गुरुवार, 30 जनवरी 2014

सियासती धुंध में लोक लुभावन बरसात

मनबोध मास्टर के चश्मा से सियासती धुंध लउकत बा। येह धुंध में लोक लुभावन
बरसात होत बा। दिल्ली दिल खोल के त लखनऊ बड़-बड़ बोल बोल के चुनावी चाशनी
से पगल खैरात बांटत बा। लोग कहेलें नाम बदलला से का होला? काहें ना होला,
ना होइत त रानी लक्ष्मीबाई के नाम के वॉय-वॉय कर के समाजवादी पेंशन के
कांव-कांव ना होइत। आसमान में धुंध बा, लोक किकुरल बा लेकिन सियासत की
द्वंद्व में बहुत गरमी बा। येही गरमी में गोरखपुर की मानबेला में एक जने
गरज गइलें त दूसरका जने बरसे की तैयारी में हवें। जवना शिक्षामित्र लोग के
कई बार लखनऊ में लाठी सेवा भइल ओह लोग के अब बल्ले-बल्ले। बांट भइया, बांट
भइया खूब रसगुल्ले। कहीं इ सियासतबाजी ना हो जा। देश में घोषणा, अमल, अदालत
के चक्कर में बहुत मामिला पिसा के ठीक हो जालें। चुनावी मौसम देख के
राजनीतिक दल दिल खोल के दिलदारी देखवावत हवें। आस्तिन चढ़ावे वाला पप्पू
भइया के बोल तबसे बदल गइल जबसे मौनी बाबा उनके हरियर झंडी दे दिहलन। फैसला त
जनता की हाथ बा। मौनी-मैना की बोलले का होई? जवन लोग साठ साल में देश के
तरक्की ना करा सकल उ तीस दिन में दिल्ली की छोटकी सरकार से हिसाब लेत बा।
दिल्लीवालन के का कहल जा। जेके लोग अंगुठी के नगीना बुझत रहलें उ कइसे नाक
के पोंटा हो गइल? राजनीति के सफेद जरायम बुझत में जनता हमेशा ठगा जाति बा।
कभी ओकरा हाथे त कभी दूसरा की हाथे। जनता के सुनते के बा? अगर सुनत त डेढ़
सौ चिट्ठी लिखला की बाद भी सुनवाई ना भइला से नाराज लोग बुधवार की दिने
मौनी बाबा की विज्ञान भवन में आयोजित वक्फ विकास निगम की कार्यक्रम में
हंगामा ना करितन। झाड़ू से भ्रष्टाचार मिटावे के संकल्प करे वाला आम आदमी
अब चंदा के जानकारी दिहला में भी कतरा ता। आज मौनी आमवस्या ह। मुंह खोलला
की पहिले नहा लिहला के जरूरत बा। नहइला की दौरान मुंह से आवाज ना बहरिआई त
बहुत पुन्य होई। नहा-धो के तैयार हो जाई। मुंह खोलीं चाहें ना खोलीं। बोलीं
चाहें ना बोलीं लेकिन विचार के मंथन अंदर ही अंदर चले दीं। येही मंथन से
निकरल अमृत लोकतंत्र की जीवित रखी। देश में मोदी के लहर भले चलत होखे,
शंकराचार्य स्वरूपानंद की निगाह में मोदी हिंदुत्व खातिर बड़वर खतरा हवें।
येह पर रउरा सभे सोचीं। हम कुछ ना बोलब। आज मौनी आमवस्या ह।


- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह   भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 30 /1 /14 के अंक में प्रकाशित है. 

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

न मिलता सिंहासन, चाहें कितना भी रोते..

मनबोध मास्टर की कपार पर आज फिर एगो ठीकरा फोरा गइल। मास्टर के कपार बरियार
ह, काहे की उ मीडियावाला हवें। लोकहित की चाह में आज गली-गली मुफ्तखोरी के
चाय पीये के मिलल। आज ले छुंछ पानी भी ना पूछत रहलें। विकास के बाजा बजा
के राजा बने की युगत में के ना लागल बा? कबो रानी जी, कबो महरानी जी, कबो
बेटिंग आफ पीएम, कबो एगो सीएम, कबो केहू-कबो केहू.। मीठा-मीठा त गप्प हो
जाता, तनिसा कड़ुआ भइल की मीडिया के दोष। मीडिया गांव के करिमना हो गइल बा।
जवना की बारे में कहल गइल-‘ रहल करिमना त घर गइल, गइल करिमना त घर गइल।’
लोकतंत्र के जनतंत्र, भीड़तंत्र, धनतंत्र, लट्ठतंत्र, धर्मतंत्र,
मर्मतंत्र, कुकर्मतंत्र,बेशर्मतंत्र आदि कई तंत्र की रूप में बदलत बहुत
करीब से देखले बा करिमना। देखले त मनबोध भी बाड़न लेकिन उनकी ऊपर जवन
मीडियावाला के ठप्पा लागल बा, ओहसे बहुत बच-बचाके बतावेलन। सत्ता के स्वाद
चीखते आदमी के चाल , चरित्र, चेहरा बदलत लउकत बा। देश में ईमानदार दिखला के
होड़ लागल बा। अच्छा बात बा, बेईमान आ बेईमानी खत्म हो जा त का बुराई बा।
कपार पर उज्जर टोपी पर कुछ करिया अक्षर लिख के पहिन लिहले का सचहूं
ईमानदारी के सर्टिफिकेट मिल जाई? का सचहूं चरित्र उज्जर हो जाई? देश से
भ्रष्टाचार मेटावे खातिर सब आगे आवता। कई जने के चेहरा देखते याद आ जाता
उनकर लड़कपन, जवानी आ ढलानी के कहानी, नादानी, शैतानी, बेईमानी..। हंसी
आवति बा। सरकार , सरकार से लड़ति बा। दु दमदार की लड़ाई में नुकसान त जनता
के ही होई। लड़ला-लड़ावला की लटका-झटका से का सुशासन लौट आई। सत्ता में रह
के धरना-प्रदर्शन के बात कवनो नया ना बा। बहुत हल्लाबोल टाइप के नौटंकी
देखल गइल। दिल्ली में आम आदमी सत्ता पा गइलें,फिर काहें आम आदमी परेशान बा?
शासन में अइला की बाद अनुशासन से काम करे के चाहीं। विरोध त विरोधी की
बखरे छोड़ देई। दिल्ली के सरकार मीडिया पर खिसिआइल बा। खिसियाइल त यूपी के
एगो मनिस्टर भी बाड़न। भईया! आईना पर दोष काहें लगावत हवें। जेइसन चेहरा
रही ओइसने मोहरा दिखी। दिल्ली के सरकार बनवला के दोष भी मीडिया पर ही लागल
रहे। अब एगो कविता-

मीडिया न होता, तो सरकार नहीं होते।
 सिंहासन न मिलता,
चाहें कितना भी रोते।। 
कह रहे मीडिया आधा कांग्रेसी, आधा भाजपाई है। 
हम
कहते हैं, यह पूरा का पूरा मौकाई है।। 
आईना का क्या दोष, जो देखा बता दिया। 
मीठा तो बहुत हुआ, थोड़ा मिर्चा चखा दिया।। 
गालियां बको या बददुआ दो,
मिटेगा न मीडिया। 
जब भी कुछ कहोगे, सामने ही होगा मीडिया।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती  भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 23 /1 /14 के अंक में प्रकाशित है 

बुधवार, 22 जनवरी 2014

बुढ़िया की मरला के ना, दइब की परिकला के डर बा

बुढ़िया की मरला के ना, दइब की परिकला के डर बा मनबोध मास्टर कहलें- बुढ़िया की मरला के ना, दइब की परिकला के डर बा। येही डर से पीड़ा बा। लोग के मन सहम जाता। राजधानी में कई जने के पानी थहला की बाद नौवजवानन में जवन जज्बा पैदा भइल बा उहो लोग की चिंता के कारण बा। देश में आप के पल्राप चलता। कई लोग घोर संताप में पड़ गइल हवें। कहीं सरक ना जाये, कहीं घिसक न जाये, मेरे सिंहासन की शान रे..। भीषण शीतलहर के प्रकोप बा लेकिन राजनीति के कुड़ुकल मुर्गी आजकल अंडा ज्यादा देत हई। अंडा की साथ ही करिया झंडा के डिमांड बढ़ गइल बा। कई जगह ईट-पत्थर-डंडा भी.। दिल्ली में आम आदमी जवन अब खास बनल बा, खांसता त देश के सियासत हांफति बा। कई जगह त शीशा में अपनी परछाहीं की जगह आप के परछाहीं देख के लोग चिहुक जाता। सैफई में हीरो-हीरोइन की डांस पर, त पडरौना में मंत्री जी की ठुमका पर सवाल। सवाल जनता ना सियासतबाज उठावत हवें। जनता नयापन की उम्मीद में उंघइला से जागलि बा। एगो लहर उठल बा। जवना में वंशवाद के बहववला के ज्वार उमड़त बा। बड़े-बड़े अधिकारी, मीडिया कारोबारी, डॉक्टर- प्रोफेसर.. सरसरात समात हवें। शहर में प्रबुद्ध लोग के वॉकयुद्ध चलता लेकिन गांवन में अबो जाति-बिरादरी के बाति बतिआवेवाला लोग कहता- सराहल धीया.. ( एगो जाति विशेष, जवना के अछूत कहल जाला) घर जाली। गांववाला कहलें- हम्मन गांधी बाबा की जमाना से देखत हई। ठगे-ठगे बदलक्ष्या होता। कवो उ ठगता, कबो इ ठगता। शहर के लोग के कहता- आजादी के दूसरा जंग शुरू बा। भ्रष्टाचार , सांप्रदायिकता, जातिवाद, भाई-भतीजावाद के मार के भगा दिहल जाई। नैतिक साहस की बल पर अमेठी अइसन गढ़ में एगो कविहृदयी ललकारत बा। भाड़ा के लोग ओकरा ऊपर अंडा मारत बा। अंडा के फंडा भी कहीं प्रचार के जरिया न बन जाये काहें कि मरला की बाद भी कई अंडा फूटत ना बा। अब अंडा चलो चाहें डंडा। झंडा त ऊंचा होखबे करी। धंधा-पानी खत्म भइला की आशंका में सजो मौसेरा भाई एकजुट होके नवका लहर के रोके की षड़यंत्र में लागल हवें। मौजूदा हालात पर बस एगो कविता, जवना के अर्थ अपनी-अपनी हिसाब से निकारीं- 
शीतलहर में बह रही, यूं कुछ गरम बयार। 
बेवजह भी हो रही, अंडों की बौछार।। 
स्वेटर, मफलर, टोपियां, खांस रहे हैं आप। 
सहन नहीं क्यू हो रहा, उनको यह पल्राप।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती  भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 16 /1 /14 के अंक में प्रकाशित है

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

रउरी हाथे ही हो जाई, लोकतंत्र के शुद्धिकरण..

मनबोध मास्टर की कपार पर आज फिर एगो नवका टोपी चढ़ गइल। आजादी की लड़ाई में गांधी बाबा की कपारे भले कम लउकल लेकिन गांधीवादिन की कपार पर ज्यादा लउकल गांधीवादी टोपी। नेताजी के टोपी आजाद हिंद फौज के टोपी रहल। देश आजाद हो गइल लेकिन नेताजी की मौत से रहस्य के पर्दा आज ले ना उठा पवलें टोपीधारी लोग। भगत सिंह वाली टोपी पहिनले से केहू क्रांतिकारी ना हो सकेला। भगत सिंह त देश खातिर फांसी चढ़ गइलें। रमजान की महीना में रंगिबरंगी टोपी लउकेली। रोजा न रहे लेकिन कपार पर जालीदार टोपी पहिन के कुछ हिंदूवादी लोग भी अफ्तार कइला से ना चुकेलन। टोपी मान ह, सम्मान ह, निशान ह, पहिचान ह। टोपी की प्रकार पर बात कइल जा त बहुत विस्तार हो जाई। मौसम की मिजाज से भी लोग टोपी के चयन करेलन। बरसात में बरसाती टोपी, गरमी में धूपी टोपी आ इ जवन जाड़ा चलत बा येहमा मंकी टोपी ही लउकत बा। कई लोग के मुंडी पर शौकिया हिमांचली टोपी, राजा मंडा वाली टोपी, क्रिकेटवाली टोपी आदि बहुत प्रकार के टोपी शोभा देली। आज कल एगो खास टोपी आम आदमी की कपार उग आइल बा। देश में टोपी उछलउअल के खेल होता। टोपी राजनीति में समइला के भी जरिया बा। आखिर हरज का बा। टोपी पहिन सत्ता में समाई फिर टोपी के उल्टा कर के पीटो -पीटो। धन पीटो। दौलत पीटो। मोटर-गाड़ी, बंगला-लॉकर पीटो। टोपी-टोपी, पीटो-पीटो करत एगो साम्राज्य खड़ा कर दीं। फिर वंशवाद के वेल बढ़ाई। लोकतंत्र की नाम पर राजतंत्र चलायीं।आंख उठाके देखीं, येही वंशवाद की चलते सत्ता कुछ परिवारन की हाथ के खिलौना बन के रहि गइल बा। सब बदलाव चाहत बा, लेकिन एगो नियम बनावला के बात केहू ना उठावत बा कि जे लोकतंत्र के राजा चुना जाई ओकर भाई-भतीजा-भांजा, चचिआउत, पितिआउत, मौसिआउत, फुफुआउत, ममिआउत चाहें कवनो आउत होखे राजनीति में समइला पर प्रतिबंध रही। अगर अइसन नियम बन जा त राजनीति पवित्र हो जाई। इ परिवर्तन रउरी एगो वोट से हो सकेला। वोट माने मत। मत माने बुद्धि। त आई संकल्प कइल जा अपनी बुद्धि के हरण ना होखे दिहल जाई। अब इ कविता-
 रउरी हाथे ही हो जाई, लोकतंत्र के शुद्धिकरण। 
बहुत-बहुत बहुरूपिया अइलें, सबकर हो गइल अनावरण।। 
 सत्ता पवते के ना कइलें, मद-मोह आ लोभवरण।
 पैंसठ साल में एतना चूसलें, चौतरफा हो गइल क्षरण।।
 जनता के हथजोड़ी कइलें, पूजववलें फिर आपन चरण। 
रणक्षेत्र शिखंडी निकरल, बूझत रहलीं वीर करण।। 
जाति-धरम के फसल उगा के, कइले बहुत ही वोटहरण।
 कहें देहाती जगों सपूतों, होने ना दो बुद्धिहरण।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 9 /1 /14 के अंक में प्रकाशित है।  

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

गंदगी हटी, लगीं फूल-पत्तियां

गोरखपुर (एसएनबी)। अभी कुछ दिन पहले तक जहां दुर्गध उठती थी, गंदगी तैरती थी रेलवे ने उक्त स्थल को सुरम्य बना दिया। गोरखपुर रेलवे स्टेशन के प्रथम श्रेणी गेट से आने-जाने वाले यात्रियों को प्रतिदिन इस दुर्गध और गंदगी का सामना करना पड़ता था। गत 17 दिसंबर को क्षेत्रीय प्रबंधक जेपी सिंह की अध्यक्षता में हुई रेलवे परामर्शदात्री समिति की बैठक में भी गंदगी का मुद्दा उठा था। रेल प्रशासन ने पहले तो गंदगी फैलाने वाले लोगों पर अर्थदंड की कार्रवाई की, जिससे गंदगी कम हुई। अब प्रथम श्रेणी के प्रवेश द्वार को सुंदर व सुरम्य बना दिया गया। रेल प्रशासन ने उक्त स्थल पर तीन ब्रेंच स्थापित कर दिये जहां यात्री बैठ रहे हैं। प्रवेश द्वार के बाहर जालीदार गमले बनाये गये हैं जिनमें अब फूल-पत्तियां लगायीं जा रहीं हैं। प्रवेश द्वार पर एक पुलिसकर्मी की तैनाती की गयी है जो गंदगी फैलाने वाले लोगों पर नजर रख रहा है। जो लोग अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे हैं उन्हें रेल प्रशासन अर्थ दंड भी लगा रहा है। गौरतलब है कि बैठक में परामर्शदात्री समिति के सदस्यों ने अफसोस जताया था कि विश्व के मानचित्र सबसे लंबा प्लेटफार्म बनकर गोरखपुर ने जो गौरव प्राप्त किया उसे यहां की गंदगी धूमिल कर रही है। गंदगी के मुद्दे पर सभी सदस्यों की राय पर अध्यक्षता कर रहे क्षेत्रीय प्रबंधक जेपी सिंह सदस्यों के साथ एसी लाउंज से प्रथम श्रेणी गेट तक पैदल चलकर गये थे और देखकर दंग रह गये कि प्रवेश द्वार के दोनों तरफ लोग मूत्रत्याग कर रहे हैं और उससे दुर्गध उठ रही है। उन्होंने सदस्यों को आश्वस्त किया था कि शीघ्र ही प्रवेश द्वार सुंदर व दुर्गधमुक्त दिखेगा। रेल प्रशासन के प्रयास को धरातल पर देखने पर परामर्शदात्री समिति के प्रो. श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी, नर्वदेश्वर पांडेय देहाती ने क्षेत्रीय प्रबंधक को बधायी दी है और बैठक में उठाये गये अन्य मुद्दों पर भी प्रभावी कदम उठाने की सिफारिश की है।
- the report is published in  rashtriy sahara gorakhpur on 3 january 14

एतना फुहड़पन त ना रहे अपनी भोजपुरी में ... नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती

आपन विचार लिखी..

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

हर दिन हो खुशहाल, मुबारक हो चौदह के साल..

मनबोध मास्टर पुरनका जमाना के मनई। अंगरेजी कलेंडर के नवका साल पर ना चाहत भी बधायी देबे में लाग गइलें। गोरखपुर अइसन गंवई शहर महानगर त बन ही गइल, महानगरी संस्कृति में भी बहे लागल। इकतीस की रात से ही हुड़दंगई के जवन सिलसिला शुरू भइल उ पहली के सांझ तक रहल। सिटी मॉल गुलजार रहल। इंदिरा बाल बिहार में लोग मस्त रहे। फारेस्ट क्लब में धमाल मचल। गोकुल, जेमिनी में सर्द रात गरम हो गइल रहे।‘ एक लैला-तीन छैला’ की तर्ज पर लोग एक दुसरे के हैपियावत रहलें। रिलेशनशीप वाला जोड़ी बिंदास अंदाज में एक दूसरे की कमर में हाथ डलले अइसे घूमत रहलें जइसे इ गोरखपुर ना मुंबई के जूहू-चौपाटी होखे। रात में रेस्त्रां-क्लब आ दिन में पार्क में बल्ले-बल्ले। नवहा-नवही के जोश की आलम में पहली के दिन-दुपहरी में व्ही पार्क आ रेलवे म्यूजियम में जवन मेला रहल उ बेजोड़ रहल। सामने की सड़क ले अंड़सल रहल। गांवन में भी नवका साल के बुखार पहुंच गइल रहे। रात भर डीजे बाजत रहे। डीजे पर एक से एक धुन। हई- लक्ष्की हई हाई वोल्टेज वाली.., लालीपाम लागेलू.., मलाई खाये बुढ़वा.., सैंया अरब गइलें. मिसिर जी तू त बाड़ù बड़ा ठंडा.., लगा देंही हुक राजाजी..सहित अइसन -अइसन गाना जवना के एको शब्द एइजा ना लिखल जा सकेला। लिखल ना जा सकेला लेकिन बाजता। नया साल की खुशी में कुशीनगर में बुद्ध बाबा के धरती के भी लोग ‘ शुद्ध ’ कइलें। गुरु गोरखनाथ की मंदिर में भी मेला लागल। बाबा के दर्शन की साथे तालाब में बोट के मजा। रात के खुमार अबे ना उतरल रहे तवले बिहाने से ही बधाई दिहला के सिलसिला शुरू भईल। असों के नवका साल कई मामला में विशेष रहल। पहली जनवरी के कांग्रेसी होखें चाहें भाजपाई, सपाई होखे चाहें बसपाई जब केहू के बधाई दें त अगिला इहे कहे- ‘आप को भी’। मतलब की दु लोगन के बधाई में असों ‘आप’ की खाता में भी बिना मंगले बधाई पहुंचत रहे। जेकरा केजरीवाल से विरोध बा उहो-उहो आप को भी. आप को भी. कही के शेयर करत हवें। वास्तव में इ 14 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के उपस्थिति के एहसास रहे। नया वर्ष पर बस इहे कविता- 
हर दिन हो खुशहाल,
 मुबारक हो चौदह के साल।
 चमकत रहे गाल आ भाल,
 सब लोग हो जां मालोमाल।।
 नहीं कहीं दिखे कोई कंगाल, 
केहू के हो ना हाल-बेहाल।
 रउरों छा जाई तत्काल, 
जइसे छवलें केजरीवाल।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती  भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय  सहारा के 2 /1 /13 के अंक में  प्रकाशित है।
हम अपनी ब्लॉग पर राउर स्वागत करतानी | अगर रउरो की मन में अइसन कुछ बा जवन दुनिया के सामने लावल चाहतानी तअ आपन लेख और फोटो हमें nddehati@gmail.com पर मेल करी| धन्वाद! एन. डी. देहाती

अपना कीमती समय देने के लिए धन्यवाद