गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

बंसल बाबू बघाùर ना हेठी, खुश खाली बाटे रायबरेली- अमेठी

मनबोध मास्टर रेल बजट पर फटे बांस जस सुर निकालत हवें। बोल पड़लें- आखिर उहे न भइल जवना के डर रहल। बजट से निराश मास्टर बंसल बाबू की बजट के बकवास बतावत हवें। ना रफ्तार मिलल ना यात्री सुविधा। अब अगर लोग इ कहत बा कि जेब कटा गइल त कवन बा दुविधा। माल भाड़ा एतना काड़ा भइल बा कि लोग इहे कही। रेल के खेल जनि बुझीं। इ एगो अइसन महकमा ह जवन देश के एक छोर से दूसरका छोर के जोड़ के रखले बा। तरह-तरह के भाषा, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान के एके डिब्बा में लदले दिन रात दौड़ल करेले। रेल देश के सबसे बड़वर मालवाहक तंत्र भी ह। लोग बतावेलें की रेल में चोरी रुक जाय त सोने के पटरी बिछ जाय। एतना कमाई ह रेल की पास। रेल मंत्री की बजट में मनबोध मास्टर बहुत कुछ तलाशत थक गइलें। पूर्वाचल आ बिहार की उपेक्षा पर समीक्षा होखे लागल। भटनी से औड़िहार के दोहरीकरण के कवनो बतिये ना बा बजट में। गोरखपुर से दिल्ली आ मुंबई खातिर रोजे दस गो गाड़ी चाहीं, लेकिन मिलल का? सहजनवां-दोहरीघाट के पुरनका र्चचा नवका बजट में भुला गइलन। आनंद नगर - घुघली आ बस्ती-कपिलवस्तु की बीचे जवन रेल लाइन बिछावे के घोषणा भइल येह से तनिका सा मरहम लागल, घाव ना ठीक भइल। घाव कब ठीक होई? येह पर संदेह बा। बंसल की बजट पर मनबोध मास्टर के एगो सवाल भारी बा। बोललें- हमरा क्षेत्र के का मिलल? ठेंगा। सरकार की गजट पर, रेल की बजट पर बस इहे कविता-
 बंसल बाबू बघारù ना हेठी।
 खुश खाली बाटे रायबरेली अमेठी।।
 हमरा त पहिले ही रहल आशंका। 
लालू अस राउर बाजी ना डंका।।
 गोरखपुर-दिल्ली भूसे अस भराई। 
मुंबई जाये वाला बइसे ठुसाई?
 पवले उहे जहां एमपी कांग्रेसी। 
रउरा बुझलीं की दे दिहलीं बेसी।।
 सोनिया की क्षेत्रे में दर्जन भर गाड़ी।
 एही से उ लहरावेली साड़ी।।
 राहुल की अमेठी पर बहुत मेहरबानी।
 गाड़िन के लाइन लगवले बानी।। 
सलेमपुर गोरखपुर बांसगांव ठेंगा।
 कहिया ले आई एइजा गांगू के हेंगा।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के २८ /२ /१ ३ के अंक में प्रकाशित है .

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

कुंभ में अमृत झरत रहे..

 
कुंभ। अमृत से परिपूर्ण कुंभ। हरिद्वार, प्रयाग, पंचवटी आ उज्जैन में हर बारह साल बाद लगे वाला कुंभ। समुद्र मंथन से निकले वाला कुंभ। बैकुंठ के समतुल्य पवित्र कुंभ। क्षीरसागर के देव-दानव की साझा मंथन से निकरल कुंभ। धंवंतरीरूपधारी भगवान विष्णु की हाथ में शोभायमान कुंभ। बहुत महिमा ह कुंभ के। कुंभ की येही महिमा की बीच प्रयाग में लगेवाला 2013 के कुंभ बहुत कुछ छोड़ गइल-सोचे, विचारे आ बतकही खातिर। मनबोध मास्टर त ‘ मन चंगा त कठवति में गंगा ’ की विचार धारा के पोषक हवें। कबीर बाबा के पंक्ति- ‘ जल में कुंभ, कुंभ में पानी.., यह तथ कथौ ज्ञयानी’। दुहरावत रहें। भीड़, भगदड़ आ भेड़ियाधंसान से बहुत दूर रहे वाला मनबोध मास्टर आज मगन ना गमगीन हवें। गम के कारण बा कुंभ हादसा। बहुत खुरपेचला पर बोल पड़लें- जेकरा मन में बहुत दिन से कुंभ नहइला के लालसा रहल उहे न प्रयाग गइल। कुंभ नहइला के पुन्य कमइला के होड़ मौनी अमावस्या के सबसे अधिक रहल। कुंभ में अमृत झरत रहे। अमृत से नहइला की बादो लोग काहे मरत रहे? पुन्य केतना मिलल, येह सांसारी आंखि से ना लउकी। जवन लउकल तवन त बहुत दुखदायी रहे। कुंभ की अमृत खातिर राहु आपन शीश कटा दिहले रहे, लोग अमृत में नहइला की बादे अपना घरे जल्दी लौटला की चक्कर में जान गंवा दिहल। कुंभ की पुन्य की चक्कर में केहू आपन माई गवां के रोवत बा, केहू भाई गवां के रोवत बा। केहू के जीवनसाथी बीच मझधार में ही साथ छोड़ के चलि गइल, सदा खातिर बिछड़ गइल। बहस जारी बा। केकर जिम्मेदारी बा। प्रदेश सरकार केंद्र वाली रेल व्यवस्था पर त केंद्र प्रदेशवाली प्रशासनिक मशीनरी पर कुंभ हादसा के ठीकरा फोरत बा। हादसा में मोक्ष पवले लोग के समय पर पचास रूपया के कफन भले नसीब ना भइल। सरकारी घोषणा में परिजन लोग सात लाख पइहें। सरकार सात लाख दे या सत्रह लाख। जे चलि गइल, उ ना लौटी। जायेके त सबका बा। दुनिया के रीति ह- ‘ आया है सो जायेगा, राजा रंक फकीर..’। असो के कुंभ एक बात साफ क दिहलसि। धरती पर धरम अबहिन जिंदा बा। अइसने धरम-करम की बल पर धरती टिकल बा। तीन करोड़ धार्मिक लोगन के प्रयाग की धरती पर संगम भइल। अगर सात्विकता ना रहित, धार्मिक प्रवृत्ति ना रहित त काहें लोग कुंभ नहाये जाइत। उम्मीद से अधिक आस्था जागल रहे। सरकारी ताम-झाम भले बहुत रहे, इंतजाम कम रहे। एतवत बड़वर आयोजन में कुछ बात के सावधानी भी जरूरी बा। पुन्य कमइला की बाद, घरे लौटला के जल्दी ना रहे के चाहीं। भेड़ियाधंसान प्रवृत्ति से भी बचे के चाहीं। आस्था के एतना बड़वर सैलाब के कंट्रोल ना कवनो सरकार क सकेले ना कवनो व्यवस्था। कुंभ में मोक्ष पवले लोग की प्रति आपन श्रद्धा प्रस्तुत करत बस इहे कविता-
कुंभ में अमृत झरत रहे, नहइला की बाद भी लोग मरत रहे।
 जे मरल मोक्ष पा गइल, परिजन की आंख से आंसू ढरत रहे।।
एतवत बड़वर भीड़ के संभालल, आसान ना रहल।
व्यवस्था में लागल लोग इंसान रहल, भगवान ना रहल।।
 जे आइल बा, जइबे करी, जन्म की बाद मृत्यु के अवस्था ह।
पचास रुपया के कफन ना मिलल, अब मिली सात लाख इ व्यवस्था ह।।
 
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य 14/2/13 को प्रकाशित है .

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

आगे चलेले हल्ला गाड़ी, तोड़े -फोड़े और उखाड़ी,,,

मेरा यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 7/2/13 के अंक में प्रकाशित है
आगे चलेले हल्ला गाड़ी, तोड़े -फोड़े और उखाड़ी,,,
सुघ्घर गोरखपुर। सुंदर गोरखपुर। सपना के बात बा। शहर की बखरे त अतिक्रमण के सौगात बा। सड़किया के हाल त अबरा के भौजाई अइसन बा। जेही का मन करे कब्जिया ले। सड़क छेकला की होड़ में जी तोड़ मेहनत करत अतिक्रमणकारी लोग अइसन छेकत हवे कि जब जाम लागत बा त मोटर गाड़ी, चारपहिया सवारी के बाति के कहे साइकिल कान्हें पर लादि के आगे निकरे के परत बा। पैदलिहा लोग त गुरिल्ला अइसन कूदत-फांदत कइसो निकर जात हवें, लेकिन मरो चारपहिया वाले। बड़ा शौक से गाड़ी खरिदलें की फरफरात उड़त चल जाइब। इ ना जानत रहलें कि शहर में जाके फंसि जाइब। ठेला- गुमटी वाले ही कसम ना खइलें हवें अतिक्रमण करे बदे, प्राइवेट स्कूलन के बड़े-बड़े बस, पीछे मोटहन अक्षर में लिखल-‘सावधान बच्चे हैं’। बीच सड़क में ही बस खड़ा कर के बच्चे उतारत हवें आ पीछे लगल जाम के वाहन पों- पों, टें-टें करत हवें। बहुत हिम्मत क के नगर निगम के बुलडोजल हल्ला गाड़ी बनि के सड़क पर उतरल। दिनभर तोड़-फोड़, ध्वस्तीकरण। शाम तक सड़क के पटरी फिर गुलजार। के बा येकर जिम्मेदार? के बा जवाबदेह? नगर निगम आ ट्रैफिक पुलिस के डंडा चलत बा। अतिक्रमण हटत बा। दुबारा कब्जा होत बा त जवना क्षेत्र में अतिक्रमणकारी फेर आपन थुन्ही-खंभा खड़ा करत हवे ओह क्षेत्र के पुलिस का करति बा? अतिक्रमण हटाऊ दस्ता रास्ता खाली करावत बा त दूसरे दिन फिर अतिक्रमण कइसे पांव पसार लेत बा? जवाब बहुत आसान बा। क्षेत्र के पुलिस ही मेहरवान बा। कस के मुकदमा लिखे , चांप के जेल भेजे सब सुधर जाई । पुलिस जब तक सुधारसिंह की रूप में ना दिखी शहर के सूरत अइसे ही दिखत रही। दु दिन हल्ला होई-भाग रे भाग! हल्ला गाड़ी आवत बा। फिर बैतलवा ओही डाल। बेतियाहाता के एगो गरीब दुकानदार का जेतना अपनी दुकान टुटला के दुख ना बा ओतना दुख येह बात के बा कि दूसरी पटरी पर कब्जा कइले बड़ लोग पर बुलडोजर काहे ना चलल। महानगर की अतिक्रमण पर बस इहे कविता-
अइसे भला कइसे मिली, इहां जाम से मुक्ति? 
जाम-झाम की नाम पर, नगर निगम के युक्ति।। 
नगर निगम के बुलडोजर, नाम बा हल्ला गाड़ी।
 शाम को फिर गुलजार हुआ,दिन भर बहुत उखाड़ी।। 
महानगर में फेल होत बा, सचमुच यातायात। 
अतिक्रमण की निर्लज्जता, के क्या कहने बात।।
 बलशाली है कब्जाधारक, कोई बांह न सकै मरोड़। 
सिविल लाइन्स, रेलवे, बचल ना कवनो मोड़।।
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