गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

कान खोल के सुनिलù साधो, कहते दास कबीर. ना लहै तù तुक्का समझौ, लहि गयो तù तीर

यूपी में महाभारत 2012 चालू हो गइल बा। सजो सेना सजि गइल हई। आरोप-प्रत्यारोप के दौर शुरू बा। एही बीच में कबीर बाबा की दरबार में कुछ प्रत्याशी-ओरतासी पहुंचलें। कहलें बाबा! हमरा पक्ष में कुछ कवित्तई लिख दीं। बाबा बोललें- कान खोल के सुनिलù साधो, कहते दास कबीर। ना लहै तù तुक्का समझौ, लहि गयो तù तीर।। कबीर बाबा के इ कवित्तई देखीं कवना सेना पर केतना सधत बा।
सेना नंबर एक-        अफसरन से चोरी करववलू, कमीशनखोरी खूब मचवलू। 
                                  अब तù गद्दी छोड़ मैडम, रोंआं-रोंआं बड़ा दुखवलू।।
                                     अफसर चोर, मंत्री दलाल, खूब तू भइलू मालोमाल।
                                   दुहि के सबके कइलू ठठरा, अब भ्रष्टाचार के नाम हलाल।।
सेना नंबर दो-       जेकरा याद गुंडई आई, उनकी पर ना मोहर लगाई।
                         उनकर भाई भतीजा बेटवा, आखिर कबले एकछ खाई।। 
                      उनकी छाती चढ़ि हम हुंमचवलीं, उनके रसातल में पहुंचवलीं।
                      पनके देइब सभै नहि अबकी, माठा डालि के हमीं सुखवलीं।।
  सेना नंबर तीन-                     हमरा त पता ना रहे, अइसन भी युग आई। 
                                            जन्म हमार भइल बा कहंवा? न्यायालय बतलाई।।
                                           हमरी नावे पार उतरलें, कटलें खूब मलाई। 
                                         कुरसी पवलें हमें भुलक्ष्लें,अब जनता उन्हें भुलाई।।
  सेना नंबर चार-         जागù जागù बबुआ, जागù हो किसान। 
                                 यूपी के बदल द अबकी, शुरू करù अभियान।। 
                                 जाति-पाति से उपर उठù, मति अचिकौ कुम्हिलाय।
                                 सबके न्याय सुरक्षा मिली, इ जुमला दोहराव।।
सेना नंबर पांच-                        छोट दल मति बुझù, बड़ बा बड़ा इरादा।
                                               कठफोड़वा की चोंच मरले, जाला निकल बुरादा।।
                                                   छोटे-छोटे नथिया से पड़ेला नकेल।
                                                     दाव चढ़ि जइबù, देइ छोटके ढकेल।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह  भोजपुरी व्यंग्य  राष्ट्रीय सहारा के २८ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

चलù चलीं जां नदी किनारे घाट बइठ के गिने लाश..



जिस्म कांपे, हाड़ कांपे, रुह में भी कपकपी।
सौ-सवा सौ रोज मरते, केकर-केकर नाम जपीं।।
भीड़ से अचिका सा हटिके, इहो तमाशा देखिं लीं।
बंट रहल कंबल बा कइसे, गहरा कुहासा देखिं लीं।। 
गील बोटा उठे धुआं, तापीं अलाव ना हो निराश।
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
ठंड से मुअत मनई अखबारवाला छापत हवें।
सरकारी महकमा के देखीं, टंपरेचर बस नापत हवें।।
उनकी फाइल में ना जाने, मृतकन के नाम कहवां गइल। 
माघ जे ना निबुकी, जमराज की उहवां गइल।। 
साहब कहें कि लाश के चिरवा के कराùव एहसास। 
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
ठंड मारत जान बाटे, गरीबन की घर में घुसिके।
सरकार सुतल आंखि पट्टी, कान रुई ठूंसिके।।
कुछ बहुरुपिया जनसेवा के स्वांग रचा मुसकात हवें।
बांटत हवें सरकारी सेवा, याकि सीधे खात हवें।।
कब मिटी इ धुंध घेरलसि, बा जवन विरोधाभास।
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
मार कोहरा के परत , जनजीवन सब ठप्प बा।
रेल बस वायुयान लेट, का इहे बतिया गप्प बा।
सर्दी के सितम से केतनन के डोंटी ढील बा। 
जोड़न में दर्द अंकड़न बा, जइसे धंसल कोई कील बा।। 
दांत बाजत कड़कड़ात कइसे बीती इ पूस मास। 
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
बहुतन के धइलसि झुनझुनी, केतनन के अंग सुन्न बा।
माथा पिरात कस के बा, बेहोश बा कि टुन्न बा।।
भीड़ अस्पताल में बा, समस्या बड़ी विकराल बा।
सर्दी शीतलहर कहीं कि साक्षात इ त काल बा।।
हम गिन-गिन छापीं ठंड मरन, उ कहलें इ बकवास।
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती की यह व्यंग्य रचना राष्ट्रीय सहारा के २२ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

जेतने कपड़ा ओतने जाड़, जाड़ की मारे कांपे हाड़


हाड़ कंपा देत जाड़ में किकुरल कांपत- मनई के जिनगी खाड़ हो गइल बा। जाड़ के लेके बहुत कहावत कहल गइल। जइसे- ’लइकन के हम छुअब नाहीं, जवनका लगे जेठ भाई। बुढ़ऊ के हम छोड़ब नाहीं, चाहें केतनो ओढ़िहै रजाई‘। जाड़ से कांपत लोग भगवान के कइसे गोहरावेलन, एहु पर कहावत कहल गइल-’दई दई घाम करù, सुगवा सलाम करे, तोहरे बलकवा के जड़वत बा। पुअरा फूंकि-फूंकि तापत बा‘। जाड़ से बचे के उपाय भी पुरनिया लोग बतावल- रूई,धुईं या दुई। रूई के जे बहुत हल्लुक बुझत होखे उ मुगलता में ना रहो, रूई एतना भारी ह कि जाड़ के बाड़ के रूप में काम करेले। रूई के आशय गरम कपड़ा से भी बा। धुईं के मतलब अलाव, साधु-महात्मा के धुईं। आ दुई के मतलब त रउरा सभे बुझते होखब। जीवन की गाड़ी के दु पहिया- एगो मरद त दुसरका मेहरारू। मेहनतकश इंसान का कइसन ठंड। गांव-देहात में पटवन चलत बा। जाड़ से भले लोग के हाड़ कांपत होखे लेकिन जे खेते में हत्था लेके उतर गइल ओकरा केइसन जाड़। दस हत्था की बाद त पसीना निकल जाता। बिजली के दशा बाउरे बा। डीजल की मंहगी से किसानन के गरमी छिटक जाता। ऐही बीचे अगर केहु के पंपसेट ठंडाइल त अउर गरमी बढ़ जाई। जे गाय-भैस पलले बा ओकर गोबर- पानी करे में जाड़ देखल जाई त दूध की बेरा उ लात देखा दी। रोज कमा रोज खा वाला मनई की जिनगी में कइसन जाड़? कमाई तबे ना खाई। जेके जाड़ सताई उ त इहे दुहराई-’ना सौ बाघ ना एक माघ‘। जेकरा मेहनत मजूरी से पेट भरे के बा उ कही- ’आधा माघे कंबल कांधे‘। जाड़ा से लइकन के बचावे खातिर जिला के साहब फरमान सुनवलें कि स्कूल साढ़े नौ बजे खोलल जाव। सरकारी स्कूल में त साहब के फरमान लागू हो जाई लेकिन प्राइवेट वालन के हाल त गजबै बा। साते बजे घंटी बाजत बा। लइकन के तैयार करावल में महतारी लोग का आ स्कूल पहुंचवला में बाबुजी लोग का एह ठंड में परेशानी उठावे के परत बा। ओइसे भी जेकर लइका कान्वेंट में पढ़ी ओकर ठंड कमे लागी। पीठ पर एतना भारी बस्ता रही कि दनाइल रही। गार्जियन भी गरमाइल रहिहन कभी ड्रेस के लेके त कबो फीस के लेके। जाड़ा से कई जने के नाड़ा उकसि गइल बा। बुढ-पुरनिया पर एकर गहगर मार गिरत बा। कई जने असमये सरग सिधारत हवें। प्रशासन के घोषणा बा कि ठंड से केहु के ना मरे दिहल जाई लेकिन जवन खबर आवत हई ओहमा रोज ठंड से इतना मरे..। एही मुआवे वाली ठंड पर इ कविता-
जेतने कपड़ा ओतने जाड़। जाड़ की मारे कांपे हाड़।।
किकुरल कांपत जिनगी खाड़। सजो व्यवस्था चूल्हा भाड़।।
तपता मनई ढीला नाड़। फूंकत पुअरा उजरत बाड़।।
अइसन ठंड करेजा फाड़। मरि गये बुढ़ऊ घोठ उजाड़।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के १५ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

सपा काला दिवस को भूली , शौर्य दिवस भाजपाई ....



मनबोध मास्टर भिनही-भिनही फटाफट अखबार के पन्ना पलटत रहलें। कहीं कुछऊ ना लउकल। ताजिया दफन आ बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस , कपिल के कूटिनीतक बयान आ कुछ अवर छोट-बड़ खबर। सात दिसंबर की अखबार में सन 93 से पिछला साल ले कहीं शौर्य दिवस त कहीं काला दिवस के खबर। येही खबरन से लोकल छपसुअन के फोटू-ओटू लउक जात रहे। असों सात दिसंबर के अस करेड़ कुहासा पड़ल की इ दुनो के समर्थक भी किकुरले रहि गइलें। लगल कि दुनो की दुकानदारी मंदी की मार से घाही हो गइल बा। होखहु के चाहीं, आखिरकार कहिया ले धरम-करम की नाम पर नफरत बोअल जाई। दरअसल जेकरा पक्ष में काला दिवस मनावल जात रहे उ सजो लोग असों मोहर्रम के मातम मनावला में लागल रहे, आ शौर्य दिवस वालन के चेहरा लोग पहिचाने लिहल। झगराहे घर सही रामजी आराम से ओहमा विराजमान रहलें। इ बहादुर लोग अइसन शौर्य देखावल की सब ढहा दिहल आ अब रामजी प्लास्टिक की नीचे शीत- घाम-बरसात सहत हवें। बिना मतलब जरला पर नमक कबले छिरकाई। मास्टर के ’पर-वचन‘ सुनते मस्टराइन कउड़ा की लहास अइसन धधक गइलीं। बोलली िबहाने से राजनीति की चर्चा में दुपहरिया हो गइल, ना खइहें ना खाये दिहें। मास्टर कहलें - हम कहां तोहका रोकलें हईं, झुठों न सती होत हऊ। खा खींच के। के ना खात बा। बहुत जाने का खइला से देहिं पर चर्बी चढ़ जाता त खात-खात रोगी बनि के दवाई खात हवें। अफसर-मंत्री रिश्वत खात हवें। जब फंसत हवें त जेल के हवा खात हवें। ठेकेदार-इंजीनियर कमीशन खात हवें। संत-महंत, पंडा- पुजारी धरम की नाम पर मंदिर के चढ़ावा आ ठाकुर जी पर चढ़ावल प्रसाद खात हवें। सूदखोर व्यापारी व्याज खात हवें। कोटेदार-प्रधान-प्रधानाध्यापक मिल के लइकन के मिडडेमील खात हवें। छेड़खानी करे वाला छछुनर चौराहा पर चप्पल खात हवें। बेइमान कोर्ट-कचहरी में कसम खात हवें। बेरोजगार लोग नौकरी खातिर आ यात्री लोग रेल-बस में यात्रा खातिर धक्का खात हवें। कुर्सी की चाह में युवराज, नेताजी के पुत्तर आ स्वाभिमानी जी गांव गली चौराहा पर रथ से चक्कर खात हवें। वोटर नोट खात हवे आ नेता वोट खात हवें। येही व्यवस्था में सब चलत बा। खइला-खियावला के बात छोड़ù आज की दशा पर हमार कविता सुनù-
मन मैला उजला बसन, भासन लच्छेदार। 
शौर्य दिवस काला दिवस, दोऊ को धिक्कार।। 
प्रजातंत्र के पेड़ पर , यह गिद्धों का बोल।
मरे-कटे जनता भले, ये तो करें किलोल।। 
अबकी बारी छह दिसंबर, क्यों भूल गये है भाई।
    सपा काला दिवस को भूली , शौर्य दिवस भाजपाई .... 11
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ८ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

जस लखनऊवा ‘मैडम’ बोलें तस दिल्ली क ‘बाबू’

अरे भइया जी! इ पब्लिक ह, सब जानेले, लेकिन चुप्प मारि के बइठल रहेले। जब जनावे के समय आवेला त खंड-खंड में बंटि जाले। जब पब्लिक के सब्र के बांध टूटेला त कनपट्टी ले पहुंच जाला। एकै चांटा में देश-विदेश गूंज जाला। जेकरा पर गिरेला ओकर कान सुन्न हो जाला, लगेला भूकंप आ गइल। ‘रियेक्ट’ पैमाना पर खाली पंजा के निशान लउकेला। लोग गावेला- अइसन मरलसि चांटा , गलवा लाल हो गइल। महंगी के चलते इ बवाल हो गइल.। दिल्ली क ‘बाबू’ पडरोैना में नवहन के जगावत रहलें। प्रदेश के तकदीर बदले खातिर नवहन के उकसावत रहलें। इलाहाबादी पढ़वइया‘ हम भिखमंगा नहीं, शर्म करो.’ के नारा लगावत डी एरिया में वइसे पर्चा फेंकलें जइसे एसेंबली में भगत सिंह बम फेंक देले होखें। बाबू की पार्टी-पउवा वाला और कुछ वर्दीधारी वीर नवहन के चिउरा अस कूटि मरलें। सांच सहलो खातिर बड़वर करेजा चाहीं। एक पखवारा ले रजनीतिहा लोग पूर्वांचल के खूब धंगारल ह। केहू स्वाभिमान जगावल ह, त केहू क्रांति मचावल ह। केहू का जन सरोकार से कवनो मतलब ना बा। सब कर लक्ष्य सिंहासन बा। दिल्ली बाला बाबू गरीब की घर रोटी खात हवें। अरे भइया जी! द्वारिकाधीश ना हवें कि सुदामा जी के दू मुट्ठी चाउर चबा के दु लोक के राज थमा दीहें। इ राजनीतिक नौटंकी ह। रहल बात गरीबी मेटावे के, त इ नारा त बाबू के पुरखा-पुरनिया भी देते रहि गइलें। उ सब सरगे गइलें, हम्मन नरक भोगत हई। बाबू के पिताश्री, दादी श्री, दादी के पिता श्री(मतलब बुढऊ नाना श्री) की जमाना में भी गरीबी हटाओ के नारा खूब चलल। गरीबी ना मिटल, गरीब लोग के नाड़ा ढील हो गइल। अब बाबू कहत हवें-‘लखनऊवा हाथी पैसा खा रहा है’। अरे भइया जी! जेकरा पचावे के पावर रही उ न खाई। रहल बाति हाथी के त रउरा जानते हई हाथी के पेट जब्बर होला। पब्लिक का दू जून के रोटी-नमक आ रात के चैन के नींद चांहीं। सुने में आइल कि बाबू के सपना में भी हाथी डरावत बा। इ हम ना, लखनऊवा मैडम कहत हई। बाबू चिहुंकी- चिहाई जनि, कुछ ‘उपरवार’ देखवा लीं। अइसन गंजबांक लगाई कि हाथी होंयùùùù.. कहि के बइठ जा। दिल्ली क बाबू आ लखनऊवा मैडम की पोलिटिकल ‘रड़हो-पुतहो’ पर इ कवित्तई बहुत सधत बा-
बोली पर संयम नहीं, नहीं जुबां पर काबू। 
जस लखनऊवा मैडम बोलें, तस दिल्ली क बाबू।।
अपने-अपने ढंग से, गरीबी रहे मिटाय।
सत्ता सुख आ सिंहासन , खातिर ही चिच्ंिायाय।।
बाबू ,उनकर बपसी, दादी, अउरी बुढ़ऊ नाना।
खूब मेटवलें गरीबी के, बीतल कई जमाना।।
चार पीढ़ी आ चार दशक, कइले सत्ता भोग।
लखनऊवा मैडम करें, पोलिटिक्स क योग।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ०१ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .
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