गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

ओझा की भरोसे होता, डायन से बिआह। जरत बा इलाका ,लोग होत बा तबाह।। एतना लापरवाही पर भी, कम हवें सिपाही। धरति बा आग, त मचावति बा तबाही।।


बैसाख क महीना। देंहि के चाम जरावत घाम। अंधड़ आ तूफान, एही में अग्नि देवता के तापमान। कहीं खेत जरल, कहीं खलिहान। लापरवाही के आग में जरि गइल बहुतन के अरमान। साहब- शुब्बा लोग मना करत रह गइलन कि पंच खेत के डंठल ना जरावें। जेकर कटा गइल, ओकर कवन चिंता। धरा दिहलें एगो माचिस के तिल्ली। उनकर खेत साफ भइल, आस-पास के किसान के खेत के खड़ा फसल राख हो गइल। पूर्वाचल में असो के आग लगला के कारन पर ध्यान दिहला पर पता चलल कि कहीं देवी-देवता के जेवनार, कहीं गांजा, बीड़ी, सिगरेट, कहीं घूरा के चिंगारी, कहीं चूल्हा के आग, कहीं कौड़ा, कहीं बिजली के फाल्ट, कहीं डांठ के फुंकाई आ कहीं लक्ष्कन के खेलवाड़ में आग ही आग। अब आई तनीं आग बुझावे वाला विभाग के हाल जानल जा। एकर हाल उ बा- ‘ ना सुआ ना सुतारी, बनले बड़का व्यपारी.’। आपन देश बहुत तरक्की कइलसि। अग्नि-5 के सफल परीक्षण भइल। पांच हजार किलोमीटर तक मारे के क्षमता वाली मिसाइल तैयार भइल। अमेरिका के छोड़ के पूरा दुनिया हमरी अग्नि-5 की जद में बा, लेकिन आग बुझावला की मामला में हम बहुत पीछे हई। अग्निशमन दल की नाम पर गिनल-चुनल दमकल, राह चलत हांफेवाला सिपाही, भला अइसे में कइसे मिटे आग के तबाही, जब गांव-गांव लोग करत बा लापरवाही। जरूरत येह बाति के बा कि हर थाना पर होखे एगो फायरब्रिगेड के गाड़ी। गांव के गड़ही, तलाब आ पोखरा में भरल जा पानी। बंद करावल जा लापरवाही आ नादानी। अगर अइसन ना होई त इहे कहल जाई-
ओझा की भरोसे होता, डायन से बिआह।
 जरत बा इलाका ,लोग होत बा तबाह।।
 एतना लापरवाही पर भी, कम हवें सिपाही।
 धरति बा आग, त मचावति बा तबाही।। 
अग्नि के परीक्षण उहां, जरे इहां आग। 
बुझावे के संसाधन नाहीं, जब जात हवे लाग।।
 देश के तरक्की भइल, मिसाइल अउरी तोप।
 वाह रे! अग्निशमन दल, ना बुझावे एगो खोप।।

- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का yah bhojpuree lekh rashtreey sahara ke 26 aprail 2012 ke ank me prkashit है

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

चारो ओर कृपा बरसत बा , काहे राउर मन तरसत बा ...


चारों ओर किरिपा बरसत बा। टीवी पर निर्लज्ज बाबा के किरिपा बरसत बा। भक्त लोग जयकारा लगावत हवें। निर्लज्ज बाबा की जय! हे त्रिलोकदर्शी महराज विरोधियों के ऊपर अइसन किरिपा बरसावो कि मुंह करिया हो जाय। राउर बाबागिरी जिंदाबाद रहे। रउरा आबाद रहीं। कपड़ा के दुकान ना चलल, कवनो बात ना। ठेकेदारी डूब गइल, फिकिरनाट। बाबागिरी के धंधा चोख रही त सब काम टनाटन रही। संत समागम में गरीब मनई भला केइसे पहुंची, खायेके ठेकान ना रही त खाता में कहां से पइसा ट्रांसफर करिहें। पइसा ना जाई त किरिपा कइसे मिली। खैर, बाबा बहुत किरिपा कइले अब पब्लिक का चाहीं कि उनपर किरिपा करि के कीचड़ उछालल बंद करो। अपना उत्तर प्रदेश में राज-ताज बदलल त लोग का भरोसा भइल कि सब ठीक हो जाई। बहन जी गइली, भइया जी अइले। भइया जी अपनी शार्गिदन के बहुते समझवले कि भया! अइसा-वइसा काम जनि करù कि बदनामी होखे। लेकिन ‘ उ डोलें रस आपनो, उनकर फाटत अंग.’। बहन जी की राज में ट्रांसफर उद्योंग हो गइल रहे। भइया जी की राज में बगैर पइसे-पौव्वा के ट्रांसफर भइल ह, अधिकारी लोग बहुत खुश कि किरिपा बरस गइल। लगाम नेइखे कसात त कानून व्यवस्था के स्थिति पर लफंगन के ही किरिपा बरसत बा। आंतरपार लूट होता। मनई के जान तù चिरई-चुरुग, भेड़-बकरी से भी बदतर हो गइल बा। लुटेरन के लगत बा लूट के छूट मिल गइल बा। अब केहु पुछे कि भया , उनहन पर केकर किरिपा बरसत बा? अभिभावकन पर प्राइवेट स्कूलन के किरिपा बरसत बा। लक्ष्कन के नाम लिखववला में कमर टेढ़आ जाता। किसान पर भगवान मेहरवान हवें। जब पाकल-फूटल अनाज भइल त इंद्र देव के किरिपा बरसल। पाथर-पानी से जवन बचल ओपर अग्नि देवता के किरिपा बरसे लागल। खेतन में आगि नाचति बा। गांवन में बिजुलिया ओतने आवत बा कि कहीं फट्ट से फाल्ट हो जाता आ सट्ट से आग पकड़ लेत बा। अइसने कुल किरिपा कुकिरिपा के बीच एगो भक्त गोहरावत हवें-
 मेरो मन का भरम मिटाओ , बाबा इतनी किरिपा बरसाओ। मन का भरम..
 तिसर नयन खोल दो बाबा, नोट ही नोट दिखाओ। 
काला पर्स नितंब संवारे, करेंसी से अंड़सायो।।
 बैंक आ लाकर ठूंस पड़े, फिर इनकम टैक्स बचाओ। 
करिया अक्षर भैंस बरोबर, फिर भी विद्वान बनाओ।।
 पर तिरिया देखि सुघराई, लोभी मन ललचायो। 
घर की बियही बासन-पोंछा, महिला मित मौज मनायो।। 
होटल पार्क घूमे मनमौजी, चाट पकौड़ा खायो। भिनसारे जब पहुंचे घर, मेहरी मूसर ना बरसायो।। मन का भरम मिटाओ..

- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के १९ अप्रैल २०१२ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

कट्ठा अवांसी, मंडा बोझ ना, पूरा सोझ..

चैत के महीना। राजा महीना। कहल गइल- ‘ आइल चइतवा राजा, घुरवो पर दु दाना’। खेती-किसानी की चर्चा में ही इहो कहावत कहल गइल- ‘ चैत सुते अभागा’। एगो जमाना उहो रहे, जब पैदावार की मामला में देश बहुत पीछे रहल। जौ-गोजई बोआत रहे। ऊपज एतने होखे कि कहल गइल- ‘ कट्ठा अवांसी, मंडा बोझ’। कटिया की दिन में भोरहरी से ही खेते-खेते बनिहारिनन की चूड़ी की खनक से सिवाना गुलजार हो जात रहे। खेत से खलिहान तक चहल-पहल। पंद्रह दिन ले कटिया, ओकरा बाद दवंरी तब ओसवनी। अंखइत से पैर ( 50-100 बोझ का ढेर) उलटला में पांव के पसीना कपार चढ जात रहे। मेह की सहारे बुढ़वा बैल पाकुच-पाकुच आ दहिनवारी नाधल बछरू कुलांच मार दांवत रहलें। पीछे-पीछे हंकवइया के पांव की तरवा जाय। बैलन के पोंछि मिमोरत, हांकत- डांटत हरवाह लोग जब रात के पैर पर पसर के बिरहा, लोरकाई, गोड़ऊ, धोबियऊ की धुन गुनगुनात रहलें। गरीबी एतना की गोबरउरा ( दवंरी करते बैल का गोबर) से भी अनाज निकाल धो-बना, सुखा-पिसा के मजदूरन की घरे रोटी बनत रहे। उत्पादन की मामिला में देश बहुत तरक्की कइलसि। अब कठमन (एक कट्ठा में 40किलो) ना, पूरा कुंतल भर पैदावार होत बा। तकनीक की क्षेत्र में भी देश बहुत तरक्की कइलसि। ट्रैक्टर आइल, कंबाइन आइल, हारवेस्टर आइल। कुछ लोग कंवाइन के दानव आ दैत्य बनावल, लेकिन सांच बाति इ बा कि इ मशीन ना रहित त अब जेतना ऊपज होत बा कटावल मुश्किल हो जात। गांवन से मजूरा शहर पकड़ लिहलें। जवन गांव में हवें बगैर काम के ही प्रधान लोग की कृपा से मनरेगा के मजदूरी उठावत हवें। खेती-किसानी के मजदूरन के अभाव हो गइल। अइसन समय में कंबाइन के ही कृपा बा। जवना कटिया, दवंरी,ओसावनी में महिनन लागत रहे, अब घंटा-दु घंटा में गेंहूं घरे। जरूरत येह बात के बा कि लखटकिया कार की तर्ज पर लखटकिया ट्रैक्टर, कंबाइन, हारवेस्टर बनावल जा। देश और तरक्की करी। किसानन के मुफ्त बिजली के वादा करे वाला नेता लोग अपनी वादा पर अमल करें। खाद-बीज-डीजल पर सब्सीडी दिहल जा। अब उ जमाना ना बा कि अमेरिका से ललका गेंहूं आ सड़लका बजरी आई तब लोग खाई। अन्न उगवला में किसान रिकार्ड बनावत हवें। कट्ठा में कुंतल उपजावत हवें। अइसने कुछ माहौल में इ कवित्तई लिखल गइल-
 पहिले कट्ठा अवांसी, मंडा बोझ। 
अब कठमन ही ना, पूरा सोझ।। 
अन्न से भरल बखार आ डेहरी। 
क्रीम लगावे किसान के मेहरी।।
 तब कटिया दवंरी अवर ओसाइन। 
अब सब संगे आइल कंवाइन।। 
बैल नदारद खलिहान खतम, 
आइल जबसे ट्रैक्टरवा। 
काटे दांवे ओसावे कंवाइन, 
भूसा बनावे हरवेस्टरवा।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी लेख राष्ट्रीय सहारा के १२ अप्रेल१२ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

लिपिस्टिक में गुण बहुत है, सदा राखिए जेब..


मनबोध मास्टर मैडम की लिपिस्टिक पर फिदा हवें। बहुतै काम के चीज हù मैडम कù लिपिस्टिक। समय असमय अइसन-अइसन काम चला देला कि देखवइया हैरान हो जालें। आई लिपिस्टिक से जुड़ल कुछ घटना-दुर्घटना बता देत हई। महानगर में 28 लाख की लागत से पोकलेन ( नाला साफ करे वाला मशीन) खरीदल गइल। वाह रे नगर निगम! 28 लाख के मशीन खरीद लिहलन आ पचास पैसा (चवन्नी चलित तù पच्चीस पैसा ही लिखतीं) के रोरी के व्यवस्था ना कù पवलें। उद्घाटन की अवसर पर महापौर के युक्ति काम कù गइल। पर्स से लिपिस्टिक निकरली, पोकलेन मशीन पर स्वास्तिक के निशान बनवली आ शुभ-लाभ लिखली। अब लिपिस्टिक के कमाल देखीं। प्रेमचंद पार्क से फलमंडी वाला नाला में जब मशीन पहिला पंजा लगवलसि तù नया मोटरसाइकिल निकलल।शुभे-शुभ। देखवइया गावे लगलें-‘ मेरे शहर का नाला उगले, उगले-उगले मोटरसाइकिल’। केतना भाग्यशाली हई महापौर आ केतना भाग्यशाली लिपिस्टिक। इ चर्चा होते रहे कि पड़ोसी पंडित जी आपन आप बीती बतावे लगलें। कहलें - एक बेर के बाति ह जयपुर में ब्राह्मण सभा के सम्मेलन होत रहे। हमहूं आमंत्रित रहलीं। ट्रेन लेट रहे। जयपुर पहुंचल तù सम्मेलन के समय हो गइल रहे। ना नहइला के समय ना पूजा-पाठ के। हड़बड़ी में धावत-धूपत सम्मेलन स्थल पर पहुंचत रहलीं कि देखलीं सब पंडी जी लोग लिलार पर टहकार टीका लगवले गेट से घुसत हवें। कवनो युक्ति ना रहे। टीका के बगैर चेहरा से ब्राह्मण के तेज समाप्त रहे, अचानक मोबाइल के घंटी बाजल। घर से मैडम के फोन रहे। बोलली- गलती से रउरी बैग में हमार लिपिस्टिक चलि गइल बा। मैडम के गलती हमरा खातिर जोगाड़ हो गइल। पांडाल की एगो कोने में गइलीं, सट से लिपिस्टिक से ललाट पर टीका खींचली। सम्मेलन में टीका पर लमहर व्याख्यान सुनवली। जवले टीका लगल बा, ब्राह्मण जमल बा। विद्वान लोग ताली बजावें, हमार लिपिस्टिक छाप टीका सम्मेलन में छा गइल रहे। कुछ और अतीत में गइलीं तù याद आइल। कालेज के पढ़ाई के दिन। एनुवल फंक्शन में ‘
लीप-लिपिस्टिक’ कार्यक्रम रहे। आंख पर पट्टी, हाथ में लिपिस्टिक आ सामने आज के पंडिताइन आ स्कूली समय के क्लासमैट कम गल्र्स फ्रेंड ज्यादा। लीप पर लिपिस्टिक ना लगा पवलीं, लेकिन नाक की नीचे, ओठ की ऊपर कुछ मूंछ टाइप के आकृति जरूर बना दिहलीं। पट्टी खुलल तù आपन करनी देख के हंसत-हंसत लोटि गइलीं। समय करवट फेरलसि आ उहे क्लासमेट हमरा गरे बंधा गइली। लिपिस्टिक के एगो तिसर घटना, जवना के हम दुर्घटना कहि लें। बड़की भौजी मेकअप रूम से डेंट-पेंट कù के निकरली। हम मजाक में कहलीं-भौजाई एगो किस दे दù। भौजी आव देखली ना ताव, हमरा गाल पर दे दिहली किस। तवले भइया आ गइले। गाल पर लाल रंग के ओठ वाली मुहर देखते बौरा गइलें। भइया-भौजी में भइल तकरार। छोटहन मजाक बड़वर दरार तैयार कù दिहलसि। बाद में बहुत सफाई देत शंका के बादल छंटल।
 लिपिस्टिक में गुण बहुत है, सदा राखिये जेब।
 प्रीति बढ़े भौजाइन के , जव देवर लोग देव।। 
 ओठन के लाली बढ़े, अवर भी करे कमाल।
 वहां-वहां लगाइये, जहं रंग न मिले तत्काल।।

 -नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ५ अप्रेल २०१२ के अंक में प्रकाशित है .
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