बुधवार, 12 दिसंबर 2018

रमन गए, रानी गयी और गए शिवराज

रमन गए , रानी गयी और गए शिवराज।
ऐसे ही यदि चले तो, जाएगा मोदी राज।।
वादाखिलाफी के चलते, दिखा है जनाक्रोश।
पप्पू का करिश्मा नहीं, यह फेकूँ का दोष।।
कथनी करनी में जब भी, अंतर हुआ महान।
धरती पर हरदम गिरे, जो उड़े बहुत आसमान।।
14 वाले संकल्प पत्र को, करिये फिर से याद।
पूरा करेंगे तभी उन्नीस में,जनता सुनेगी फरियाद।।
कहें देहाती जनता को बनाओ मत अब उल्लू।
समझदार हर वोटर है, लो बाबाजी का ठुल्लु।।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

जीयते बेटवा हाल न पूछे, मरते पीपर पानी

जीयते बेटवा हाल न पूछे, मरते पीपर पानी

घर घर के इहे कहानी बा। जीयते बेटवा हाल न पूछे, मरते पीपर पानी। घर के बूढ़ पुरनिया जीयते भले एक गिलास पानी खातिर हाय हाय करीहें। पानी मिली की ना मिली इ परिजन की ऊपर बा। लेकिन ई बात सोरहो आना साँच बा कि मरला पर पीपर की पेंड़ पर घंट बाँध के पानी दिआई। राजनीति में भी कुछ अइसही चलत बा। काल की कपाल पर रोज लिखत मेटावत आपन कविता सुनावत राजनीति के चमकत नक्षत्र अटल बिहारी जी 2004 की बाद से ही हासिये पर धकियावत धकिआवत 2014 में भाजपा की बैनर पोस्टर से भी धकिया के बाहर क दिहल गईलें। एगो मदारी अईसन आइल की झूठ, प्रपंच की सहारे चार साल सत्ता चलवलसि। ओह बीच न अटल चाचा याद अइलन, न जोशी आडवाणी। कारण ई रहे कि 56 इंच के सीना वाला प्रधानमन्त्री देश की गद्दी पर बैठ गईल। 14 में जनता के ललचवलस धारा 370 कश्मीर से हटाईब। विदेश से काला धन स्वदेश लाइब। सबकी खाता में 15 लाख देईब। रामजी के मन्दिर बनवाईब। गो हत्या बन्द कराईब। देश में समान नागरिक संहिता ले आईब। 18 ले कुछ ना क पवलसि। येही बीचे भारत के महान सपूत 9 साल से बिस्तर पकडले पकडले आखिरकार बिस्तरवो छोड़ दिहलें। 16 अगस्त 18 के घोषणा हो गईल की अटल चाचा दुनिया छोड़ डीहलीं। अब शुरू भईल लाश आ राख के राजनीति। जवना अटल चाचा पर महंगाई के आरोप लगा के मनोज तिवारी गाना गावत रहलें- वाह रे अटल चाचा, पिअजुईआ अनार हो गईल। तेल पीके सरसों के, ई देशवा बेमार हो गईल। ओहि अटल चाचा की लाश पर राजनीति शुरू हो गईल। देश के ध्यान महंगाई औ भरष्टाचार से हटावे खातिर। आपन कईल वादा जवन पूरा ना भईल ओह से ध्यान हटावे खातिर अटल चाचा के अस्थि देश के सजो नदी में विसर्जित क के आंसू बहावल गईल। हद त तब भईल की सबकर पुण्यतिथि एक साल में मनावल जाला, अटल जी के मासिक पुण्य तिथि अटल काब्यञ्जलि की नाम से जगह जगह मनल। राजनीति ही ना, घर घर के इहे कहानी बा। एहिसे कहिलें-
जीयते बेटवा हाल न पूछे, मरते पीपर पानी।
राजनीती ही ना ये भाई। घर घर के इहे कहानी।।
जब ग्राफ लगल घटल। तब जपें अटल अटल।


गुरुवार, 15 जून 2017

एगो कविता देखल जा

एगो कविता देखल जा, केतना सधत बा आजकल की चुनाव पर-
लाज न बा तनिको उनका, मेहरारू कù सीट आ मरद मरेंले।
आंखि पसारि के देखीं तनी, चारो ही ओर अनेति करेंले।।
सरकार इ काहे आरक्षन देति, नाम बा मादा के नर ही दिखेंले।
सेनुर, बिंदी आ चूड़ीबिहीन, साड़ी की आड़ में मरद लड़ेंले।।
बाति कहब फरिछा, केहू का मीठ लागी केहू का मरिचा। हम जानत हई कि बाति बा निरकेवल, केहु के भतार रुठिहें केहू के देवर। नगर निकाय की चुनाव में जवन देखत हई उहे बकत हई। आरक्षन की तहत सीट भले मेहरारून खातिर रिजरब बा, असली लड़ाई त मरदे लोग लड़त हवें। मादा की सीट पर मर्द लोग माद्दा देखावत हवें। हाथ जोड़ले, दांत निपोरले सांझ -सबेरे धावत येह आरक्षन घोटू प्रतिनिधि के देख के इहे कहल जा सकेला कि मेहरारून की हक पर डाका डालेवाला हवें। जवन मेहरारू आपन हक लुटावत हई उ अपनी पद के गरिमा कहां ले बचा पइहन। संविधान की अनुच्छेद 14 से लगायत 18 तक नर-नारी के समानता के अधिकार दिहल गइल। संविधान की तिहत्तरवा आ चौहत्तरवा संशोधन अधिनियम 1993 में सरकार मेहरारू लोग के आरक्षन देके पंचायत आ नगर निकाय की महत्वपूर्ण पद पर पहुंचे के रास्ता सरल बना दिहलसि। पहिले 33 प्रतिशत आरक्षन दियाइल। बाद में आरक्षन के प्रतिशत 50 हो गइल। महिला सशक्तिकरन पर लंबा चौड़ा भाषन लोग भले झारि दे, लेकिन महिला आरक्षन के लाभ पति, पुत्र, ससुर, देवर, भतीजा अइसन रिस्तेदार ही उठावत हवें। दरअसल मेहरारू आ चना के हाल एक जेइसन बा। जेइसे मनई चभक के चना के मुंह में डार लेंले। चना हरिअर होखे चाहे पाकल। खेत में होखे चाहे खरिहान में। कच्चा होखे चाहे भुनल। कहल जाला कि भगवान की दरबार में न्याय मांगे गइल चना पर भगवान जी के भी लार चुये लागल। ठीक उहे हाल महिला लोग के बा। सीट सभासद के होखे चाहे अध्यक्ष के। फुफुती की आड़ से रिस्तेदार लोग ही लड़त बा। नाम मादा के आ मलाई नर लोग चाभत बा। छोटकी पंचाइत में मेहरारू लोग के कोटा मरद लोग पूरा कù देत बा। बड़की पंचाइत में इ सब संभव ना बा । येही से रजनेतिहा लोग लोकसभा, राज्यसभा आ विधानसभा में महिला आरक्षन ना दिहल चाहत हवें। महिला आरक्षन तबे सार्थक होई जब मेहरारू लोग में संपूर्ण नारीत्व जागी। लोहिया जी कहले रहलें- ‘शक्ति’ मौका अइला पर प्रकट होले। अब मौका त आइल बा। शक्ति के शोषण करे वाला पुरुषवादी प्रभुत्व से बची तब न आपन शक्ति देखाई।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 14 जून 2012 के अंक में प्रकाशित है

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