गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

महानगर और जिलन कù का बतलाई हाल.


मंदिर में मंथन भइल, मिली जाम मुक्ति? 
जाम-झाम की नाम पर, आपन-आपन युक्ति।। 
नगर निगम में धांधली, गेट में ताला बंद। 
लाठी चार्ज में बहल लहू,ऊपर से शांतिभंग।।
                         महानगर में रोज मिलें, मरल-परल नवजात।
                        निर्ममता आ निर्लज्जता, कù अइसन सौगात।। 
                          उड़न परी जब उड़ चली, रेल का नियम तोड़।
                         मवाना मैराथन जितली, आइल अइसन मोड़।।
 किताबुल्लाह प्रकरन में, पुलिस करेले खेल। 
आखिर कवले इ चली, खादी-खाकी मेल।। 
बरहजवाले नेताजी, बसपा के जायसवाल।
 दिल्ली में सीबीआई, पूछलसि बड़ा सवाल।।
                        व्यवसायी से रंगदारी, मांगत हौं रंगदार। 
                      माल्हनपार की घटना से, सहमें दुकानदार।। 
                         सभ्य हुए सुविधा बढ़ी, पर उखड़ रही है मूंछ। 
                         व्यवस्था भुरकुस भइल, दिये एटीएम कूंच।। 
 ग्रामीण अंचल में देखीं, भइल व्यवस्था फेल।
 आटा चक्की बंद पढ़ाई, दुर्लभ किरासन तेल।। 
गैस के किल्लत भयो, रोटी भई मुहाल। 
वितरण व्यवस्था सुधर गई, झूठ बजावें गाल।।
                                एही गैस की कारने, पीपीगंज दबंग। 
                                 कट्टा तानि के भग गये, देखी ऐसी जंग।।
                                   भ्रष्टाचार के दीमक, चट्ट करत बा मुल्क।
                                     यूनिवर्सिटी में हजम, 21 लाख कù शुल्क।। 
सक्रिय भये शिक्षा माफिया, बोर्ड कर रहा भूल। 
 परीक्षा केंद्र बन रहे, ब्लैकलिस्टेड स्कूल।।
 मनरेगा में का कहीं, भ्रष्टाचार के भेंट।
 सौ दिन फावड़ा चलल , जा में रहल ना बेंट।।
                  भ्रष्टतंत्र के लूट के, अइसन बिछल बा जाल।
                    गरीबन के निवाला देखीं, पहुंचत बा नेपाल।। 
                       महानगर और जिलन के, का बतलाई हाल।
                        ताबड़तोड़ चोरी डकैती, ‘देहाती’ बड़ा बवाल।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती की यह व्यंग्य रचना राष्ट्रीय सहारा के २३ फरवरी १२ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय.

14 फरवरी बीतल ह। ‘प्रेम दिवस’ के खूब चर्चा भइल ह। मनबोध मास्टर वेलेन्टाइन के चर्चा कइलें त मस्टराइन बेलन लेके तैयार हो गइली। कहली-बुढ़ारी में मटुकनाथ बनल चाहत हवù। बेलन से टाइट क देइब, एकदम राइट हो जइबा। पता ना कवन कुख्यात, लुच्चा, कुसंत के अइसन अंत भइल कि अपने त फांसी चढ़ि गइल आ दे गइल बेलेन्टाइन डे। हमरा देश में संत कबीर भइलन। केतना बढ़िया आ बड़वर ‘प्रेम’ के परिभाषा दिहलन। बगैर कागदे-कलम के एतना लिखलें आ कहि दिहलें- मसि कागद छुयों नहीं..। मनुष्य की अस्तित्व के रोमांचक अनुभूति देवे वाला शब्द ह ‘प्रेम’। प्रेम खूब पसरल। राधा-कृष्ण, शकुंतला-दुष्यंत, सावित्री-सत्यवान की प्रेम कथा से पुरान भरल बा। कुछ समय बाद हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, सलीम-अनारकली, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद, रोमियो- जूलियट ‘प्रेम’ की चलते ही प्रसिद्ध हो गइलन। सृजन के मूल तत्ववाला प्रेम अब मस्ती आ फैशन, उपभोग आ बाजार के वस्तु बनि गइल बा। भावना की बहाव में नवहा लक्ष्के-लक्ष्की त बहते हवें, बुढ़ारी में तूहूं बहत हवù। कबीर बाबा सांचों कहले रहलें- ढाई आखर प्रेम का., प्रेम न बाड़ी उपजै., प्रेम गली अति सांकरी.., बरसा बादल प्रेम का, भिजि गया सब अंग.। लेकिन आज के प्रेम लिखो फेंको वाली कलम। हलो -हाय कहि के आवत बा, गुड -वाय कहि के विदा हो जात बा। अब कवनो सावित्री यमराज की लगे ले सत्यवान की जान खातिर ना पहुंची। जे ना जानत बा, उहो वेलेंटाइन- वेलेंटाइन गोहरावत बा। सही बात इ बा कि रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लडिस क शासन रहे। ओकर कहनाम रहे कि विवाह कइला से पुरुष के शक्ति आ वुद्धि कम होला। उ फरमान जारी कहलें कि कवनो सैनिक आ अधिकारी विवाह ना करी। ओही देश में एगो संत वेलेंटाइन रहलें। उ एह क्रूर आदेश की खिलाफ में बगावत खड़ा क दिहलें। परिणाम भइल कि 14 फरवरी 498 के संत वेलेंटाइन के फांसी चढ़ा दिहल गइल। उनकी स्मृति में रोम देश में वेलेंटाइन डे मनावला के परंपरा शुरू भइल। पश्चिम के इ सभ्यता पुरूबिहन की करेजा पर ले चढ़ि गइल। अब शहर महानगर के बाति के करो गांवन में भी इलू-इलू होता। मस्टराइन के बाति सुनि के मनबोध कहलें-हमरा समझ में ना आवत बा, लोग गुड़ खाके काहें गुलगुल्ला से परहेज करत बा। एक ओर कहल जाला कि साधु-संत के शिक्षा जीवन में चरितार्थ करù। जब हम संत वेलेंटाइन की बतावल राहि पर चले जात हई त घर में मैडम के बेलन टाइट हो जाता। मास्टर-मस्टराइन के बाति सुनि के हमरो कवित्तई करे के मन कइलसि-
 बढ़िया बीतल 14 फरवरी, कहल गइल प्यार के दिन।
 होटल- पार्क, कोने -अंतरा में , प्यार के इजहार के दिन।।
 संत वेलेंटाइन मरि गइलें, दे गइलन बाजार के दिन। 
रंग- विरंगा गुलाब खरीदलीं, रहल इ उपहार के दिन।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के १६/२/१२ के अंक में प्रकाशित है . 

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

देखने में भले गोरा नहीं , थोडा सा कम काला हू
कट्टा बम बारूद नहीं , लेकिन चुभने वाला भाला हू 
हिंदी के अखबारों में , भोजपुरी का व्यंग्य लिखू 
शहर में रह कर बना देहाती , ऐसा पेपर वाला हू

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

चामे की धोकरी की खातिर , कुक्कुर भी भईलन तइयार

हमरा उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र के महापर्व चलत बा . जनादेश २०१२ पर बहस जारी बा . अयिसने माहौल में एक जने सघतिया पुछले - देहाती बाबा ! के के वोट दियाई ? हम कहली - वोट अपनी मत ( विचार ) के चीज़ ह, तोहार जहा विचार बने ओकरा निशान पर बटन दबा दिहअ . उ कहले - तब्बो राउर का विचार बा ? हम कहली - हमार विचार पूछत हव टी सुनअ -
जागी - जागी वोटर भईया , सुनली मोर पुकार .
बटन दबा दी , मनमाफिक , लोकतंत्र के इ तिहुयार .
वोट के अपनी बुझी कीमत , बहुत जरुरी , बाद दरकार .
रउरे कृपा से गूंज रहल बा , लोक तंत्र के जय जय कार .
कईसन कईसन जनसेवक है , रउरी सेवा में तइयार .
चामे की धोकरी की खातिर , कुक्कुर भी भईलन रखवार .
केकर केकर नाम गिनाई , रउरी सामने सेजरावार .
विधायक बनि ह्त्या कईले , मंत्री बनि के बलात्कार .
अफसर लोग वसूली कईलन , अयिसन भी देखली सरकार .
ओकरा पहिले वोहू के देखली , जेकर पार्टी ही परिवार .
भाई भतीजा बेटवा शासक , उज्जर कालर वाला दमदार .
बढ़ल गुंडई जेकरा राज में ,गाव गाव लाठी फूटे कपार .
ओकरा पाहिले देखली रउरा, धरम करम के ठेकेदार .
 उनकी हाथ ठगईली हमहू ,बहुत लगवली जय जयकार .
अवर मुड़ी कुछ पीछे देखी, पीढ़ी दर पीढ़ी मजदार.
नाना दादी बाप बखानी ?अब घुमे ले राजकुमार .
मम्मी जेकर राज चलावे , ओकरा हाथे में सरकार .
येह चारो की बाद भी बाडन, कुक्कुर कौआ और सियार .
भो- भो, काव- काव, हुआ- हुआ, गूजे सरेह बांगर कछार .
कुछ वोट कटवा , कुछ नोट झरवा . कुछ छोटे छोटे सरदार .
टिकट की खातिर इज्जत मांगे , अयिसन भी सुनली समाचार .
अब रउरा तइयार हो जाई , सुनी गुनी चुनी उमिद्द्वार.
कहे देहाती राउर मर्जी , कईसन चुनब अबकी सरकार .

हम अपनी ब्लॉग पर राउर स्वागत करतानी | अगर रउरो की मन में अइसन कुछ बा जवन दुनिया के सामने लावल चाहतानी तअ आपन लेख और फोटो हमें nddehati@gmail.com पर मेल करी| धन्वाद! एन. डी. देहाती

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