर, कालीनाग, बकासुर..आदि के सम्मलित अवतार भइल बा। नाव बा- जेई, इंसेफेलाइटिस,नवकी बीमारी, जापानी बुखार। इ राक्षस केतना माई-बहिनिन की गोद के लाल खा-चबा गइल। केतना कुल के दीपक कुल-परिवार के रोशन कइला की पहिले ही बुझ गइलें। कवनो अइसन दिन ना बा जवना दिने येह बीमारी से पांच-छह गो लरिका ना मरत हवें। आजादी मिलले 64 साल भइल, लेकिन 32 साल से इ बीमारी भी आजाद हो गइल बा। पहिले की जमाना में हैजा, प्लेग, तावन आवत रहे। आज की समय में जापानी बुखार, नवकी बेमारी। बीमारी की वजह से कविता के लाइन बदल गइल- पूर्वाचल की माई बहिनिन के इहे कहानी। आंचल में बा लाश, झरे आंखिन से पानी.। पूर्वाचल में इ बीमारी भले महामारी के रूप ध लेले बा, माई-बहिन लोग की आंखि से पानी भले झरत हवे, लेकिन सरकार आ लालफीताशाही चदरा तान के सुतल बा। जगला की नाम पर जागल हवें शहर के सांसद आ विधायक। मंगर की दिने बाबा व्यापक जनजागरुकता अभियान चलवलें। मेडिकल कालेज से लेके कमिश्नरी तक पदयात्रा कइलन। बड़ा समर्थन मिलल। बात त संसद अउर विधान सभा में भी दमदारी से उठे के चाहीं, कुछ उठलो बा। सड़क पर बात उठवला के लोग ‘ पर-दर्शन ’ कहत हवें। मेडिकल कालेज से कमिश्नरी आठ किलोमीटर पैदल यात्रा में संसद आ विधायक की साथ कुछ जागरुक लोग जगावत कमिश्नरी ले आ गइलें। एक किलोमीटर लंबा लोगन के भीड़ रहे। जब ज्ञापन दिहला के बेरा आइल, त दुनो जने के इगो टकराइल। आठ किलोमीटर बाबा चलि के अइलें लेकिन दस कदम भीतर ना गइलें। कमिश्नर भी दस कदम बाहर ना अइलें। कमिश्नर साहब कहलें- दफ्तर से बहरा निकर के ज्ञापन ना लेइब। योगी बाबा कहलें-हम अकेले ना हई, हजारन मनई साथ हवें। दफ्तर में एतना मनई कहां समइहें। सही कहल गइल बा- ‘ घर के योगी योग-ना, आन गांव के सिद्ध’। बीमारी के मुद्दा पीछे, आ भीतर गइला बाहर अइला के मुद्दा आगे हो गइल। अंत में संत का सुझल बीच के राह। ज्ञापन नोटिस बोर्ड पर ही चस्पा करि के चल दिहलें। लोकतंत्र आ लालफीताशाही की कड़वाहट में कुछ कड़वी कविता-
आपन आंखि तरेर के, कहे जापानी बुखार। कुलदीपकों को खाउंगा, एक-एक को मार।।
मेडिकल में आकर के नित, क्यों फंसते इंसान। लाश रोज ही छोड़ता, हर लेता है प्रान।।
कितने कुल दीपक बुझे, कितनी कोख बीरान। साफ-सफाई हवा हवाई,पहुंच रहे श्मशान।।
मां की ममता रो रही,गिरते पिता पछाड़। दुख की दरिया बह रही, दिया कलेजा फाड़।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय  सहारा के २० -१०-११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

गांवन में धरकोसवा घूमें, शहर में लागे जाम वोट बदे प्रत्याशी घूमें, पांचों वखत सलाम


बाबा बहुत चिंतित हवें। जब चिंता के कारण पूछल गइल त कहलें- का बताईं , गांवन में धरकोसवा के बहुते हल्ला बा। हितई-नतई रात-बिरात गइला में नाहके लोग पिटा जात हवें। संतकबीरनगर में ऊंखि की खेत में प्रेमी युगल बोरा बिछा के इलू-इलू करत रहलें, गांव वाला धरकोसवा कहि के धुन दिहलें। देवरिया में एक जने मरद-मेहरारू स्टेशन से उतर के पैदले सढ़ुआने के राहि धइलें, अंजोरिया रात में गांव की सिवाने पर पहुंचलें, तवले गांववाला लाठी डंडा लेके बटुर गइलें। धरकोसवा-धरकोसवा कहि के धुने लगलें। उ चिचियाते रह गइलें हम फलनवां के मउसा हई, हई मउसी हई.। सबसे खराब हालत बेलोरो वालन के बा। कवनो गांव में रात में बेलोरो गइल कि आफत आइल। अइसने बहुत खबर। शहर में राहि चलल मुश्किल बा। कवनो ओर जाइब, जाम में घेराइब। बहुत व्यवस्था बदलाइल, लेकिन जाम से मुक्ति ना मिलल। मिलबो ना करी, गाड़ी-घोड़ा बढ़त जात बा सड़किया त उहे बा। इ त रहल गांव-शहर के खबर। अब तनि अखबारन की दफ्तरन के हाल सुनीं। गोरखपुर में प्रेस क्लब के चुनाव होखेवाला बा। बहुत हलचल बा। प्रत्याशी लोग पत्रकारीय काम छोड़ के नेतागीरी पर उतर गइल हवें। पांचों वखत दुआ-सलाम। जवना पत्रकार भाई के अपने मेहरी-लरिका  कहना नेइखे सुनत उहो कंडीडेट लड़ावत हवें। दावत के दौर ओइसे चलत बा जइसे गांवन में परधानी के चुनाव। कई जने पत्रकार भाई एतना खींच के खा लेत हवें कि दुनो पवन चलत बा। उल्टी-सीधी दूनों शुरू। अरे भइया, दाना भले दूसरे के ह देंहि त आपने ह, बचा के..। चुनाव भले पत्रकार लोग के होत बा, लेकिन प्रचार में सेल्समैन, हेल्थमैन,गनमैन,मशीनमैन,गुड मैन, बैडमैन, हैटमैन, फैटमैन, चैटमैन, रैटमैन, कैटमैन, दुकानदार, ठेकेदार, वफादार, दफादार, दागदार, रसूखदार, रसदार ..(सब शब्दन के अर्थ अपनी हिसाब से लगा लेइब सभे) अउर न जाने कवन-कवन लोग लगल बा। एक जने पत्रकार कम ठेकदार अइलें, कहलें-बाबा!
असों फलां के अशीर्वाद दिया जाव। इ जीतिहें त ‘शीला के जवानी’ आ ‘मुन्नी बदनाम’ से भी बढ़िया कार्यक्रम होई। दावत में बिरियानी बिछवा दिहल जाई। बोतल-शीशी के कवन कहीं ड्रम के ड्रम के मिली। बाबा भड़क के खाड़ हो गइलें, कहलें अब इहे ‘पत्रकारिता’ रहि गइल बा। प्रेस क्लब के कमाई कम ना बा। पचास हजार रूपया महीना त बटुराई जाता। तीन गो कर्मचारी रखल हवें पंद्रह हजार में निवट जात होइहन। दस हजार के बिजली फूंकात होई। तबो तीन लाख बचि जात होई। सवाल इ बा- ए तीन लाख में पत्रकारहित के कवन काम होला? अपने हीत-नात-बात के लाभ भले दिया जात होई। सामूहिक बीमा के बात त बहुत सुनल गइल, लेकिन शुरू केहू ना करावल। मनबोध मास्टर कहलें- बाबा शीरा में गिरल- पड़ल-मरल चिउटा जनि निहारीं, मिठाई के मिठास देखीं। असों फलाने के वोट दे दीं। बाबा कहलें- केके दे दीं, हमरा खातिर सभे बरोबर बा-
जइसन उदयी ओइसन भान। इनका आंखि ना उनका कान।।
बाइस पसेरी सगरो धान। रुख ना बिरिछ तहं रेड़ परधान।।
सौ पुराचरन ना एगो दुराचरन। केतना ले सुख दीहें दुखहरन।। 
अन्हरा सियार के बा गुलरी मिठाई। पापी के पाप से पड़ोसी भी जाई।।
नाव दरियाव हवे पानी के ठेकान ना। नीम त हकीम हवें खतरे में जान बा।।
चार के जोन्हरी चौदह आना के मचान बा। ओखरी में मूड़ मूसरे लहान बा।।
नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के १३ अक्तूबर २०११ में प्रकाशित है . 
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