सोमवार, 30 दिसंबर 2013

प्रगतिशील लेखक संघ व गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को प्रेस क्लब के सभागार में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में हिंदी, उर्दू और भोजपुरी के कवियों की एक से बढ़कर एक की गई प्रस्तुतियों से ऐसा लगा जैसे यहां काव्य की त्रिवेणी बह रही हो।

आपन विचार लिखी..

हिंदी, उर्दू व भोजपुरी की बही त्रिवेणी

 
प्रगतिशील लेखक संघ व गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को प्रेस क्लब के सभागार में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में हिंदी, उर्दू और भोजपुरी के कवियों की एक से बढ़कर एक की गई प्रस्तुतियों से ऐसा लगा जैसे यहां काव्य की त्रिवेणी बह रही हो। शहर में रचनात्मक संवाद को आम बनाने तथा रचनाकारों को परस्पर गंभीरता से लेने पर जोर देने के के उद्देश्य से आयोजित कविता-पाठ, अध्यक्ष मंडल के सदस्यों डॉ. चितरंजन मिश्र, डॉ. अजीज अहमद, डॉ. जनार्दन एवं प्रेस क्लब अध्यक्ष रीतेश मिश्र की उपस्थित में संपन्न हुयी। कविता-पाठ का शुभारंभ नर्वदेश्वर पाण्डेय ‘देहाती’ की भोजपुरी कविता ‘आरक्षण में गांव गईल, लोग बोले बहुबोली। खायीं खायीं ना प्रधान जी, बर्दास्तवाली गोली से हुआ। इस अवसर पर सत्यम सिंह और अभिनव मिश्र की कविताओं को विशेष तौर पर रेखांकित किया गया। उन्हें भविष्य के सार्थक रचनाकार के रूप में देखा गया। लखनऊ से आये शायर बश्ना आलमी की गजलों और कतआत को गंभीरता से लेते हुए कहा गया कि इनकी शायरी में आम जिंदगी की आहट है। डॉ. वेद प्रकाश पाण्डेय के दोहे सम-सामयिकता को रेखांकित कर रहे थे तो वहीं डॉ. अखिलेश मिश्र की कविता ‘तुमको पाया भी नहीं पर भुलाया भी नहीं, काबिले तारीफ रही। वीरेंद्र हमदम की कविता ‘मटमैली दुनिया को ज्यादा कोसो मत, अक्सर नये नोट भी जाली होते हैं। वफा गोरखपुरी ने ‘दीवार नफरतों की गिरा देना चाहिए। जो रो रहे हैं उनको जगा देना चाहिए। ने इस गोष्ठी को मानो जगा दिया हो। कविता पाठ में सुरेंद्र शास्त्री, डॉ. रंजना जायसवाल, डॉ. अनीता अग्रवाल, अर्शी बस्तवी, श्रीधर मिश्र, आडीएन श्रीवास्तव, जगदीश नारायण श्रीवास्तव, वेद प्रकाश आदि ने अपनी रचनाओं से गोष्ठी को समृद्ध किया। कविता पाठ का संचालन महेश अश्क तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रमोद कुमार द्वारा किया गया। इस दौरान प्रेस क्लब का सभागार बुद्धिजीवियों, पत्रकारों एवं कवियों से खचाखच भरा रहा। लोगों ने घंटों खड़े रहकर काव्य- पाठ का रसपान किया। प्रगतिशील लेखक संघ व गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब की सं युक्त प्रस्तुति

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

जैसी बहै बयार, पीठ तब तैसी कीन्हो..

मनबोध मास्टर राजनीतिक निष्क्रियता, प्रशासनिक अकर्मण्यता, आर्थिक अस्थिरता से उपजल महंगाई आ सामाजिक जीवन में डेग-डेग पर भभोरत भ्रष्टाचार से बहुत दुखी हवें। थोड़का सा सकुन मिलल कि दिल्ली में आम आदमी अपनी ताकत के एहसास करवलें। नेता लोग की खिलाफ उपजल गुस्सा वोट बन के गिरल त राजनितिक पंडितन के बोलती बंद हो गइल। राजनितिहन के जाति, धर्म आ क्षेत्रियता के फार्मूला फुस्स हो गइल। नया जोश, नयी उम्मीद, नयी ताकत से उभरल आम आदमी पार्टी। राजनीति के मुलम्मा चढ़ते आप नेता के बोल भी राजनीतिक हो गइल। सच कहीं त लगता पढ़ाई की समय में बहुतन की तरह खूब विद्या माई के किरिया खाये वालन की लिस्ट में अव्वल रहल होइहन केजरीवाल। दिल्ली में विधान सभा के चुनाव परिणाम आइल त पहिले आप, पहिले आप के सुर चलल। केजरीवाल साहब अपनी बच्चन तक के किरिया खइलें। ना समर्थन लेइब, ना देइब। जवना कांग्रेस की भ्रष्टाचार के करिखा से करिया बुझत रहले उहे आंख के अंजन हो गइल। भाजपाई लोग पूछत बा- ‘ कहां गइल किरिया-कहट?’ लोग कहत बा- ‘सूप हंसे त हंसे चलनियों हंसति बा जवना में बहत्तर गो छेद’। केजरीवाल अपनी बच्चन के कसम खइलें त का भइल, भाजपाई लोग त ‘ सौगंध राम की खाते हैं.’ भइया लोग रामजी के भी बदनाम क दिहलें। राजनीति अगर सब जायज बा त केजरीवाल के कसम भी नाजायज ना बा। लगत बा केजरीवाल साहब ‘ जैसी बहै बयार, पीठ तब तैसी कीन्हों’ की तर्ज पर चलत हवें। भ्रष्टाचार मेटावे खातिर ना सरकारी मोटर चाहीं, ना सरकारी बंगला, ना सुरक्षा, ना हूटर , ना शूटर। बस चाहीं त एगो सरकार। जवना के बना के व्यवस्था सुधारल जा सके। अगर ‘आप’ के सरकार दिल्ली में फेल त देश में साफ। अगर दिल्ली में सही त खाता न बही पूरा देश में ‘आप’ ही रही। एगो सावधानी बहुत जरूरी बा। कुछ घुसपैठिया भी लागल हवें। दामन के दाग छिपवले ‘आप’ में समाये की फिराक में लगल घुसपैठियन से सतर्क रहला के जरूरत बा। ‘आप’ सरकार बनावत हई। आम आदमी आपन समर्थन रउरा के दे देले बा। अब हर काम खातिर जनमत संग्रह कराइब त फैसला में देरी होई। खरमास में कवनो नया काम ना होला लेकिन दिल्ली में नवकी सरकार बने जात बा। लोग के अपेक्षा बा ‘नायक’ पिक्चर की हीरो जइसन मुख्यमंत्री के। अब जवन वादा कइलें ओके निभावें। ज्यादा समय लिहें त समय करवट ले ली। झाड़ू-पंजा प्रेम की नवकी सरकार के शुभकामना की साथे इ कविता-
दि ल्ली में बने जात बा, ‘आप’ के सरकार। 
चारों ओर से लोग करत बा, ‘आप’ के जय जयकार।।
 कांग्रेस की कूटनीति से देखीं , केतना बचत बा ‘आप’ । 
आज त सबकर बाप बनल बा, कल हो ना जाये फ्ल्ॉाप।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 26/12/13 के अंक में प्रकाशित है .

रविवार, 22 दिसंबर 2013

पत्रकार अपनी ताकत पहचानें : प्रो. शुक्ल

जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया मंच द्वारा आयोजित ‘नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता’ विषयक संगोष्ठी तथा सम्मान समारोह की अध्यक्षता करते हुए दीदउ गोविवि गोरखपुर के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रामदेव शुक्ल ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारिता की व्यथा को सुनकर मुझे पीड़ा हुई है। समाचारों को अपनी सुविधानुसार छापने से पत्रकारों का मनोबल टूटता है। श्री शुक्ल ने गांवों के विकास में ग्रामीण पत्रकारों की अहम भूमिका बताते हुए कहा कि समाज के निर्माण में पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने पत्रकारों से अपनी ताकत पहचानने का आह्वान करते हुए कहा कि आप अपनी ताकत को पहचानो। कलम का मुकाबला तोप भी नहीं कर सकती है। उन्होंने मीडिया के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज मीडिया नहीं होता तो देश कब का बिक गया होता। श्री शुक्ल ने सोशल मीडिया पर अश्लीलता के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता जाहिर की और कहा कि अश्लीलता भारतीय संस्कृति के विपरीत है। संगोष्ठी को मा.वि.वि. भोपाल के ई-मीडिया के विभागाध्यक्ष डॉ. श्रीकान्त सिंह, पंकज झा, यशवन्त सिंह, डॉ. दिनेश मणि त्रिपाठी, आल इण्डिया रेडियो , दिल्ली की समाचार वाचिका  श्रीमती अलका सिंह, संजय मिश्र, नर्वदेश्वर पाण्डेय ‘देहाती’, डॉ. जयप्रकाश पाठक, डॉ.सौरभ मालवीय, राजीव कुमार यादव, अरुण कुमार पाण्डेय, सिद्धार्थ मणि त्रिपाठी, सतीश कुमार सिंह, पं. राघवशरण तिवारी समेत दर्जनों लोगों ने संबोधित किया। संगोष्ठी का संचालन शिवानन्द द्विवेदी ने संबोधित किया। इस अवसर पर उदय प्रताप सिंह, विवेक धर द्विवेदी, विद्या पाण्डेय, दिलीप मल्ल, जयशंकर पाण्डेय सहित सैकड़ों पत्रकार, अधिवक्ता, समाजसेवी आदि उपस्थित रहे। इस समारोह में कार्यक्रम के अध्यक्ष दीदउ गोविवि गोरखपुर के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रामदेव शुक्ल ने पत्रकार नर्वदेश्वर पाण्डेय ‘देहाती’, संजय मिश्र, राजीव कुमार यादव, इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार सौरव मालवीय एवं शिक्षाविद् प्रो. जयप्रकाश पाठक समेत पांच लोगों को प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न देकर मोती बीए सम्मान से सम्मानित किया गया।

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

आई तनिका हाथ सेंक लीं..


मनबोध मास्टर हिलत-कांपत, खोंखत-खांखत कइसो रजाई से बाहर निकरलें। घर से बहरियाते कोहरा की मार से करेजा कांप गइल। नगर निगम बहुत उदारता देखवलसि। एतना लमहर-चाकर महानगर कहायेवाला शहर में छह जगह अलाव जलवा दिहले। रेलवे स्टेशन, बस अड्डा, जिला अस्पताल पर पचास-पचार किलो के लकड़ी के गट्ठर गिर गइल। अलाव जरावल बहुत पुण्य के काम ह। ठंड से मारल मनई आग सेंक के जीवन रक्षा करेलन लेकिन बहुत लोग अलाव की आंच से हाथ सेंकला से ना चुकेलन। अइसन लोग के ‘ हथसेंकवा’ कहल जाला। पिछला साल कुछ ‘ हथसेंकवा’ रात के पिकप लेके निकरल रहलें। पिकप पर एक ड्रम पानी आ एगो मग्गा। जहां भी अलाव लउके, गाड़ी रोक दें। पानी से तरप्याम। झट से लकड़ी बुझाम। लकड़ी गाड़ी पर लदाम फिर भाग जाम। राजघाट पर लकड़ी बिकाम, पैसा से जेब धराम। अलाव जलावे आ जलवावे के भी एगो मैनेजमेंट होला। झोपड़पट्टिन की आरी-पासे अलाव अइसे भी ना जरावल जाला, कहीं आग पकड़ ना ले और झोपड़ी स्वाहा न हो जा। अखबारन की दफ्तरन पर अलाव जरावल येह लिए भी जरूरी रहेला कि पत्रकारन के नजर बने आ खबर बने। कुछ जबरा लोग सार्वजनिक स्थल से लकड़ी लूटला के अभियान चलावेलन। काहें कि ठंड की सीजन में बेर-बेर पॉकिट में हाथ डलला आ निकरला के दृश्य अक्सर पुलिस बूथ पर लउक जाला। ईधन की महंगाई से परेशान कुछ मेस चालक भी रात में ‘ हथसेंकवा’ हो जालन आ चौराहा के लकड़ी चट्ट से किचेन के यात्रा कर लेली। वइसे त ठंड प्रकृति आ मौसम के चक्र के परिणाम ह लेकिन ठंड से बहुत फायदा भी होला बहुत लोग ‘ हथसेंकवा’ बन जालें। अलाव जलावे के लकड़ी की खरीद- फरोख्त में भी हाथ सेंके के मौका मिलेला। ओदा लकड़ी सूखा के भाव। सूखा लकड़ी त रात भर टूल्लू पाइप से लकड़ी भेंवला के इंतजाम। मुंह तोपना सीजन। चोरन के लहान। समाजसेवा के भी भरपूर अवसर। कंबल बांट के चाहें अलाव जलवा के फोटो अखबारन में छपवावे के लहान। ठंड से एतना मरलें., ओतना मरलें.., प्रशासनिक लापरवाही जइसे सैकड़ों वयान। लेकिन एगो सवाल, ठंड से मरल केतना मनई के पोस्टमार्टम भइल? मामला फुस्स। एगो कविता- 
आई तनिका हाथ सेंक लीं, मौसम आइल अलावे के।
 बेंच के लकड़ी जेब भराई, भले ना मिली जलावे के।।
 का दइब इ जाड़ा भेंजलन, गरीबन के ही मुआवे के।
 हो जाई तैयार पंचों, फिर अब लाश गिनावे के।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 19 /12 /13 के अंक में प्रकाशित है।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

रेलवे परामर्शदात्री समिति ने मंगलवार को आयोजित बैठक में स्टेशन की बदहाल व्यवस्था पर विस्तार से चर्चा की।

रेलवे परामर्शदात्री समिति ने मंगलवार को आयोजित बैठक में स्टेशन की बदहाल व्यवस्था पर विस्तार से चर्चा की। बैठक से पहले समिति के सदस्यों ने प्रथम श्रेणी गेट पर पसरी गंदगी और वीआइपी गेट के सामने स्थित प्री पेड बूथ की समस्याओं को न सिर्फ दिखाया बल्कि आने वाली मुश्किलों का भी एहसास कराया।1 रेल प्रशासन ने समस्याओं को जाना और यात्री सुविधाओं को और बेहतर बनाने का आश्वासन दिया। दिन के 3 बजे से एसी लाउंज में एरिया मैनेजर जेपी सिंह की अध्यक्षता में बैठक शुरू हुई। सदस्यों ने बताया कि प्रथम श्रेणी गेट के दोनों तरफ मल-मूत्र बहता रहता है। स्टेशन परिसर में घुसते ही सड़ांध यात्री के मन को खराब कर देती है। जबकि, यहां 1366.44 मीटर विश्व का सबसे लंबा प्लेटफार्म तैयार हो चुका है। इसके चलते गोरखपुर भी विश्व पटल पर छा गया है। इसके बाद भी यह हाल है। स्टेशन प्रशासन की उदासीनता का आलम यह है कि प्रीपेड टैक्सी बूथ को प्रीपेड थाना में बदल दिया गया है। इसके अलावा ओवरब्रिज से होकर प्लेटफार्म नंबर 1 से 9 तक पार्सल ले जाने पर लगने वाले जाम की समस्या के बारे में भी रेल प्रशासन को अवगत कराया। समिति ने पुरानी मांगों को भी दोहराया। जिसे आश्वासन के बाद भी रेल प्रशासन ने पूरा नहीं किया। एरिया मैनेजर ने यात्री सुविधाओं को और बेहतर करने तथा मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया। बैठक में नर्वदेश्वर पांडेय देहाती, प्रो. श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी, श्रीमती बंदना गुप्ता, बलबीर सिंह, अशोक कुमार अग्रवाल, संजय सिंह आदि समिति के सदस्यों के अलावा डीसीआइ एके सुमन, सीटीआइ मकसूद आलम, मुख्य आरक्षण पर्यवेक्षक योगेंद्र सिंह, आरपीएफ के प्रभारी निरीक्षक राजेश कुमार व मुख्य स्वास्थ्य निरीक्षक शशिकांत आदि मौजूद थे। 1जागरण संवाददाता, गोरखपुर : रेलवे परामर्शदात्री समिति ने मंगलवार को आयोजित बैठक में स्टेशन की बदहाल व्यवस्था पर विस्तार से चर्चा की। बैठक से पहले समिति के सदस्यों ने प्रथम श्रेणी गेट पर पसरी गंदगी और वीआइपी गेट के सामने स्थित प्री पेड बूथ की समस्याओं को न सिर्फ दिखाया बल्कि आने वाली मुश्किलों का भी एहसास कराया।1 रेल प्रशासन ने समस्याओं को जाना और यात्री सुविधाओं को और बेहतर बनाने का आश्वासन दिया। दिन के 3 बजे से एसी लाउंज में एरिया मैनेजर जेपी सिंह की अध्यक्षता में बैठक शुरू हुई। सदस्यों ने बताया कि प्रथम श्रेणी गेट के दोनों तरफ मल-मूत्र बहता रहता है। स्टेशन परिसर में घुसते ही सड़ांध यात्री के मन को खराब कर देती है। जबकि, यहां 1366.44 मीटर विश्व का सबसे लंबा प्लेटफार्म तैयार हो चुका है। इसके चलते गोरखपुर भी विश्व पटल पर छा गया है। इसके बाद भी यह हाल है। स्टेशन प्रशासन की उदासीनता का आलम यह है कि प्रीपेड टैक्सी बूथ को प्रीपेड थाना में बदल दिया गया है। इसके अलावा ओवरब्रिज से होकर प्लेटफार्म नंबर 1 से 9 तक पार्सल ले जाने पर लगने वाले जाम की समस्या के बारे में भी रेल प्रशासन को अवगत कराया। समिति ने पुरानी मांगों को भी दोहराया। जिसे आश्वासन के बाद भी रेल प्रशासन ने पूरा नहीं किया। एरिया मैनेजर ने यात्री सुविधाओं को और बेहतर करने तथा मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया। बैठक में नर्वदेश्वर पांडेय देहाती, प्रो. श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी, श्रीमती बंदना गुप्ता, बलबीर सिंह, अशोक कुमार अग्रवाल, संजय सिंह आदि समिति के सदस्यों के अलावा डीसीआइ एके सुमन, सीटीआइ मकसूद आलम, मुख्य आरक्षण पर्यवेक्षक योगेंद्र सिंह, आरपीएफ के प्रभारी निरीक्षक राजेश कुमार व मुख्य स्वास्थ्य निरीक्षक शशिकांत आदि मौजूद थे।

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

हलल भइंसिया पानी में..

हलल भइंसिया पानी में..


मैडम -पप्पू रोक ना पवलें, उड़ल हंसी राजधानी में।

का सचहूं फेंकू की चलते, हलल भइंसिया पानी में।।

दिल्ली में अस जगलें नवहा, बहुत जने हो गइलें घहवा।

चंपले जे इंगलिश बिरयानी, उनके दुलुम चाय आ कहवा।।

गुमनाम नामचीन हो गइलें, दादी रोवें दालानी में।। का सचहूं ..

गॉटर रेत के भीत हो गइल, चारों खाने चित हो गइल।

झाड़ूवाला अइसन झरलें, एके बेर में फिट हो गइल।।

एके साल के जनमल लक्ष्का, हुंकलसि अबे नादानी में। का सचहूं..

जनता के दुख ना बुझी, हारी लड़ाई केतनो जूझी।

चिमचा बेलचा मुंह लुकवलें,कइलें बहुत हांजी आ हूंजी।

थोड़ा तस्सली मिलल जिगर के, रोअवलसि प्याज चुहानी में।। का सचहूं..

इ महंगी के मार रहल ह, केहू के जीत ना हार रहल ह।

बनि के वोट बाहर निकरल ह, आक्रोश के अंगार रहल ह।।

बड़-बड़ महारथी उड़ जइहन, चौदह वाली आंधी में।। का सचहूं..

जाति -धर्म पर केतना बंटबù, टुकड़ा-टुकड़ा केतना कटबù।

जन ज्वार जब एक हो जाई, केसे लड़बù केसे अंटबù।।

ठगलù बहुत ठगाइल जनता, अब पड़बù परेशानी में।। का सचहूं..

हर सड़क के खस्ताहाल बा, रुकल ना क्राइम बड़ बवाल बा।

अपराधिन के टिकट देत हैं, जनता का एकर मलाल बा।।

जनता जानी लाभ ना पइबù, पड़ जइबù तब हानी में।। का सचहूं..

आठ माह में तेरह दंगा, राजकाज के कइलसि नंगा।

रोज डकैती रोज छिनैती, कहां-कहां लोग लेई पंगा।।

छह सौ दुष्कर्म दर्ज भइल बा, हजारों केस छेड़खानी में।। का सचहूं..

सुधरी ना कानून व्यवस्था, अइसहिं जो रही अवस्था।

इस्पात के दंभ भरी का, टीना-मोमा रांगा-जस्ता।।

मोटा-मोटी बात बतवलीं, घुसल का समझदानी में।। का सचहूं..




गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

दहि गइल पीड़िया, रहि गइल नेह

मनबोध मास्टर नाक से घर्र-घर्र के आवाज निकालत, टांग पसरले सुतल रहलें। भोर के चार बजत रहे। कान में आवाज सुनाई दिहलसि- ‘ बंसवरिया में सुगना बोले हरि..’
कन्याओं की टोली से निकरत बिंदास शोर..। कहीं भजन, कहीं लोकगीत.। याद आइल आज पीड़िया ह। लोक संस्कृति के एगो अइसन पर्व जवन पूर्वाचल की गांवे- गांवें गोधन कूटला की बाद शुरू हो जाला। गोबर से बनल गोधन के पूजन आ कूटला की बाद पीड़िया के निर्माण आ दहववला की साथे समापन के सवा माह के दौरान नारी पक्ष द्वारा गृहस्थ आश्रम के सजो संस्कार के खेल(स्वांग) की माध्यम से एक पीढ़ी से होत दूसरे पीढ़ी तक चलत चलि आवत बा। समरसता, भाईचारा, अश्पृश्यता के अंत. अमीरी-गरीबी के ढहत खाई के पीड़िया अइसन पर्व पर भी देखल जा सकेला। पीड़िया में पुरुष सत्ता के कहीं कवनो प्रभाव ना। नारी सत्ता के ही रहन-सहन। तुतुलाह बोले वाली बच्ची से लेके विअहल-दानल युवती तक मायका में पीड़िया की माध्यम से जीवन के सच से रूबरू करावल एगो लोक स्वांग, एगो लोक पर्व, एगो लोक खेल। नाटक के पात्र डॉक्टर हो या धगरिन, पति हो या पिता, सास हो या ननद.। सब पात्र नारी। जब स्वांग करत रात में दरोगा बन के कवनो लक्ष्की रोबदार आवाज में गरजे त बड़े-बड़े के पेट पानी हो जा। जब बात साफ होखे कि दरोगा ना इ त फलनवां के बेटी पीड़िया के खेल करत रहल, सुन के लोग हंसत-हंसल लोट जा। पीड़िया में सामुहिकता के जवन रूप लउकेला बहुत अद्भुत। दीवाल पर गोबर से बनल सैकड़ों पीड़िया के लड़की लोग बड़ा आसानी से पहचान लेली। अंतर एतने रहेला कि बिअहल-दानल लड़की लोग के पीड़िया सेनुर से टिकाइल रहेली आ कुंआरि लड़किन के बिना टिकल। गांवन के ताल- पोखरा भरात गइल। लोग के कब्जा होत गइल। लेकिन उ जगह अबो जिवित बा जहां पीड़िया दहवावल जाला। पीड़िया के समापन ‘ भूजा मिलौनी ’ की साथे पूरा होला। भूजा मिलौनी में जाति-पांति के दीवार ढह जाला। एक दूसरे के लाई-गट्टा देत-लेत में जवन प्रेम झलकेला उहो अनोखा ह। चाउर, चिउरा, फरुही, मकई, सांवा, कोदो, टांगुन, बाजरा, बजरी, मड़ुआ. के भूजा। गोरखपुर में बसल कई परिवार के लड़की लोग चाउर-चिउरा की बाद और चीज के नाम सुनते चिहुक जइहन, लेकिन गांवन में पीड़िया की दिने ‘सतअनजा’ लउक जाला। देसी मिठाइन के भी गजब के मेल। गट्टा, बतासा, लकठा, खुरमा, पेड़ा, पेठा. । जब सतअनजा के भूजा आ देसी मिठाई के मेल मिल जाला त पीड़िया के परसादी के स्वाद गजबे हो जाला। पंडितपुरा के बिटिया दखिनटोली के बिटिया से भूजा मिलौनी कर के सामाजिक समरता के मिसाल कायम करेली। पीड़िया की समापन पर इ कविता
दहि गइली पीड़िया, रहि गइल नेह। 
भूजा मिलौनी में , लउके सनेह।।
- नर्व्देश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 5/12/13 के अंक मे प्रकाशित है .

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

शास्त्र परी जो पंसारी के पाला..., पढ़ी नाहीं, ऊ बेची मसाला...

मनबोध मास्टर कहलें- ‘ केकर-केकर लेई नाव, धोती खोलले सगरो गांव’। धोती से मतलब तन ढांके वाला पांच गज के कपड़ा से ही ना बा। धोती मर्यादा ह, इज्जत ह, प्रतिष्ठा ह, मान ह, सम्मान ह, पहिचान ह सभ्यता आ संस्कृति के। केतना लोग के धोती बांस की पुलई टंगा गइल। इ अनपढ़- गंवार के मटमैली धोती ना रहल। इ धोती बहुत झकास, चमकदार रहल। रूपांतर मे येके कहीं वर्दी कहीं बाना कहल गइल। बाना में जे बंधि के ना रहलन त संत, महंत, समाजसेवी, शासक, प्रशासक. के बड़ा छिछालेदर भइल। बचपन में पढ़ल गइल- ‘ महाजनो येन गत: स पंथा’। मतलब, समाज के श्रेष्ठ लोग जवना राह चलें, ओकर अनुकरण करे के चाहीं। केकर अनुकरण कइल जा। धर्म गुरु, बड़ अफसर, जज, नेता, शासक, प्रशासक, पत्रकार.। दूसरा के नैतिकता के पाठ पढ़ावल बहुत आसान बा। अपनी गिरेवान में झांकल बहुत विकट। बात बिरादरी (जाति ना पेशा) से ही करत हई। एगो समय रहे चारों ओर तहलका, तहलका। अब त- हलका हो गइल। तरुण की तरुणाई में एक से एक स्टिंग। भूचाल आ जात रहे। अब ईमानदार मीडिया ट्रायल पर कइसे लोग भरोसा करी जब अपने में छिहत्तर गो छेद। अवला जब अत्याचार के खिलाफ खड़ा होलिन त बला बन के पीछे पड़ेलिन। रउरा सभ की सामने उदाहरण बा कथावाचक आसाराम, स्वामी नित्यानंद, नारारण साई अइसन ऊंचा लोग भी मार्ग से भटकलें त ओछा लोग की श्रेणी में आ गइलन। हरियाणा बेहतर नस्ल की सांड खातिर विख्यात रहल। एगो डीजीपी तब कुख्यात हो गइल जब टेनिस खिलाड़ी रुचिका गिरहोत्रा छेड़छाड़ के आरोप लगवली। सांड नथाइल, जेल भेजाइल। पंजाब के डीजी भी अइसने एगो मामला में जेल के हवा खइलन। और भी बहुत उदाहरण बा। मोटा-मोटी कहे के बा कि मन के तरंग मारि लीं। जब मन बौराई त अइसने अनैतिक आ ओछा काम हो जाई जवना से धोती टंगा जाई। मन के तरंग ना मराई त बुरा विचार उठी। बुरा विचार की चलते ही कई जने साधु-संत, सांसद-विधायक, वकील-जज, पत्रकार-संपादक, शासक-प्रशासक पर भी संगीन आरोप लगल। धोती टंगल, जग हंसाई भइल। सभ्य, शिक्षित कहाये वाला समाज के अगुआ लोग जवन बहुत ज्ञानी हवें। बहुत शास्त्र पढ़लें, लेकिन एतना शास्त्र पढ़ला की बाद भी जेकर मन भटक गइल ओकरा पर इहे कविता-
शास्त्र परी जो पंसारी के पाला। 
पढ़ी नाहीं उ बेची मसाला।। 
संत की भेख में कालनेमि बन,
 जपल करी उ झूठ के माला।।
- भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 28/11/13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

भारत रत्न के महाभारत

भारत रत्न पर महाभारत जारी बा। मनबोध मास्टर महाभारत रत्न के मांग करत हवें। जबसे क्रिकेट के भगवान जी की बखरे भारत रत्न गइल। कई जने के पेट गुड़गुड़ाये लागल, कई जाने के उल्टी-दस्त शुरू हो गइल। बहुत बदहजमी, बहुत गैस, बहुत विकार। अरे भाई! खफा काहे होत हवù? सत्ता हमार, मर्जी हमार, रत्न हमार। हम जेके दे देई ,हमार मर्जी। रहल बात रत्न विवाद के त आदिकाल में जब समुद्र मंथन से 14 गो रत्न निकरल तबो विवाद भइल। उ विवाद देव आ दानव लोग की बीच के रहे आज मानव-मानव की बीच के बा। सचिन, सवा अरब हिंदुस्तानिन के निर्विवाद हृदय सम्राट हवें। सचिन महान हवें। क्रिकेट के भगवान हवें। नवहन के शान हवें। भारत के पहचान हवें। येह सबके बाद भी संन्यास लेबे की बेरा दिहल गइल सम्मान पर विवाद उठल बा। संन्यास के मतलबे होला देश-दुनिया, मोह-ममता, धन-दौलत, मान-अपमान, पद-प्रतिष्ठा आदि तमाम चीजन से विरक्ति के। सम्मान त कबो दिहल जा सकेला। कई लोग के मरणोपरांत भी मिलल। उ सरग से लेबे ना अइलें, परिजन ही पा के गदगदा गइलें। केतना रगरला की बाद भी लोग देश की सर्वोच्च सम्मान के हकदार ना बन पावेलन। बहुत दिनन ले पड़ल- पड़ल फाइल पर गर्दा के मोट पर्त पड़ जाला लेकिन अबकी चट मंगनी पट विआह हो गइल। सत्ता-शासन यदि संन्यास की समय सम्मान ना देत त शायद अइसन बात ना उठत। लगत बा भारत रत्न के राजनीतिकरण हो गइल बा। अगर राजनीतिकरण ना रहित त विवाद ना उठत। विवाद पहिला बेर भी ना उठल बा। पंडित भीमसेन, उस्ताद विस्मिल्ला खान, लता मंगेशकर, अमृत्य सेन, पंडित रविशंकर, एसएस सुब्बुलक्ष्मी, गुलजारी लाल नंदा, डा एपीजे अब्दुल कलाम, सत्यजीत राय, जहांगीर रतनजी दादा भाई टाटा, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, मोरार जी देसाई, सरदार वल्लभ भाई पटेल, राजीव गांधी, नेल्सन मंडेला, डा भीम राव अंबेडकर, खान अब्दुल गफ्फार, मदर टेरसा, वीवी गिरि, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, डा राजेंद्र प्रसाद, डा विधान चंद राय, गोविंद वल्लभ पंत, जवाहर लाल नेहरू, सर डाक्टर मोक्षगुंडम विश्वसरैया, सर्व पल्ली डा राधाकृष्णन, चंद्रशेखर बेंकेट रामन, चक्रवर्ती राजगोपाल चारी.. के भारत के सर्वोच्च सम्मान मिलल। लगता लाल बहादुर शास्त्री के छोड़ के हर वेर कुछ ना कुछ बात उठल। अबकी तनिका अधिका उठ गइल। सब कर आपन-आपन नजरिया। सचिन को सलाम। एक बेर ना हजार बेर। अब इ कविता -
 यदि काम का हो, तो चेहरा खिला-खिला दिखता है।
 किसी काम का नहीं, तो रोगी जस पीला दिखता है।।
 दोष चेहरे पर क्यूं , आंख के चश्मे पर लगाइए जनाब।
 कलमुंही राजनीति , कभी टाइट कभी नारा ढीला लगता है।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 21/11/13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

उठहुं ये देव उठहुं सोवत भइले बड़ी देर..

देवोत्थानी एकादशी। देव के उठला के दिन। चार महीना से सोवल देव के जगावत इहे कहल गइल- उठहुं ये देव उठहुं, सोवत भइले बड़ी देर। एकादशी के दिन गन्ना के गांठ तोड़ला के परंपरा याद आइल। गांवन में कहल गइल- काहो भाई! ऊंख के गुल्ला फराइल? मनबोध मास्टर जब इ सवाल सुनलें त अतीत के पन्ना दिल-दिमाग में फरफरा के पलटे लागल। का जमाना रहे जब लोग कहे दस कट्ठा ऊंख बा , कवना बात के दुख बा। तब ऊंख खेत, ऊंखिहाड़, कोल्हुआड़ में मुफ्ते मिलत रहे। आज शहर में खरीदे गइलीं त चालीस रुपया जोड़ा। ऊंख की याद में बंसवारी तर के कोल्हुआड़ याद आ गइल। का जमाना रहे। कचरस, महिया, किकोरी,लवाही, भेली, पीड़िया आ चिटौरा..। आज की लक्ष्का त येह सबके नाम के अर्थ ना बुझिहें, स्वाद का बतइहें। बांस की सुपेली पर कराहा से गुरदम की सहारे निकालल गरमामरम महिया चेफुआ से चटला के स्वाद। गजब के टेस्ट। हमार पूर्वाचल चीनी के कटोरा कहल जात रहे। अंगरेजन की जमाना में 1903 में देवरिया जिला की प्रतापपुर में पहिलका चीनी मिल खुलल। समय आगे बढ़ल 1930 तक देवरिया जिला में 14 चीनी मिल लाग गइल। देश आजाद भइल। गन्ना आंदोलन की सहारे ही बहुत लोग लखनऊ-दिल्ली पहुंच गइलन। दिन-दशा खराब भइल। शासक लोग एका-एकी कर के मिल बेच दिहलन। अब गन्ना में ही ना क्षेत्र में ही कंडुआ, उकठा अइसन रोग लाग गइल। पूर्वाचल में दस लाख किसान गन्ना बोअत रहलें। अब गांव में खोजले दस मनई भी ना मिलत हवें जे ऊंख के सुख उठावत होंखे। ऊंख सामाजिकता- सामूहिकता के मिसाल रहे। खेत में गेड़ी गिरावला, गेंडसज, झोरला, सींचला, कटला, छीलला, पेरला, पकवला सब में सहयोग के मिठास रहे। ऊंख की सीजन में कोल्हू आ कराहा चाट के गांव के कुक्कुर भी पिलहठा हो जात रहलें। मसलन, ऊंख समृद्धि के फसल रहे। सब ओरा गइल। कालांतर में शंखासुर के मारि के युद्ध के थकान मिटावे खातिर देव क्षीरसागर में जाके सुत गइलें। आषाढ़ अंजोरिया की एकादशी के दिन से सुतल देव कार्तिक अंजोरिया की एकादशी के जगलें। देव के जगते गांव के लोग ऊंख के गुल्ला फारे लागल। शहर के लोग गन्ना के गांठ तोड़े लागल। अइसन सुअवसर पर एगो संकल्प लिहला के जरूरत बा- देव जाग गइलीं। हम्मन में देवत्व जगा दीं। जन- जन में प्रेम के प्रकाश फैला दीं। भ्रष्टाचार रूपी शंखासुर के वध कइल जाई, तब गन्ना के गांठ तोड़ला के पुण्य प्राप्त होई। अब इ कविता-
श्रीहरि विष्णुजी जग गइलें, अब रउरों जग जाई। 
शंखासुर की समर्थकन के, धरा से मार भगाई।। 
देवत्व के ज्योति जगा के, असुरत्व मेटाई।
 देव दीपावली की दीया से, अंधकार मिटाई।।
- नर्व्देश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 14/11/13 के अंक मे प्रकाशित है 

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

सूपा बाजल, दलिद्दर भागल

कातिक के महीना। पर्व के दिन। घर-घर दीया बराइल। लक्ष्मी जी आ गइली। सूपा बाजल। दलिद्दर भागल। गोधन कूटाइल। पीड़िया लागल। कलम-दावात के पूजा भइल। चित्रगुप्त महराज प्रसन्न हो गइलें। चांद लउकल। मोहर्रम शुरू हो गइल। इमामबाड़ा में शहनाई बाजल। इमाम चौकन पर ताजिया सजाये लगली। छठ आ गइल। नयाह-खाय-खरना-अघ्र्य की तैयारी में लागल लोग। सालोंसाल गंदगी आ कचरा वाली जगह पर साफ-सफाई की साथे छठ के बेदी बने लागल। पर्व के सफर, त्योहार के सिलसिला, अइसे ही चलत रही। मनबोध मास्टर सोचे लगलें- महंगाई पर रोज- रोज रोवे वाला मनई के हाथ भी त्योहार पर सकेस्त ना भइल। खूब खरीदारी भइल। इ भारतीय उत्सव ह। उत्सवधर्मिता में कहीं कवनों कंजूसी ना। धनतेरस की दिने से ही त्योहार के उत्साह शुरू बा। त्योहार हम्मन के संस्कृति ह। केतना सहेज के राखल बा। धनतेरस के एक ओर गहना-गुरिया, वर्तन- ओरतन, गाड़ी-घोड़ा किनला के होड़ त दूसरी ओर भगवान धन्वंतरि के अराधना- जीवेम शरदं शतम् के अपेक्षा। प्रकाश पर्व पर दीया बारि के घर के कोने-अंतरा से भी अंधकार भगा दिहल गइल। जग प्रकाशित भइल। मन के भीतर झांक के देखला के जरूरत बा, केतना अंजोर बा? ये अंजोर से पास- पड़ोस, गांव-जवार, देश-काल में केतना अंजोर बिखेरल गइल? दलिद्दर खेदला के परंपरा निभावल गइल। घर की कोना-कोना में सूपा बजाके दलिद्दर भगावल गइल लेकिन मन में बइठल दलिद्दर भागल? दुनिया की पाप-पुन्य के लेखा-जोखा राखे वाला चित्रगुप्त महराज पूजल गइलें। बहुत सहेज के रखल गइल दुर्लभ कलम-दावात के दर्शन से मन प्रसन्न हो गइल। अपनी कर्म के लेखा-जोखा जे ना राखल ओकरी पूजा से चित्रगुप्त महराज केतना प्रसन्न होइहन? मोहर्रम पर तलवार, बल्लम, बंदूक, लाठी-डंडा जुलूस में हर साल देखल गइल। इ जुलूस के शोभा ह। इ हथियार केहू की रक्षा खातिर केतना बार निकरल? येहू पर विचार करे के चाहीं। छठ माई के घाट अगर साल के तीन सौ पैंसठों दिन एतने स्वच्छ रहित त केतना सुन्नर रहित। पर्व-त्योहार के जड़ हमरी संस्कृति में बहुत गहिर ले समाइल बा। ओके और मजबूत बनावला के जरूरत बा। संकल्प लिहला के जरूरत बा की फिजुलखर्ची में कटौती क के ओह धन से कवनो जरूरतमंद के सहयोग क दिहल जा। अइसन हो जाय त त्योहारन के सार्थकता और बढ़ जात। खूब खुशी मनावल जा, लेकिन केहू के दुख ना पहुंचे येह पर ध्यान दिहला के जरूरत बा। येह कविता की साथे सबके प्रति शुभकामना, सबको मुबारक।
 दीया बराइल, लक्ष्मी अइली।
 सूपा बाजल, दलिद्दर भागल।
 भैयादूज के गोधन कूटइलें, 
 रड़ूहन के तिलकहरू अइलें।
 मोहर्रम के तासा बाजी ,
 इमाम चौक पर मेला लागी।
 छठ मइया के अघ्र्य दियाई, 
सब्जी आ फल खूब किनाई।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 7/11/13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

’चांद‘ कहां अझुराइल..

21 अक्टूबर 2013, करवा चौथ। सालो-साल गाल फुलवले, मुंह ओरमवले वाली मस्टराइन आज बिहाने-बिहाने से ही चहकत रहली। उनकर रूपजाल देख के मनबोध मास्टर सम्मोहित रहलें, रोमांचित रहलें, आनंदित रहलें। झुराइल जिनगी की रेगिस्तान में कुछ-कुछ हरियर लउके लागल। उषाकाल से अपरान्ह काल तक मस्टराइन के एक ही रट- ‘ ए जी! सुनत हई। संवकेरे घरे आ जाइब, आज करवा चौथ ह। चलनी में चांद निहारे के बा। राउर आरती उतारेके बा।’ मनबोध सोचे लगलें- अगर इ व्रत ना रहित त मस्टराइन के मधुरीबानी की जगह रोज सुने वाला कर्कश आवाज ही सुने के मिलत। आदमी के जीवन एगो पत्ता अइसन बा। क्षणिक सत्ता पर एतना गुमान रहत बा। मनई जीवन की डाल से लटकल बा। मोह-माया में भटकल बा। जेकरा पर पूरा जवानी कुर्बान क दिहल गइल, अभाव में ओकर स्वभाव बदल गइल।भला हो हमरी संस्कृति के, हमरी परंपरा के, पर्व-त्योहार के। इ प्रेम के उमंग बढ़ावत बा। जीवन में खुशबू महकावत बा। घरकच की करकच में रोज-रोज घटल नून-तेल-मरिचाई के चिंता से मुक्ति दिया के पूजा-पाठ-वंदन के उछाह बढ़ावत बा। इहे कुछ सोचते रहलें की मस्टराइन के फोन फेर आइल- ए जी! पौने आठ हो गइल। जल्दी आई , चनरमा उगहि वाला हवें। मास्टर जल्दी-जल्दी काम निबटा के घर खातिर निकल पड़लें। किक मारते बाइक किर्र., घिर्रर.फ्टाक. स्टाक . करे लागल। इ का आजुओ पेट्रोल टंकी वाला ससुरा पानी मिलवले बा का? गाड़ी आ देहिं दुनो गरमा गइल,घर के यात्रा शुरू भइल। यूनिवर्सिटी चौराहा पर पहुंचते फंस गइलें। दुर्गाजी के विदाई हो गइल रहे लेकिन बांस-बल्ली ओह-पोह के सड़क पर ही गिरल परल रहे। जवन जगह रहे ओमे एगो ट्रैक्टर-ट्राली भूसा लदले खड़ा रहे आ सामने हाथ पसरले सिपाही नो इंट्री के मोलभाव में लागल रहे। गाड़ी के तेल आ मास्टर के खून दुनो जरत रहे। उ बुदबुदात रहलें। सरकारी भिखारी, वर्दीधारी मंगन। दस रुपये खातिर चौराहा पर वर्दी नीलाम करत बा। कइसो व्ही पार्क की सामने पहुंचले त सड़क पर कबुरी करत कुछ गइया मइया आ कुश्ती लड़त नंदी महराज लोग। नगर निगम आ गो सदन वालन के कोसत मोहद्दीपुर चौराहा पर पहुंचले त सड़क पर आधा दर्जन आटो, ऊपर से नीचे ले मनई लदले लेकिन फिर भी ड्राइवर चिल्लात रहलें। जगदीशपुर., कुसुम्ही., मोतीराम, फुटहवां, चौरीचौरा। दहिने बाजू पुलिस के लगावल लोहे के वैरिकेडिंग आ आटो की बीच से कवनो ना निकरत रामगढ़ पुल तक पहुंचले की ब्रेक लगावे के परल। सड़क पर पी के टुन्न पड़ल मनई के देख के मास्टर चिल्लक्ष्लें। अरे ससुरा! मरे के बा त रमगढ़वा में कूद जो सड़किया काहें छेकले हवे। कूड़ाघाट के गुरुंग चौराहा के घोंचा-घोंची वाला मोड़ लांघत-धांगत, गिरधरगंज के सब्जी मार्केट के भीड़ आ ठेला-खोमचावालन के अतिक्रमण की बीच से निकरले त बुझलें की कवनो जंग जीत लिहलीं। सिंघड़िया की आगे दुर्गम मार्ग। लोग कहलें दिल्ली दूर बा अब त देवरिया दूर हो गइल। सड़क पर विकास के गंगा बहत रहे। चार महीना से जवना पानी के रोज लांघत रहले आज उहे पानी ‘पानी’ बिगाड़ दिहलसि। घिर्र-घिर्र क के गाड़ी बंद। जूता-मोजा-पतलून भीग गइल। ठेलत में नानी याद आवत रहली एही बीच महरानी के फोन आ गइल- कहां अझुरा गइलीं, चांद बुढ़ात बा। मास्टर रुआंसा होके कहलें-गाड़ी की इंजन में पानी समा गइल बा आज हम घरे ना पहुंच पाइब। एगो कविता याद आइल-
 टीवी अखबार में समाचार बन रहल बा। 
जनप्रतिनिधियन के लोग धिक्कार रहल बा।
 एगो चांद नरक में गोता लगावत बा, 
घर पर एगो चांद इंतजार कर रहल बा।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 24/10/13 के अंक मे प्रकाशित है .

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

मन का रावण ना मरा क्या करेंगे राम..

दशहरा के एगो दूसर शाब्दिक अर्थ दश (रावण) हरा ( हरा-भरा) भी हो गइल बा। रामजी का करिहन ? जब लोग की मन में ही रावण समा गइल बा। विभीषण के चरित्र भी बदल गइल बा। अब उ रामजी के सही भेद ना बतावत हवें की रावण की नाभि में अमृत बा। रावण अपनी चतुराई से अमृत के जगह बदल देले बा। अब रामजी एक बाण मारे चाहें इकतीस वाण, रावण के कुछु बिगड़े वाला ना बा। का जमाना आ गइल बा। नाभि खोल के देखावला के चलन बढ़ गइल बा। सत्य सकुचात बा। झूठ मोटात बा। नैतिकता के पर्व के रूप में, न्याय की स्थापना में, विजय पर्व की याद में दशहरा मनावला के परंपरा शुरू भइल। येही दिन त रावण के वध भइल रहे। युगन से रावण दहन होत आवता लेकिन रावण जिंदा बा। देखला के दृष्टि चाहीं। दूसरे की दिल में ना अपने मन में झांक के देखीं। मन में रावण बैठल बा। मन के रावण मरला बगैर कागज-पटाखा की रावण के पुतला फूंकले ना शांति मिली ना संतुष्टि। प्रवृति आसुरी हो गइल बा। एगो सीता मइया की हरण में रावण साधु वेष बनवलसि। मौजूदा समय में साधु वेशधारिन के संख्या असंख्य बा। जे साधु वेश में ना बा ओकरो मन में रावण के माया राज करति बा। रावण त सीता मइया के खाली हरण कइलसि आज हरण की तुरंत बाद वरण आ ना मनला पर मरण तक पहुंचवला के स्थिति बा। रहल बात रामजी के त उंहा के अइसन राजनीति में घसीटल गइल की प्लास्टिक की पन्नी तरे गुजर होत बा। रामजी भले अभाव में गुजर करत हवें, रामजी की नाम पर कथा, प्रवचन, भजन, राजनीति करे वालन के नजर दौड़ाई। महल -अटारी,मोटर-गाड़ी, बैंक -बैलेंस, चेला- चपाटी के लाइन लागल बा। रावण के एगो रूप नवरात्र के आखिरी दिन देखे के मिलल जब कन्या भोज खातिर मनबोध मास्टर घर-घर लड़की तलाशत रहलें। कई घर छनला की बाद बहुत मुश्किल से 21 कन्या मिलली। दरअसल रावण की प्रभाव से एतना कन्या भ्रूण हत्या भइल की लड़की लोग के संख्या ही कम हो गइल। एकरा पीछे के कारण तलाशीं त साफ हो जाई की रावण के दुसरका रूप दहेज की आतंक से कन्या भ्रूण हत्या के संख्या बढ़त बा। आई असों की रामलीला में रावण दहन की पावन बेला में सौगंध खाइल जा की मन के रावण मार दिहल जाई। दहेज दानव के भगावल जाई। कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगावल जाई। अगर अइसन ना कइल जाई त रामजी रावण के वध ना क पइहन। आज इ कविता-
मन का रावण ना मरा, क्या करेंगे राम। 
विभीषण को कर रहे झूठ-मूठ बदनाम।। 
अब तो हर घर भेदिया, दे रहा जगत को भेद।
 जहां खजाना देखते वहीं लगाते सेंध।। 
प्रवृति आसुरी धारण किये, मना रहे हम पर्व। 
दूसरों को आहत करने में, महसूस करे रहे गर्व।।
 राम फंसे राजनीति में, गुजर प्लास्टिक तान। 
रामभक्तों की बढ़ रही, हवेल और मकान।।
-मेरा यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 17 /10/13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

श्मसान के संत तूने कर दिया कमाल..



 दो अक्टूबर। गांधी जी व शास्त्री जी के जयंती के दिन। समूचा देश दूनों महापुरुषन के याद करत हवें। अइसने प्रमुख दिन के ‘ श्मसान के संत’ इंसेफेलाइटिस के महामारी रोके बदे, राम-जानकी मार्ग के दुर्दशा मेटावे खातिर आ बिजली के बेतहाशा कटौती रोके खातिर पैदल मार्च निकरलें। पैदल चलल त स्वास्थ्य खातिर लाभदायक हइहे ह। जनसेवा में पैदल चलला पर मेवा मिलेला। यात्रा त बहुत होत ह। एगो बाबा मेडिकल कालेज से कलेक्ट्रेट तक पैदल मार्च कइलें तवले दुसरका बाबा पटनाघाट से मार्च शुरु क दिहलें। सरकार की सेहत पर केतना प्रभाव पड़त बा? महामारी मिटे न मिटे समर्थन त खूब मिलत बा। काल की कपाल पर, महाकाल की चौपाल पर, जनता की हाल पर, आज की सवाल पर मनबोध मास्टर की दिमाग में कुछ परिदृश्य घूम गइल। एगो ‘ कलम के पुजारी’ जब ‘ राम-जानकी मार्ग’ नाम से लेखनी मथत रहे त राजनीति के मख्खन चखे लगल। समाजसेवा के व्रत ठनलस त मसान के सूनसान ठेकान भी महान हो गइल। जगजगा उठल सरयू के घाट। दोहरीघाट पुल से जब कवनो अजनवी जब भगवान भोलेशंकर के चालीस फुट ऊंच प्रतिमा देखत होइहन त इहे कहत होइहन महाकालेश्वर के स्थल ह। मशान की महाकाल के जगावत समय में कलम के पुजारी के वेश-भूषा , खान-पान, रहन-सहन, नीति-रीति सब बदल गइल। लंगोटिया यार त ना कहब लेकिन कलमिया यार के जिंस उतर गइल। धोती धारण क लिहलन। कपार से कैप उतर गइल, कत्ती ( कपड़ा के टुकड़ा) बंधाये लागल। दुपहिया ना जाने कवना भुसौला में धरा गइल, की केहू के दान दिया गइल, अब त लग्जरी लउकत बा। लिखता मनई वक्ता बन गइल। चिल्लूपार की जनता के चहेता बन गइल। सब कुछ बदल गइल, लेकिन ‘ कलम के पुजारी’ से ‘ श्मसान के संत’ आ बाद में ‘ मंत्री जी’ आ मौजूदा समय में ‘ जागरूक जनप्रतिनिधि’ की तमाम यात्रा में एगो चीज ना बदलल- ‘ यादाश्त’। मिलला के उहे भाव। ना कवनो घमंड ना कवनो ऐंठन। जीवन की यात्रा में ‘ प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं’। लेकिन श्मसान की संत का कइसन मद? जेकरा कर्मस्थली की घाट मुक्तिपथ पर केतना लोग रोज खाक होता। इ सब प्रसंशा ना हकीकत ह। पद यात्रा में अपार जनसमर्थन मिलत बा। सब के मुंह से इहे निकरत बा‘ श्मसान के संत तूने कर दिया कमाल’ । बिजली की बेतहाशा कटौती की सवाल पर, राम-जानकी मार्ग की चाल पर आ इंसेफेलाइटिस की हाल पर बस इहे कविता-
‘ खूनचुसवों’ से जंग लड़ने चल पड़ा जो।
 जनसेवा के कठोर व्रत पर है अड़ा जो।। 
जनसमर्थन की बदौलत रार ठाना। 
 श्मसान के मशान को जगा कर है खड़ा जो।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 3/10/13के अंक में प्रकाशित है 

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

चलि गइलें मोहन बिसारि के पिरितिया

आज सरयू उदास हई। बहुत उदास। सरयू की गोद में सदा खातिर समा गइलन समाजवादी चिंतक मोहन बाबू। बस रह गइल उनकर याद। गांव-जवार से बहुत प्रेम रहल। अब सबकी मुंह से इह निकरत बा- ‘चलि गइलें मोहन, बिसारि के पिरितिया’। जे आइल बा, उ जाई । इ सास्वत सत्य ह। कुछ लोग होलन जवन गइला की बाद भी याद रहेलन। मोहन बाबू भी अइसने रहलन। मनबोध मास्टर की जेहन में मोहन बाबू के गइला के दुख चस्पा बा। बड़ा करीब से मोहन बाबू के नीति-रीति देखल गइल रहे। आज सियासत के अलम्बरदार अर्थी के कन्धा देत हवे। इ खाली फर्जअदायगी ना ह। बहुत कुछ सोचे-समझे के भी मौका देत बा। केतना ऊंच बा अर्थी आ केतना नीचे बा कन्धा। तस्वीर त सांच ही बोलति बा। उमड़त जनसैलाब, टूटत दलीय सीमा आ चारों ओर मोहन बाबू के जय-जयकार। सियासत में चाल-चरित्र-चेहरा के बात कइल जा त छात्र जीवन से ही राजनीति में कूदल सामाजिक पहुरुआ अंत समय तक समाजवादी ही रह गइल। जवना विचारधारा के डोर जवानी में धराइल बुढ़ारी तक ओही के धइले रहि गइलें। धीर-गंभीर, बात- बेबाक, चिंतन-मंथन, लोकप्रिय-जनप्रिय, विनम्र- कुशाग्र सब विश्लेषण मोहन बाबू से जुड़ल लउकेला। सब की बाद भी उ एगो नेक इंसान रहलन, इंसानियत कूट-कूट के भरल रहे जवन नेतागीरी में कमे पावल जाला। जे उनकी लेखन के मुरीद रहे उनकी चेहरा में ओकरा नेता कम लेखक, साहित्यकार, पत्रकार के अक्स ज्यादा ही लउकत रहे। मोहन बाबू से जुड़ल कुछ स्मृति रउरा सभ से साझा क के दुख के बोझ कुछ हल्लुक कइल चाहत हई। मोहन सिंह बहुत धीर- गंभीर नेता रहलन। तीन गो घटनाक्रम बतावत हई जवना पर मोहन बाबू बहुत हंसले रहलें, आ का कहले रहलें, उहो याद बा। 1989 की विधान सभा चुनाव में बरहज से मोहन बाबू चुनाव लड़त रहलें। हमरे गांव में प्रचार करे आइल रहलें। गांव में यादव जी लोग के दुआरि पर बांस की पुलुइ पर निर्दल प्रत्याशी के चुनाव चिन्ह सायकिल ( तब सपा के जन्म ना भइल रहे) बान्हल देख के कहले- ‘ जतिगो ज्यादा होता का? लगता अब जातिवाद की ही भरोसे लोग राजनीतिक वैतरनी पार करी।’ मोहन बाबू के बात सच साबित भइल आ समाजवाद के परंपरागत वोट निर्दल प्रत्याशी की ओर खिसक गइल आ मोहन बाबू चुनाव हार गइलन। 1996 में सलेमपुर से संसदीय सीट खातिर पर्चा भरलन। बहुत विरोध भइल। बाद में मोहन बाबू के टिकट कट गइल आ सहाय जी के टिकट मिलल त कहले रहलन- ‘ पार्टी में अंदरुनी लोकतंत्र जिंदा बा।’ 2009 में देवरिया से संसदीय सीट के चुनाव लड़त रहलन। जनता के रुझान बसपा प्रत्याशी की ओर बढ़ल जात रहे। मोहन बाबू से फोन पर पूछलीं- नेता जी ! राउर का पोजिशन बा? मोहन बाबू कहलें-‘ प्रत्याशी टिकट खरीद के ले आइल बा, अब वोट खरीदत बा। अइसन खरीद-फरोख्त में हमार पोजिशन ठीक ना बा।’ इ तीन बेर के तीन बात आज की राजनीति पर बहुत कुछ सोचे समझे आ बतकुचन करे खातिर काफी बा। अपनी येही शब्दन से मोहन बाबू के श्रद्धांजलि देत इ कविता-
 रुष्ट होके भी कभी, दल से नाता ना तोड़ा।
 राह में आई मुश्किल बहुत, मंजिल से मुंह ना मोड़ा।।
 सियासत की चाल ऐसी है, लोग बदल जाते हैं चंद लम्हों में।
 मोहन ने ताउम्र कभी समाजवादी विचारधारा ना छोड़ा।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 26/9/13 के अंक मे प्रकाशित है . 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

डीजे बाजे, डंडा बाजे बाज रहे इंसान..

 बाज रहे इंसान.. साधो! झूठ ना बोलावें। झूठ बोले त कौआ ना, कुक्कुर काट ले, पागल., अवारा., सनकी.। मनबोध मास्टर आज सब कह दीहें अपने मन की। चारों तरफ बजनी-बजना के माहौल बा। बात कहां से शुरू कइल जा, इहे ना बुझात बा। पब्लिक बिजली खातिर बाजति बा। पुलिस के डंडा बाजत बा। पॉलिटिशयन श्रेय लूटे खातिर चंग बजावत हवें। पुलिस के लीला भी गजबे बा। अपने क्षेत्र की विधायक के ना पहिचानत हवें, अपराधिन के का पहिचनिहें? रहनुमा की गिरेवान में हाथ डाल सकेलन लेकिन कवनो रहजन के ना पकड़ सकेलन। शहर के पुलिस ‘ बबरुबाहन के सेना’ बन गइल बा। अट्ठारह दिन के महाभारत एके दिन में खत्म कइला में लागल हवें। सिंघड़िया में बिजली खातिर बवाल होखे, चाहे रुस्तमपुर में सड़क खातिर प्रदर्शन। तरंग क्रासिंग के मामला होखे चाहें हट्ठी माई थान के गणोश प्रतिमा विसर्जन। बबरुवाहन के सेना जनता के खूब सेवा कइलसि। जब-जब पुरुआ बही सेवा याद रही। एगो बात और बेबाक। चुनावन में कई रंग के झंडा लउकेला, बहुते नेता लउकेलन। मौजूदा वक्त में जनता परेशान बा त उ नेता लोग कवना कन्दरा में लुकाइल हवें? पब्लिक जहां-जहां पिटाति बा, बाबाù-बाबाù चिल्लाति बा। बाबा आवत हवें, बाबा धावत हवें। घाव पर मरहम लगावत हवें, प्रशासन के गरमावत हवें। जनता जयकार लगावति बा। सजो दर्द खत्म। सवाल इहो उठत बा कि विसर्जन चाहें विदाई त जुदाई के माहौल होला। भक्त लोग काहें डीजे बजावेलन? काहें डांस देखावेलन? काहें ज्यादा चढ़ावेलन? नर्सेज हास्टल चाहे महिला छात्रावास देखते जोश काहें दूना हो जाला? अइसन श्रद्धा की सहारे काहें भक्ति के श्राद्ध कइल जाता? येह बारे में कबो सोचल गइल? पूजा नेम-धरम के चीज रहल। नेम-धरम ताक पर रख के चंदाउगाही, पियक्कड़ई, नाच-गाना( भक्तिरस के ना, भोड़ा रस के) बढ़त जाता। इ के रोकी? धीरे-धीरे इहे परंपरा बनल जाता। प्रतिमा स्थलन पर बाजत लाउडस्पीकर से मंत्र, अराधना, भजन, प्रार्थना, आरती के स्वर कम सुनाई आ गंदा गीत के संगीत से पांडाल पवित्र होई त देवी-देवता कइसे प्रसन्न होइहन। जिला की बड़का साहब के एगो बात बहुत नीक लागल-‘ शहर की तीस-चालीस मूर्तियन के विसर्जन करावला में इ हाल बा त दुर्गापूजा में चार हजार प्रतिमा विसर्जन के स्थिति कइसे सम्हराई?’ बोल-बबरुबाहन। ना बोलबù त सुनù कविता 
डीजे बाजे, डंडा बाजे, बाज रहे इंसान। 
बांस की पुलुई कानून के लुग्गा, टांग करे घामासान।।
 बिगड़ रहल कानून व्यवस्था, चहुंओर बस हुड़दंग। 
पब्लिक-पुलिस-पॉलिटिशियन पीटें, आपन-आपन चंग।।

-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्य्नग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 19/9/13 के अंक मे प्रकाशित है.




गुरुवार, 12 सितंबर 2013

कहां-कहां पेवन सटब$

मनबोध मास्टर प्रदेश की दुर्दशा पर बहुत दुखी हवें। सीधा सवाल सूबा की नरेश से ही दाग दिहलन- का हो नरेश! लगता कुछऊ ना बची शेष। ‘ कहां-कहां बादर फाटी, कहां-कहां पेवन सटबù’। प्रदेश के छवि तार-तार होत बा। प्यार के बात रार के बात हो जात बा। मामला एतना खार हो जात बा की मार हो जाता। लोकतंत्र में हिंसा के जगह ना होला लेकिन रउरी राज में दु दर्जन से ऊपर त सांप्रदायिक दंगा हो गइल। सांप्रदायिक हिंसा जेतने दुर्भाग्यपूर्ण ओतने चिंताजनक। वैमनस्यता बढ़त बा। प्रदेश जरत बा। लोग राजनीति करत बा। दंगा-फसाद तù सभ्य कहाये वाला शहर में सुनल जात रहे। गांवदे हात त सामाजिक सद्भाव की मजबूत ताना-बाना से बनल रहल। बगैर एक दूसरे की सहयोग से कमवे ना चलत रहे। कबुरगाह की बगइचा में दूल्हा के परछावन,रामलीला मैदान में तजिया के मेला हमरी गांव के पहचान रहे। फगुआ की दिने करिंयाय में ढोलक बांध के सुलेमान चाचा दुआरी-दुआरी ‘ सदा आनंद रहे येही द्वारे.’ के दुआ देत रहलन। रंग-अबीर से सराबोर सुलेमान चाचा पर जब पंडीताइन छपाक से एक बाल्टी पानी फेंक दें त चचवा के कबीर शुरू हो जात रहे। एतना भद्दा..एतना फटहा. एतना गंदा..। केहु बाउर ना मानल। रमई तिवारी मोहर्रम पर जवन तासा बजावें मियां लोग का बजायी। दस दिन ले रमई तिवारी के तासा आ घरभरन सिंह के तमाशा देखे खातिर तिवारी टोला के पंडीताइन लोग अदालत मियां की बंगला पर जुटत रहे। घरभरन सिंह के गदका भांजल देखे खातिर मियांइन लोग झरोखा से बुरका हटा के झंकले बिना ना रहें। कहीं कटुता ना। कवनो द्वेष ना। ‘ माहौल अशांत, स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंतण्रमें’ अइसन शब्द शहर में रहल। गांव-देहात के लोग एकर मतलब तक ना बुझत रहे। बड़-बड़ विवाद अदालत मियां की बंगला चाहे जंगली पांड़े की घोठा पर पंचाइत में निबटा दिहल जात रहे। अब महापंचायत के जमाना आ गइल। मुजफ्फरनगर, मेरठ, शामली सांप्रदायिक उन्माद की आग में जरता। सेना लगावे के परता। जालीदार टोपी पहिन के मुख्यमंत्री जी मीडिया के संबोधित करत हवें। वोट बैंक के विकृत राजनीति आ तुष्टीकरण के एतना घटिया प्रदर्शन। यूपी रसातल में जाता आ लोग का मिशन 2014 लउकत बा। इ राजनीति बहुत बेह्या, बहुत बेर्शम बा। गांव-देहात, घर-परिवार में दरार डार दिहलसि। अब अदालत मियां की बंगला आ जंगली पांड़े की घोठा पर कवनो पंचाइत ना होई। अब होई ‘ महापंचायत’। सुलेमान मियां की ऊपर रंग के एको छींटा पड़ी त दंगा हो जाई। रमई तिवारी आ घरभरन सिंह अपनी दुआर से तजिया ना निकले दीहें। केहू रामलीला मैदान में तजिया मेला लगवा के देखा दे। कबुरगाह की बगइचा में परछावन ना होखे दिआई। इ सब काहे होत बा? सबकी पीछे एके कारन बा-
 गांव जर जाय त जर जाय। 
लरिका के अल रह जाय।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्य्नग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 12/9/13 के अंक मे प्रकाशित है.

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

देश होता खोंखड़, घाव होता गहीर.

मनबोध मास्टर सरकार की प्रशंसा में पुल बांध दिहलें। भाई पुल त जरुरिये बा। ‘ सियार के विआह ’ एतना बरखा में भी शहर की सड़क पर पानी जवन हिलोर मारे लागत बा। अब कई जने पढ़लिलखल कहिंहे- यह सियार का विवाह क्या होता है? अरे भाई! गांव-देहात में जब एक ओर दइब घाम कइले रहलन आ दूसरा सिवान में पानी बरसत लउकेला त ओके सियार के विआह ही कहल जाला। सरकार के प्रशंसा होखहि के चाहीं। सरकार बहुत उदार बा। छप्परफाड़ के देत बा। जे बेरोजगार बा ओके बेरोजगारी भत्ता देत बा। भइया लोग के लवलाइटिस ध लिहलसि। मोबाइल चार्ज कराके दिन-रात बैट्री डाऊन कइला की चक्कर में पड़ल हवें। लैपटॉप भी बंटे लागल। गांव में बिजुलिया अइबे ना करी त मोबाइल आ लैपटॉप चार्ज कइसे होई। लक्ष्की लोग के साइकिल बंटाइल। चलावे लगली त माई-बाप से स्कूटी मांगे लगली। गरीब मेहरारू लोग के साड़ी मिली। बुजुर्ग लोग के कंबल मिली। सत्तर वर्ष की उम्र में भी चाचा लोग डाक्टरी पढ़इहें। लाभ त बहुत भइल,बहुत होई। बहुत विकास भइल। बहुत कुछ बाकी बा। सड़क की मामला में एतना पिछुआइल बानी जा की- ‘ सड़क बीच गड़हा है कि गड़हा बीच सड़क है कि सड़किये गड़हा है कि गड़हवे सड़क है’ टाइप के संदेहालंकार हो गइल बा। हाईबे के हाल तक बेहाल बा। जब टूटता कवनो ट्रक के गुल्ला त बहुत होत बा हल्ला-गुल्ला। लागत बा जाम त तेजी पर लाग जाता विराम। एक दिन के जाम दूसरा दिने खुलत बा। सड़क पर लुटावल धन कवना जन की कामे आइल। जमाना बहुत बदलल बा। लेकिन चित्त आ चिंतन उहे पुरनके बा। रोटी-दाल-बाजार के चिंता। देश बहुत तरक्की करत बा। केंद्र के होखे चाहे सूबा के, सरकार ‘ दोऊ हाथ उलिचिए यही सयानो काम’ की लाइन पर चलति बा। अब त संसद में हंटर भी चलत बा। सीमा पाकिस्तान आ चीन बढ़त आवत बा त हंटर उठते ना बा। रुपया लगातार गिरत बा। पहिले गांव-देहात में लरिका खेलावत में लोग कहत रहे- ‘
हेले हेले बबुआ, कुरुई में ढेबुआ’। ढेबुआ के जमाना त बीत गइल। रुपया के आइल लेकिन उ केतना किकुरल जाता। रुपये पर सब दबाव बा त किकुरबे करी। पहिले रुपया के डालर से दोस्ती रहल। अब फासला 68 के बा। हे रुपया! तूं और गिर जा। एतना गिर जा कि सड़क पर गिरल रहù त केहू उठावे के चाहत ना करे। चोरी-डकैती-लूट के डर समाप्त हो जा। हाथ के मैल होजा। रुपया गिरला से सबसे बड़ा फायदा ई होई की अमीर-गरीब के खाई स्वत: ही मिट जाई। जमाखोरी, घूसखोरी, हेराफेरी, धोखाधड़ी समाप्त हो जाई। आई येह कविता के अर्थ खोजल जा-
देश होता खोंखड़, घाव होता गहीर। खूब चिंचियाइल करीं, बनल लोग बहीर।।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

कालनेमि ओढ़ले बा संत के लिवास..

मनबोध मास्टर की संस्कार में रहल संत-सेवा, संत-सम्मान, संत-समागम, संत-प्रवचन, संत- आस्था, संत-दर्शन, संत-सत्संग..। कहल गइल बा- ‘ संत दरस को जाइये, तज ममता अभिमान। जस-जस पग आगे बढ़े, कोटिन यज्ञ समान’। देशभक्त, संस्कृति रक्षक, धर्मप्रेमी, अध्यात्मवेत्ता संत-महापुरुष लोग की चरन में शीश नवा के ‘ कलयुग के कालनेमि’ के वृतांत शुरू कइला की पहिले दिल-दिमाग में संत-असंत के बुझौव्वल बुझल जा। माथ मुड़ा लिहले, गेरुआ चढ़ा लिहले, दाढ़ी बढ़ा लिहले, भभूत रमा लिहले, करोड़ों चेला-चेलिन के लाइन लगा लिहले का केहू सांचों में संत हो जाला? बाना में ना,आचरण में संत दिखे के चाहीं। कलिकाल की काल में गुरुघंटालन के बाढ़, कुकर्मिन के कीर्तन, पाखंडिन के प्रवचन, अध्यात्म के ढोंग पर गोसाई बाबा बहुत पहिलही लिखले रहलें- ‘ मिथ्या रंभ दंभ रत जोई। ता कहु संत कहे सब कोई ’। कलियुग की बानाधारी संत की बारे में कहल गइल-‘ पर त्रिय लंपट, कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने’। वाह का जमाना आइल बा- ‘ कलिकाल बिहाल किये मनुजा, नहीं मानत हौ अनुजा-तनुजा ’। अब त बस - पंडित सोई जो गाल बजावा.। मौजूदा वक्त में कुटिया वाला संतन के अकाल आ कोठी अटारी वाला बानाधारी संतन के संख्या ज्यादा लउकत बा। बानाधारी की पास दौलत बा, ताकत बा, सोहरत बा, समर्थक बा। येह लिए भी उ कानून से ऊपर बा। लानत बा अइसन बानाधारी संत के जेकरा पास आश्रम त बा लेकिन ना श्रम बा न शर्म। वैभव एतना बा की समाज व कानून के भय समाप्त हो गइल बा। अइसन बानाधारी संत, सादगी के स्वाहा कर के रंगमिजाजी में डूबल बा। बहक-बहक के बोलल प्रवचन हो गइल बा। विवादास्पद आचरण की चलते विश्वसनीयता के संकट खड़ा बा। धर्म-अध्यात्म की महान परंपरा के कलंकित करे वाला काम से आस्था के भी आघात पहुंचत बा। अपनी पूंजी-पहुंच की बल पर केहू के पहुंचा पकड़ के शक्ति, केहू के आबरू लूट के तृप्ति, केहू के ठग के भक्ति, केहू के सम्मोहित कर के आसक्ति वास्तव में संत के आचरण ना ह। इ त संत की लिवास में कालनेमि के आचरण ह। रावन के आचरण ह, जवन दाढ़ी-जटा बढ़ा के भिक्षा की बहाने सीताहरण कइले रहलें। रावन की‘ भिक्षाम् देहि’ शब्द में सीताहरण हो गइल। आज ‘ दीक्षाम् लेहि’ शब्द धंधा बन गइल। संपत्ति की सहारे आश्रम सजत बा। वैराग्य कहां बा? त्याग कहां बा? योग लापता बा, भोग हाबी बा। कुश-आसन गायब बा विषय वासना में आसन सिद्ध कइल जाता। शक्तिबर्धनी बटी खाके, भक्तिन के भरमा के, सेक्स साधना से कांतिहीन मुखारविंद कइला की बाद भी जेकरा कवनो लाज ना आवे, अइसन बानाधारी संत की बारे में ‘ दाढ़ी-झोंटा वालों! ऐसा काम ना करो, धर्म के कर्म को बदनाम ना करो’। की साथ शिलाजीत बाबा के जयकार लगावत बस इ कविता-
  कालनेमि ओढ़ले बा , संत के लिवास।
 साधु-संत चिन्हला में, झंझल पचास।।
 बच्ची के कच्ची ना रहे दिहलसि चंठ।
 अइसन ‘असंतन जी’ के महिमा अनंत।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के २९ अगस्त १३ के अंक में प्रकाशित है।

बुधवार, 28 अगस्त 2013

आई ना ओदारल जा प्याज के बोकला...

मनबोध मास्टर प्याज के बोकला ओदरला में लागल बाड़न। सबका पता बा बोकला ओदरले प्याज में कुछ ना बची। प्याज की बारे में एगो कहावत कहल जाला- ‘ नया मुल्ला प्याज बहुत खाता है।’ भइया ! अब मुल्ला नया होखें चाहे पुराठ प्याज से परहेज करत हवें। प्याज बहुत दुर्गध देले। छिलला पर आंख से आंसू गिरा देले। प्याज सरकार भी गिरा देले। भोजपुरी गायक मनोज तिवारी के एगो गाना याद आवत बा- ‘ वाह रे! अटल चाचा, पियजुइया अनार हो गइल.’। इहे प्याज ह जवन अटल जी के सरकार के सरका देले रहे। प्याज के लेके हाल की दिन में बहुत मजेदार खबर भी अइली। मध्य प्रदेश की छतरपुरा गांव में किसान चंपालाल त प्याज की महंगाई से ही मालामाल हो गइलन। प्याज पैदा कइलन त पांच रुपया किलो बिकत रहे, बेचला की जगह पर गोदाम धरा दिहलन। जब आसमान पर दाम चढ़ल त बेंचलन। अब प्याज बेंच के कार खरीद लिहलन। इ प्याज के प्र-ताप ह। अब त डाकू-चोर भी रुपया -पैसा, गहना-गुरिया के डकैती की जगह पर प्याज लूटत हवें। जयपुर-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर बंदूक की बल पर ट्रक से 40 टन प्याज लूट लिहलन। आज प्याज के नाम निकारते मुंह से बदबू निकरे लागत बा। प्याज पॉलिटिक्स देखे के होखे त दिल्ली जाई। दिल्ली सरकार आ विपक्षी भाजपा दुनो स्टाल पर सस्ता प्याज बेच के वोटरन के भरमावत हवें। प्याज देसज दवाई भी ह। अगर कान केहू के बथता त प्याज के रस ही लहता। कहीं जल गइल त झट से प्याज कूंची आ लगा दीं। कीड़ा-मकोड़ा की कटले पर प्याज के कूटीं आ लगायीं इ देहाती बूटी ह। हिस्टीरिया में बेहोश रोगी की नाक में प्याज कूट के सुंघाई, झट से भूत उतर जाई। आज प्याज के महत्व पर ताजातरीन घटना रक्षाबंधन की पर्व पर फेसबुकियन की बीच र्चचा में रहल। राखी बंधवायी में एगो बहना अपनी भइया से नगदी आ गहना की जगह पर गिफ्ट में बस पांच किलो प्याज मंगलसि। प्याज के बोकला ओदरले कुछ ना भेंटाई लेकिन प्याज पर बस इहे कविता सटीक बइठी- मनमोहन की राज में, सगरो राज सुराज। 
महंगी अस चंपले बा भइया, दुर्लभ भइल पियाज।।
 बोकला बहुत ओदारल गइल, तबो ना लागे लाज। 
 पॉलिटिक्स आ पार्लियामेंट में, भइल ना एकर इलाज।।
 येही प्याज की कारने, गइल रहे अटल के राज। 
मनोज तिवारी गवले रहलें, लोकगीत में साज।।
 रक्षाबंधन पर्व पर, प्याज बनल सरताज।
 बहना, नगदी-गहना छोड़ के, गिफ्ट में मांगे प्याज।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के २२ अगस्त १३ के अंक में  प्रकाशित है।

सोमवार, 19 अगस्त 2013

पंद्रह अगस्त के सब स्वतंत्र...

मनबोध मास्टर स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश की नाम संबोधन पर बहुत कुछ सुना गइलन। आखिरकार पंद्रह अगस्त के माहौल रहे, येह लिए भी उनकर जुबान कुछा ज्यादा ही स्वतंत्र रहे। आई सुनल जां उनकर संवोधन- देश के भाई-बहन लोग! सादर पण्राम। भइया इ भारत वर्ष ह। जन-जन में आज राष्ट्रीय पर्व के हर्ष बा। सोने के चिरई रहल हमार देश। पांखि नोंच के आपन तिजोरी भरत गइलन रहनुमा। अब त रहबर आ रहजन में कवनो फरके ना लउकत बा। इटली की बैसाखी पर लंगड़ात सत्ता। विरोध की नाम पर हिलत-डुलत ‘ भगवा पत्ता’। छोट दलन के सेटिंग- गेटिंग-चिटिंग। देश की साथे रोज एगो चिट। सीमा पर आंख तरेरत दुश्मन आ पोंछि सुटुकवले सरकार। दखिनहा की मरले पियराइल धान, ऊपर से चढ़ल हरिहर-कचनार साई, डंवरा जइसन खरपतवार। कइसे पनकी फसल। कइसे पनपी देश। कवना घाटे लागी नाव, जवना में मल्हवे करत बा छेद। हर रिश्ता बा घात के। चरित्र में ईमानदारी बस देखावे के दुनियादारी। व्यवहार में भ्रष्टाचार से भरल संसार। संस्कार त बस किताब में पढ़े-पढ़ावे वाली विषय वस्तु। जज्बात सिसकत बा। अस्मिता तार-तार होत बा। सभ्यता के चीर हरण होत बा। इंसान में भेड़िया के आत्मा समात बा। जे लाचार बा, मार खाके भी दर्द दबवले बा। करहला के अधिकार भी छिना गइल बा। अन्नदाता की मर्जी पर मेहनतकश के मजूरी तय होत बा। मजूरन की हक खातिर लड़े वाला लाल रंग अब पनछुछुर होत बा। वाम मार्ग के राही अगर दक्षिण पंथ के राह पकड़ लें त बुझीं राजनीति के खिचड़ी पक के तैयार हो गइल बा। रउरा सभे जान के ताज्जुब करब की देश की राजधानी में असों जेतना तिरंगा के बिक्री भइल ओहमे सौ में बीस चायनीज रहल। हमरी स्वतंत्रता आ संप्रभुता के प्रतीक तिरंगा भी आयातित हो गइल। गांधी बाबा त कहलें रहलें, चरखा चलावù सूत काटù। वाह रे देश!
वाह रे देश के लोग! नजर में केतना मोतियाबिंद छा गइल की चीनी सूत के कपड़ा आ चीनी रंग से कइल छपाई लोग के काहें बहुत पसंद पड़त बा। अंत में एगो कविता की साथे आपन बात पर विराम लगावत हई। जय हिंद। अंखिगर स्वतंत्र,
 आन्हर स्वतंत्र। 
अनपढ़ गंवार 
‘बा-नर’ स्वतंत्र। 
नेता स्वतंत्र, 
वोटर स्वतंत्र। 
संसद का हर
 â€˜जो-कर’ स्वतंत्र।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्य्न्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 15 अगस्त 13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

सनकी कुक्कुर फेरु बा कटले, मानी ना इ खाली डंटले..

मनबोध मास्टर पाक की दुस्साहस आ सरकार की शिखंडीपन पर माथा पिटत हवें। हाय! इ का भइल? फिर मरा गइलन हमार सैनिक। देश की ऑन पर शहीद हो गइलन जवान। संसद में फेरु बहस जारी हो गइल। अइसन बहस जवना में शहीदन के बलिदान पर भी सदस्य लोग एकमत ना भइलें। केतना घटिया रील घूमत बा नेतन की दिमाग में। मंत्री बयान देत बा- ‘ फौजिन की ड्रेस में आतंकवादी रहलन, जवन हमला कइलन’। छी:, थू। एक बेर ना हजार बेर तोहरा येह बयान पर थूथू। हमरा देश की सीमा पर कबो चीन चढ़ता, कबो पाक बढ़ता। हमरा देश के हाल त ‘ अबरा के मेहरी’ जस हो गइल बा। देश की नेतृत्वकारी शक्ति की क्षमता पर प्रश्न चिह्न बा। सीमा की सुरक्षा के बेहतर इंतजाम ना क पावत हवù त देश के अपनी रहमोकरम पर छोड़ द लेकिन शर्मनाक बयान त मत दिहल करù। पाकिस्तानी घात लगा के हमला करत हवें। हमार पांच जवान शहीद हो गइलन। पाक की येह कारनामा पर इहे कहल जाई- ‘सनकी कुक्कुर फेरु बा कटले, मानी ना इ खाली डंटले।’ अइसन सनकी कुक्कुरन के दौड़ा के मार दिहल जाला। केइसन अरमीशन-परमीशन। पाक के औकाते केतना बा? हमरा उत्तर प्रदेश के लरिका अगर एकै साथ मूत दिहें त बुझीं पाकिस्तान बहि गइल। सरकार के शिखंडीपन देखीं, उहे घिसल-पिटल बयान-‘ हम शांत नहीं बैठेंगे’। करति का बा सरकार? शरीफ की अइसन शराफत से दोस्ती। इ हाथ मेरावत हवें, उ छूरा घोंपत हवें। पूरा देश सैनिकन की हत्या पर उबलत बा आ मंत्री जी पाकिस्तान के क्लीन चीट देबे पर लागल हवें। षड़यंत्रकारी से कइसन दोस्ती? विश्वासघाती पर कइसन भरोसा? सीमा पार से निरंतर गोली-बारी, फिर कइसन संघर्ष विराम? बंद करù बात-चीत। बस अब जंग के जरूरत बा। सिहुर-सिहुर कइला से, कुक्कुर के पूंछ भला सोझ होई मलला से। दुष्ट पाक मानी अब सिकमभर कंड़ला से। पाक की औकात पर, ओकरी कुराफात पर, रोज की आघात पर, सीमा की हालात पर बस इहे कविता सटीक बइठी-

यूपी की लरिकन की मुतले से बहि जाई, 

नापाक पाक के ,बस एतने औकात बा।

 मनबढ़ बा एतना, टेढ़ कुक्कुर की पूंछ जेतना,

 छह माह में कइलसि, सरसठ बेर उत्पात बा।। 

केतना लपेटाई तिरंगा में शहीदन के शव? 

घरी-घरी घात से, लागत आघात बा। 

आर-पार चाहत बा, जम करके एक बार, 

सीमा से सटले, कुछ अइसने हालात बा।।



- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ८/८/१३ के अंक में प्रकाशित है।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

जाको संग कुमति उपजत है, हम भी उनके संग..

मनबोध मास्टर के आपन अलग मोर्चा ह। न वामपंथी न दक्षिणपंथी। न पूरबपंथी न पश्चिम पंथी। आज के अखबार पढ़ला की बाद संत कवि सूरदास से माफी मांगत एगो कविता गुनगुनात रहलें- ‘जाको संग कुमति उपजत है, हम भी उनके संग। बजाओ अपने-अपने चंग.।’ अखबार के कुछ समाचार उदवेग के रख दिहलसि। बानगी के तौर पर कुछ मामला रउरो सामने बा। महिला आइएएसअधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्बन के मामला.। गौतम बुद्ध नगर में एगो धर्म विशेष के निर्माण रोकल त बहाना बा, पर्दा के पीछे खनन माफियन के सत्ता से गंठजोड़ की कारन ही अकारन रेता माफिया ‘दुर्गाजी’ के ‘रेतवा’ दिहलन। हाईकोर्ट के ही निर्देश बा कि सार्वजनिक भूमि पर धार्मिक स्थल के निर्माण की पहिले अनुमति लिहल जरूरी बा। दुर्गा आपन शक्ति देखवली त ‘नाग-पाल’आपन पॉवर। गांव-देहात में एगो किस्सा कहल जाला कि यदि राजा कहें कि ‘ ऊंट, बिलरिया टांग ले गइल, त बस हां-जी, हां-जी कहियो’। हां-जी की जगह ना-जी त झेलीं दुर्गा जी राजा के नराजी। दूसरा मामला इ बा कि मनरेगा मजूरन के अब मोबाइल मिली। बहुत जरूरी बा। रोटी बिना त दु वक्त कटि जाई लेकिन ‘ मोबाइल बिना जिनगी कइसे कटी?’ मोबाइल चार्ज करे बदे भर के बिजली भी गांव में मिल जात त अति सुन्दर हो जात। तीसरा मामला, बहुत स्थानीय, बहुत ज्वलंत बा। पिपराइच कस्बा में एगो जमीन पर दु वर्ग के दावेदारी। इहे दुनियादारी ह। दावेदारी जिंदा रही त दूनों ध्रुव के राजनीति भी जिंदा रही। भइया लोग! काहें बोर्ड लगावत हवù, काहें उखाड़त हवù? गोरखपुर के काहें ‘अयोध्या-फैजाबाद’ बनावे पर तुलल हवù। चौथा मामला, महानगर की एगो मैरेज हाऊस में सवर्ण एकता संकल्प दिवस मनावल जात रहे। कुछ अति उत्साही ‘स-बरन’लोग असलहा से फायरिंग करे लगलें। दइब के कृपा रहल नाल नीचे ना भइल नाहीं तù कुछ कार्यकर्ता वइसे कम हो जइतन। भइया लोग तोप के लाइसेंस लेलù लेकिन दाग समय से। असमय के चुटपुटिया भी भारी पड़ जाले। अइसने कुछ घटना आ अंजाम देबे वालन के आपन रहनुमा माने वाला कवि के इ उद्गार-                                जाको संग कुमति उपजत है, हम भी उनके संग।
                             बजाओ अपने-अपने चंग, दिखा दो अपने-अपने रंग।।
                                      जग-गिलास से पेट भरो नहिं, चेतो कुछ नयो ढंग।
                                  कुआं त अब रह ही गयो ना, घोल दो पाइप लाइन भंग।।
                                        रार बसेहत रहो हर जगही, काटौ उड़त पंतग।
                                     बढ़ै विवाद कुछ गला साफ हो, यही धरम का अंग।।
                                          खुरफाती तत्वों से मिलकर, आये दिन कुछ हुड़दंग।
                                             कहें देहाती अति उमंग से, लड़ो विरोधिन संग जंग।।
 मेरा यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 1/8/13 के अंक मे प्रकाशित है

जाको संग कुमति उपजत है, हम भी उनके संग...

मनबोध मास्टर के आपन अलग मोर्चा ह। न वामपंथी न दक्षिणपंथी। न पूरबपंथी न पश्चिम पंथी। आज के अखबार पढ़ला की बाद संत कवि सूरदास से माफी मांगत एगो कविता गुनगुनात रहलें- ‘जाको संग कुमति उपजत है, हम भी उनके संग। बजाओ अपने-अपने चंग.।’ अखबार के कुछ समाचार उदवेग के रख दिहलसि। बानगी के तौर पर कुछ मामला रउरो सामने बा। महिला आइएएसअधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्बन के मामला.। गौतम बुद्ध नगर में एगो धर्म विशेष के निर्माण रोकल त बहाना बा, पर्दा के पीछे खनन माफियन के सत्ता से गंठजोड़ की कारन ही अकारन रेता माफिया ‘दुर्गाजी’ के ‘रेतवा’ दिहलन। हाईकोर्ट के ही निर्देश बा कि सार्वजनिक भूमि पर धार्मिक स्थल के निर्माण की पहिले अनुमति लिहल जरूरी बा। दुर्गा आपन शक्ति देखवली त ‘नाग-पाल’आपन पॉवर। गांव-देहात में एगो किस्सा कहल जाला कि यदि राजा कहें कि ‘ ऊंट, बिलरिया टांग ले गइल, त बस हां-जी, हां-जी कहियो’। हां-जी की जगह ना-जी त झेलीं दुर्गा जी राजा के नराजी। दूसरा मामला इ बा कि मनरेगा मजूरन के अब मोबाइल मिली। बहुत जरूरी बा। रोटी बिना त दु वक्त कटि जाई लेकिन ‘ मोबाइल बिना जिनगी कइसे कटी?’ मोबाइल चार्ज करे बदे भर के बिजली भी गांव में मिल जात त अति सुन्दर हो जात। तीसरा मामला, बहुत स्थानीय, बहुत ज्वलंत बा। पिपराइच कस्बा में एगो जमीन पर दु वर्ग के दावेदारी। इहे दुनियादारी ह। दावेदारी जिंदा रही त दूनों ध्रुव के राजनीति भी जिंदा रही। भइया लोग! काहें बोर्ड लगावत हवù, काहें उखाड़त हवù? गोरखपुर के काहें ‘अयोध्या-फैजाबाद’ बनावे पर तुलल हवù। चौथा मामला, महानगर की एगो मैरेज हाऊस में सवर्ण एकता संकल्प दिवस मनावल जात रहे। कुछ अति उत्साही ‘स-बरन’
लोग असलहा से फायरिंग करे लगलें। दइब के कृपा रहल नाल नीचे ना भइल नाहीं तù कुछ कार्यकर्ता वइसे कम हो जइतन। भइया लोग तोप के लाइसेंस लेलù लेकिन दाग समय से। असमय के चुटपुटिया भी भारी पड़ जाले। अइसने कुछ घटना आ अंजाम देबे वालन के आपन रहनुमा माने वाला कवि के इ उद्गार- 
जाको संग कुमति उपजत है, हम भी उनके संग।
 बजाओ अपने-अपने चंग, दिखा दो अपने-अपने रंग।।
 जग-गिलास से पेट भरो नहिं, चेतो कुछ नयो ढंग।
 कुआं त अब रह ही गयो ना, घोल दो पाइप लाइन भंग।।
 रार बसेहत रहो हर जगही, काटौ उड़त पंतग।
 बढ़ै विवाद कुछ गला साफ हो, यही धरम का अंग।। 
खुरफाती तत्वों से मिलकर, आये दिन कुछ हुड़दंग।
 कहें देहाती अति उमंग से, लड़ो विरोधिन संग जंग।।


- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 01 अगस्त 2013 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

हमरो शहर में चाहीं $ डांस बार$

मनबोध मास्टर के मन मयूर सावन की फुहार बगैर ही नाच उठल। महाराष्ट्र में डांस बार खोले के मंजूरी की साथे मुंबई नाचत बा। छप्पन छूरी बहत्तर पेंच के मजा ओइजा की लोग के मिलत बा। अगर इ व्यवस्था गुड़गांव में रहित त नवहा लक्ष्का-लक्ष्किन के बेइज्जती ना महसूस भइल रहित। बइसे हम्मन के पुरखा पुरनिया लोग बहुत पहिले से ही सिखावत रहलें-‘ सात हाथ हाथी से डरिहा, चौदह हाथ मतवाला से। अनगिनत हाथ तू डरिहा बबुआ, पुतुरिया सुरतबाला से’। आज के नवहन का पुरनिया लोग के बात नरेटी धरत बा। जे ना पियत-पियावत बा ओके बैकर्वड कहल जाता। अब त लक्ष्कियो पब में जाये लगली। गांव-देहात के मनई नून-रोटी-लकड़ी जुटावला में परेशान रही उ कहां डांस बार के चांस पाई। पीयल-पियावला में अझुराई त कच्ची चाहे देसी ले पहुंच पायी। खैर महाराष्ट्र के आपन महत्व ह। पहिले से ही कहल जात रहे- ‘..बांबे पैसा वालन के’। अब डांस बार में बार गर्ल्स जवन जाम परोसिहन ओहमे अलग से जान डाल दीहें। गदराइल देहि जब चोन्हा मारि के जाम पियाई त कई लोग बगैर पियते मदहोश हो जाई। एगो अनुमान की मुताबिक मुंबई में पचहत्तर हजार गर्ल्स लोग बेरोजगार हो गइल रहली। अब उनकर धंधा चोख- चटक हो गइल। मुंबई त ओइसे भी माया नगरी ह। कबीर बाबा बहुत पहिले ही बक देले रहलन- ‘माया महाठगिन हम जानी।’ मुंबई में मौज-मस्ती, डेटिंग-सेटिंग, लवर प्वाइंट के भला कहां अकाल रहल। बैंड स्टैंड, अरनाला बीच, मद आइस लैंड, मनोरी एंड गौरार बीच, जूही -चौपाटी, जीजाबाई उद्यान, सीफेश, मडाल अक्सा बीच, मर्व और पवाई लैक अइसन तमाम नामी-कुनामी ठेहा बा जहां खुल्लम-खुला प्यार के इजहार होत रहेला। कुछ ठगे लन, कुछ ठगा जालन। येह ठगला-ठगइला की प्रवृत्ति में हमार शहर गोरखपुर बहुत पिछुआइल शहर लागे ला। एइजा मौज मस्ती के ठेहा मुंबई अइसन भला कहां मिली? गोरखपुर में ब्ही पार्क, रीजनल स्टेडियम, पंत पार्क, इंदिरा बाल बिहार, तारा मंडल, रेलवे म्युजियम, लाल डिग्गी पार्क आदि कुछ जगह बाड़िन जहां प्रेम के पेग बढ़ावल जाता। गोरखपुर की सनातनी संस्कार पर मुंबइया प्रवृत्ति के प्रगतिशीलता हम्मन जइसन बूढ़-खसोट लोग का भले बाउर लागी लेकिन नवहा-नवही एडवांस बनत हवें। अब जेकरा पाश्चात्य संस्कृति से परहेज होखे उ चाहे रामगढ़ में डूबे चाहे राजघाट पहुंच जा। लक्ष्का त इहे कहिहें-‘ दिल है कि मानता नहीं.’। घवराई जनि, कुछ इंतजार करीं, फेरु देखीं
डांस बार के चांस मिली त, चढ़ि जा प्याला पर प्याला।
 बाल गर्ल्स की हाथ से पियले, बौराई पीयेवाला। 
मस्ती छलकी मदिरा छलकी, छक के पीये बदे मिली।
 हर शहर में डांस बार हो, हर गली में मधुशाला।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 25 जुलाई 13 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

रोवत हवें ऊंट, घूंट-घूंट मरला से, साहब काहें बदे हमका बचवलें

मनबोध मास्टर व्यवस्था की येह अवस्था पर उंगली उठावला से परहेज ना कइलें। सवाल छोटवर रहे लेकिन समस्या बड़वर रहे। भगवान बुद्ध के धरती कहायेवाला कुशीनगर में एगो थाना बा पटहेरवा। बगल से गुजरे की पहिले नाक पर रुमाल जरूरी बा। बदबू के कारण बा, थाना में सड़त ऊंट। थाना में दुपहिया,चरपहिया सड़त त बहुते देखले होइब लेकिन एइजा ‘रेगिस्तान के जहाज ’
सड़त हवें। सुरक्षा में लागल सिपाही चौबिसों घंटा कुक्कुर, कौआ, सियार हंकला में लागल हवें। थाना परिसर में रहे वाला पुलिसकर्मिन के बीवी-बच्चा भी अगुता गइल हवें। सबका मुंह से बस इहे निकरत बा- ‘कवन जरूरी रहे इ बला पलला के’। दरअसल बात इ रहे कि कुछ तस्कर नाम के समाजसेवी लोग राजस्थान से चार ट्रकन पर लाद के 62 रेगिस्तानी जहाज(ऊंट) पश्चिम बंगाल की कत्लखाना में शहीद करावे ले जात रहलें। यूपी की पश्चिम से प्रवेश कराके पूर्वी मुहाना तक पहुंचावते धरा गइलें। सवाल इ बा कि भरतपुर (राजस्थान) से घुसला की बाद कुशीनगर(यूपी)में अइला की राह में दर्जनों जिला(आगरा, फिरोजाबाद, इटावा, औरया, अंबेडकरनगर, कानपुर, उन्नाव, लखनऊ, बाराबंकी, फैजाबाद, बस्ती, संतकबीरनगर और गोरखपुर), सैकड़न पुलिस चौकी, बैरियर लांघत इ ऊंट अइसे ना आ गइल होइहन। गांव-देहात में एगो किस्सा कहल जाला- ‘ऊंट के चोरी, निहुरे-निहुरे?’ इ काम सीना ठोंक के, पैसा फेंक के भइल होई। पटहेरवा पुलिस कुछ ज्यादा कर्त्तव्यनिष्ठ निकल गइल। ईमानदारी में इ बेमारी बखरे पड़ि गइल। सेवा की बाद भी सात ऊंट सरग सिधार गइलें। पचपन ऊंट जवन बचल हवें, नरक भोगत हवें। देहिं सड़त बा, अंतड़ी जरत बा। कौआ नोचत हवें। ऊंट इहे सोचत हवें‘ कत्लखाना में त एके झटका में मुक्ति मिल गइल रहत, इहां तिल-तिल मरे के बा’। प्रशासन जागल बा। कोर्ट के आदेश आ गइल बा। जवन ऊंट बचल हवें उनके उनकी जन्मधरती (राजस्थान) में भेजला के उपक्रम जारी बा। देखल जा, कब ऊंटन के पटहेरवा थाना की नरक से मुक्ति मिली। ऊंट दुर्दशा पर एगो कविता-
 भूसावाली गाड़िन पर , बाज अस झपट्टा देखलीं,
 भरतपुर से कुशीनगर, ऊंट कइसे आ गइलें।
 यूपी की पश्चिम से गोरखपुर ले परमिट रहल?
 कुशीनगर पार करत , कइसे धरा गइलें। 
खेला बा अइसन खेलाड़िन की बखरा पड़ल,
 कोर्ट आ कचहरी की झंझट में अझुरइलें।
 रोवत हवें ऊंट, घूंट-घूंट करके मरला से,
साहब काहे बड़े , हमका बचवलें।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 11 जुलाई 13 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

जहां बसे तहं सुंदर देसू..

मनबोध मास्टर गांव के बीघा दु बीघा जमीन बेचकर गोरखपुर में डिसमिल दो डिसमिल जमीन का ले लिहलन बुझलें दिल्ली के चांदनी चौक खरीद लिहलीं। कर्जा-उआम लेके खलार में घर बनवा लिहलन। जब केहू हीत-नात पूछे की भइया गांव-जवार छोड़ दिहलù, गोरखपुर कइसन लागत बा? मास्टर गोसाई जी के चौपाई दोहरावत बस इहे कहें- जहां बसे तहं सुंदर देसू..। येही सुंदर देस में आषाढ़ में देवराज इन्द्र के कृपा गरगरा के बरसल। बुझाइल बादर फाट गइल। अबे नरही ताल के पेट ना भरल, रामगढ़ के जलकुंभी येहर-ओहर पानी की हिलकोरा से डोलत रहे कि कॉलोनी में बाढ़ आ गइल। सावन-भादो त बाकी बा अषढ़वे में दइब के कृपा लढ़ियन बरस गइल। बरखा आइल, गइल। जहां पानी ठाड़ गइल लोग के पानी बिगार के राखि दिहलसि। अब भगवान के दोष दिहल जाता, बहुत इफरात कृपा बरसा दिहलन। जलभराव के जायजा लेबे निकरल नेताजी अधिकारिन-कर्मचारिन पर बरस के जनता-जनार्दन के स्नेह बटोरला में लाग गइलें। अरे भाई!
सभासद तोहार। अध्यक्ष तोहार। ठेकेदार तोहार। लोग के काहे मूरख बनावत हवù। नगर की दुर्दशा पर एगो अधिकारी बेशर्मी भरल बयान हमरा हजम ना भइल, जब उ कहलसि- केहु नेवता देके बोलवले ना रहल की आके गड्ढा में घर बनवा ल। नेता की जनसेवा में भी अहंकार बा। उनकी सहानुभूति में भी विकार बा। उनकी घुड़की-धमकी में भी लाभ के लोभ बा। उनकर करनीध रनी सब सियासत के खेल बा। नगर के नाला की मुंहाने पर तोहार समर्थक जब हवेली खड़ा करत रहलें तू काहें ना रोकलù? कालोनाइजर्स लोग गड़ही-गड़हा, पोखरी-तालाब पाटि के कब्जा कर जमीन बेच के खरहरा लेके धन बटोरत रहलें त कुछ हिस्सा तोहरो इहां पहुंचत रहे। चुनाव में तोहार केतने चेला-चपाटी सभासद बन गइलें। विकास कार्य में कमीशन की मिशन में का तू सहभागी ना रहल। देवरिया जाये वाली सड़क पर येतना पानी चढ़ल की कार से हेलल मुश्किल हो गइल। बाह रे! बरखा के पानी। धनवान के मान के भी ख्याल ना रखलसि। बड़े-बड़े कॉलोनी में येतना पानी लागल की लोग की पैर के अंगुरी सरे लागल। गांव की डीह पर मड़ई डाल के रहे वाला लोग चैन से सुतत रहलें लेकिन शहर की पॉश कालोनी के लोग घर में समाइल पानी उदहला में रात-दिन गिन-गिन जगले बिता दिहलन। शहर की दुर्दशा पर एगो कविता -
 बगैर सोच के शहर में बसलें, मिटल ना मन के पीर।
 जलभराव दु:शासन होके, लगा उतारन चीर।।
 जे घिरल बा जे बूड़ल बा, रहल करम के ठोंक।
 नगर निगम आ नेता बुझै, झूठे रहल बा भौंक।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 4 जुलाई 13 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 27 जून 2013

देवलोक में शिवलीला

मनबोध मास्टर के गम, कम ना होत बा। धर्म के प्रति आस्था में उ हरदम इहे याद कइले रहलेंिशव ही सत्य है। सत्य ही शिव है। शिव ही सुंदर है। अचानक इ का हो गइल? देवलोक में शिवलीला। शिव जब भी लीला करेलन त विनाश ही होला। देवलोक में बादर फटल। धरती धंसल। बारिश आ बाढ़ में सब कुछ बहि गइल। तबाही की मंजर में लोग काल की गाल में समा गइलन। बहुत लोग लापता हो गइलन। क्षुधा मिटावे के अन्न मुहाल हो गइल। प्यास मिटावे के पानी के अकाल हो गइल। पेड़-पौधन के पतई चबा के जान बचावला की जद्दोजहद में लागल पुन्यात्मा भी परेशान हो गइलन। सांच कहल गइल बा- कुदरत की लाठी में बड़ी जान होले, उ बहुत लोग के जान एके साथ ले सकेले। कुदरत जब मारेले त बचला के गुंजाइश ना बचेला। कुदरत के कोप के कारण का बा? येह पर भी विचार के समय बा। दोष प्रकृति की ऊपर ठेल के अपने ना बचल जा सकेला। प्राकृतिक संसाधन जइसे जल, वन, खनिज के दोहन कइला में मनई ही लागल बा। नदी के बांध में बांधत मनई ना सोचले रहे गंगा माई कोपि जइहन। जब जल पल्रय आवत बा त सजो बुद्धि फेल हो जाता। ओही पल्रय में मनई के संपूर्ण प्रताप समाप्त हो जाता। रुपया-पैसा, धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, गोल-गिरोह कुछ भी काम ना आवत बा। उत्तराखंड त देवलोक रहल। पर्यटकन के लुभावे खातिर, ललचावे खातिर,बोलावे खातिर, भरमावे खातिर देवलोक में का ना भइल। पहाड़ कटाइल, विस्फोट से उड़ावल गइल। जेसीबी लगा के पहाड़ के पेट चिचोहल गइल। वन-उपवन उजाड़ल गइल। नदी के किनारा काटल गइल। शहर बसावल गइल। बाजार लगावल गइल। पुन्य करे वाला देवलोक सैर-सपाटा स्थल बन गइल। होटल, धर्मशाला, आश्रम बनल। का होता येह जगहन पर, कबो सोचल गइल। अधरम बढ़ल त देवलोक के देवता लोग कोप गइलन। बाबा बदरीनाथ, बाबा केदारनाथ सब कोप गइलन। शिव की कोप पर एगो शिवभक्त अपनी कविता में बस इहे गोहरावत रहे-
 माथवाली गंगा , नाथ काहें बदे छोड़ि दिहलीं, 
सुसुकि-सुसुकि रोवत, नर-नारी दरबार में। 
लगल रउरी गटई के शेष खिसिआय गइलें, 
लील गइलें सब कुछ, एकै फुफकार में।
 देवलोक करवट, का ले लिहलसि बोलीं नाथ
, पुन्यात्मा लोग गइल रहलें, रउरी जयकार में। 
फाटल जब बादर, कफन-चादर ना बदा भइल, 
शिवलोक में समाहित केतने, बदरी-केदार में।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के २७/६/१३ के अंक में प्रकाशित है .
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