गुरुवार, 27 मार्च 2014

राजनीति के धुआं-धुक्कुन धइले बा बहरबांसू..

मनबोध मास्टर का बहुत कोफ्त बा। लहर पर कहर बन के कलह गिरल बा। कलह के भी कारण होला। जब एगो अनार रही आ सौ जने बीमार रहिहन त इहे होई। कबो-कबो त लहर उठेला। सत्तहत्तर में उठल रहे। सैंतीस साल बाद फिर उठल बा। लहर त बा लेकिन चुनाव पहिले ही कलह भी कम नेइखे। सत्तहत्तर में अइसन कलह चुनाव पहिले ना रहे भले बहत्तर चोंप पर खड़ा तंबू चुनाव की कुछ दिन बाद भहराइल। इ लोकतंत्र के तकाजा ह। सेवा खातिर टिकट मांगल जाता। जीतते मेवा खाइल शुरू। चुनाव की पहिले जनसेवक आ जीतला की बाद लोकतंत्र के राजा। विरोध के बाजा अनासो ना बाजत बा। ‘नाथ जी’ कई जने के ‘बे-नाथ’ बनावला पर लागल हवें। नाराजी के दौर, नया-नया ठौर। उल्टी गंगा बहावल जाता। बनारस वाला के कानपुर में पटकल जाता। गाजीपुर वाला देवरिया उतारल जाता। डुमरियागंज में पल्टीमार पर तकरार। इलाहाबाद में केशरी त अयोध्या में कटियार कुपित। बस्ती ना मिलले वेदांती लाल-पीयर। लखनऊ से टंडन टकसा दिहल गइलन। जौनपुर में अनुराग के राग बदल गइल। आडवाणी, जोशी, जसवंत, सुषमा, चिन्मया, लालमुनी चौबे, सुभाष महारिया, महादीपक शाक्य, शाही, जनरल, जिप्पी, जयप्रताप..। लमहर फेहरिस्त बा। ‘ नाथ जी’ से बसा एगो सवाल- इ लोग पार्टी के वफादार स्तंभ ना ह? घर के जोगी जोगना आन गांव के सिद्ध। संघर्ष, सेवा, निष्ठा के महत्वहीन बना के पल्टीमारन पर विश्वास। एहीसे होता सत्यानाश। अन्जाम का होई? आगाज में अनुशासन तार-तार । अनुशासित कहाये वाली पार्टी में नाराज कार्यकत्र्ता अध्यक्ष जी के पुतला फूंकत हवें, मुर्दाबाद के नारा लगावत हवें। असली-नकली के द्वंद्व उठल बा। पार्टी के केतना फायदा पहुंची? जनसेवा, समाजसेवा आ राष्ट्रसेवा खातिर ही यदि नेतागिरी बा त स्वहित छोड़ के जनहित, पार्टीहित, समाजहित आ राष्ट्रहित की बारे में सोचल जा। राजनीति की धुआं-धुक्कुनधुंध में अपना-पराया के पहिचान मिट गइल बा। ‘नाथ जी’ की चलते ही ‘महराज जी’ के भी पुतला फुंकाइल, मुर्दाबाद के नारा लागल। इ कम क्षोभ के बात ना बा। समय रहते स्थिति ना सम्हरायी त निरादर आ अपमान की आग में बहुत नुकसान होई। बहुत लोग से पुछलीं- भइया! पार्टी के कवन रोग धइले बा? जवन जवाब मिलल, उ दु लाइन में- 
ओझा-सोखा, वैद्य-तांत्रिक, बात कहें सब धांसू। 
पार्टी के ‘पछेड़’ करत बा, धइले बा बहरबांसू।।
- मेरा यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 27 /3 /14 के अंक में प्रकाशित है।

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

बांटत टिकट, विकट विरोधा..

मनबोध मास्टर के सियासी फगुआ लगता बुढ़वा मंगल की बाद ले चली। नेतन के टिकट कटले पर अइसे बुझात बा जेइसे नटई कटा गइल। सेवा की मेवा से वंचित नेता टिकट कटते किटकिटा के दांत पीसत अपने पार्टी की अध्यक्ष के कच्चे चबा जाये वाला नजरिया से खूब पुतलादाह करावत हवें। हाल उ बा जइसे- ‘ बांटत टिकट, विकट विरोधा। अपने दल पर, करते क्रोधा।’ कुछ लोग अइसन समय पर पाला बदलल जइसे सरसई धरत आलू पर पाला, लहलहात सरसों पर लाही आ किकोरा पकड़त आम पर किकुरा। होली के खुमारी उतर गइल, चुनाव के चढ़ गइल। देवरिया में दु लोग की लड़ाई में तीसरा का लहि गइल। एक जने त चुप बाड़न लेकिन दुसरका जने अपनी लोगन से खूब खुराफात करावत हवें, अपने ही अध्यक्ष जी के पुतला फुंकवावत बाड़न। अध्यक्ष जी के मुर्दाबाद-मुर्दाबाद करावत हवें। सलेमपुर में समाजवादीपुत्र के भाजपाई टिकट पर सब खुश बा। चौदह साल में रामजी वन से लौटल रहलें, एइजा चौबीस साल में भाजपा लौटलि बा चुनाव लड़े। डुमरियागंज में जिनगी भर कांग्रेस के सेवा करे वाला पाल का मलाल रहे कि उनकी हैसियत की हिसाब से पार्टी में जगह ना मिलल। उनहुं की दिल में कमल खिलल। जबले टिकट नइखे कटत तबतक पार्टी से निष्ठा, आ टिकट कटते अपने दल बन जाता विष्ठा। इ कलमुंही राजनीति जवन ना करा दे। जवन महतारी अपनी पुत्तुर की विवाह के निमंत्रणपत्र छपवावे में भी देर करत हई, उहे पार्टी के घोषणापत्र थमा के गली-गली दौड़ावत हई। बेटा के सीएम, बहू के पीएम, भाई के मनिस्टर बनववला की बाद भी संतोष नइखे। कुनबा में केहू बेरोजगार ना रहे एकरा खातिर आजमगढ़ के जमीन जोत-हेंगा के रफारफ करे खातिर आवत हवें। आई, राउर स्वागत बा। समाजवाद के झंडा लहराईं, परिवारवाद के आगे बढ़ाई।

अब कुछ सियासी छंद - 
दिल्ली में दिल ना लगा, अब करेंगे काशीवास।
 खेल बिगाड़ने जो आये, हो उसका सत्यानाश।। 
दो-दो जगह से जो लड़े, जीत के छोड़े सीट। 
ऐसे जीव को क्या कहें, राजनीति के कीट।।

-- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 20 /3 /14  के अंक में प्रकाशित है।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

‘सूर्पनखा’ की नाक की चलते..

मनबोध मास्टर दुखी मन से कहलें- असों होली ना
मनाइब। मस्टराइन पूछली- काहें? उ कहलें- सूर्पनखा की नाक की चलते। बात सही बा। जहां-जहां गड़बड़ बा, बूझीं सूर्पनखा के नाक फंसल बा। हम्मन की प्रेम के, स्नेह के, आत्मीयता के, सहयोग के, सहानुभूति के, उपकार के, उदारता के, देशभक्ति के कवन सिला मिलल? सत्य के सूरज अस्त ना भइल बा, कुछ बादल की टुकड़ा की घेरले अंधकार ना हो जाई। जल्दी ही सब कुछ साफ हो जाई। जनता बुझति बा, समझति बा। इ प्रजातंत्र ह। सिस्टम में कुछ दोष आइल बा। व्यवस्था डंडीमार भइलि बा। धिक्कार बा अइसन अधिकार के जवना के नाहक प्रयोग कइल जाता।
प्रजातंत्र की पेड़ पर कोयल ना अब कौआ किलोल करत हवें। चारों ओर चमगादड़के बोल सुनात बा। न्याय आ अन्याय के अंतर बस एतने रहि गइल बा- ‘जेकर लाठी ओकर भैंस’। बेकारी, बेमारी, बेरोजगारी आ भुखमरी की बीच घनघोर महंगाई में आदमी जीयत बा। बेर-बेर, कई बेर उहे फाटल पेवल सीयत बा। केतना सुग्घर रहे आपन देश भारत। हिंदुस्तान कहल जाता लेकिन हिंदी आ स्वदेशी से परहेज कर के
अंगरेजी आ विदेशी से मोहब्बत करे वाला भी कम ना हवें। विदेशी के चेहरा गोर लउकत बा, हृदय में झांक के देखीं केतना काला बा। सूरत पर गइला के जरूरत ना बा। रामायण काल में भी सुंदरता की चलते बहुत भ्रमजाल फैलावल गइल। तब भी बहुत दिक्कत भइल, आज भी दिक्कत बा। बहरहाल! सूर्पनखा के नाक ना रहित त ‘रामजी’ के पुरुषार्थ के कथा रामायण बन के हम्मन के बीच कइसे आइत। रामचरित मानस लोग कइसे गाइत। सूर्पनखा के नाक ना रहित त राम-रावन युद्ध ना होइत आ
अंत में रावन ना मराइत। नककटैया के लीला, रामलीला में बहुत प्रसिद्ध भइल। आज फिर जरूरत बा नकटी के नाक काट के, नकेल डाल के, नथूना ठेंका दीं। काहें की सूर्पनखा सिंबल ह राक्षसी प्रवृति के। मनुष्यता के बचावे खातिर संकल्प करीं, उठा लीं हथियार आ काट दीं सूर्पनखा के नाक। ‘ ना रही बांस ना बाजीबंसुरी’। अब ये कविता के अर्थ निकालीं। अर्थ के अनर्थ जनि करब, नाहीं त सजो मेहनत व्यर्थ चलि जाई।
‘सूर्पनखा’ की नाक की चलते, ‘देशभक्त’ का मान नहीं।
 बिक गया ‘वो’ किसके हाथों, करता क्यूं सम्मान नहीं।। 
योगदान को भूल गया क्यूं, मद में ऐसा वर्ताव किया। 
अधिकार का दुरुपयोग कर, अतिवादी व्यवहार किया।।
-- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 13 /3 /14  के अंक में प्रकाशित है।

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अंग-अंग फड़कन लगे..



मनबोध मास्टर मगन हवें। दिन बहुर गइल। वोटर के दिन, सपोर्टर के दिन। सोलहवीं लोक सभा के महासमर के घोषणा हो गइल। जइसे नौ माह में बच्चा पैदा होलन वइसे नौ चक्र की मतदान की बाद नवकी सरकार पैदा होई। वोटर के बुझौवल बुझावल जाता। तुरुप के पत्ता केकरा लगे बा? भइया वोट की चोट से भ्रष्टाचार मिटावे के बा त प्रत्याशी के पूरा वायोडाटा पढ़ी। केकरा पर केतना मुकदमा? दलन की दलदल में जन फंसीं। महामुकावला में आरोप के गुब्बार उठी। चुनावी खुमार चढ़ी। सिद्धांत, ईमान, सेवा सजो सत्ता की कुरसी की पाया तरे दबावला के प्रयास होई। दिल मिली ना मिली हाथ मिलावत लोग मिली। चारो ओर जय जयकार की शोर से सराबोर लोकतंत्र के उत्सव मनावल जाई। वइसे जइसे होली के कबीर। विनम्रता के मुखौटा लगा के एक से बढ़कर एक बदतमीज अइहें, हम्मन के लुभइहें। पांच साल खातिर उनकर दिवाली हमार दिवाला। फेर महंगी के मार। हर बोल के मोल समझे के परी। बोल भी अनमोल मिली। एक से बढ़के एक झोल मिली। सबकर आपन-आपन ढोल रही। ओ ढोल में अंदर पोल रही ऊपर खोल रही। जवना जनता की बू से सफेदपोश परेशान रहलें उहे खुश-बू। हथजोड़ी के दौर, दंतनिपोरी के दौर। भइया अबकी बारी हमरी पर कृपा। वोटर निर्मल बाबा की राह पर निकर जइहें। सब पर कृपा बरसइहें। अबकी बेर वोट मशीन में एगो नवका बटन भी आ गइल- नाटो। राजनीति के खिलाड़ी आपन खेल बना सबकर खेल बिगाड़े के तैयारी में लाग गइलें। चोटी-लंगोटी वाला, दाढ़ी-टोपी वाला सबकी पर स्नेह के बरखा बरसावल जाई। मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत जी कार्यक्रम घोषित क दिहलें। 543 लोकसभा सीट खातिर बिगुल बजल बा। दल सजल बा। रउरो जागीं। अंग-अंग फड़काई। घर में जनि अलसाई। बूथ तक जाई आ अपनी पसंद के बटन दबाई। राउर इ बटन 16 मई के बता दी केकरा में बा केतना दम। राउर इ बटन दे दी संसद में चिल्लाये के अधिकार, आ नवकी सरकार। 
अब इ कविता- 
अंग-अंग फड़कन लगे, जब बजा चुनावी चंग। 
चढ़ल चुनाव बजल दुंदुभी, आपन-आपन ढ़ंग।। 
महासमर में उतर रहे, योद्धा लेय उमंग।
 मतदाता की मनमंदिर में,उठ रहल बा बहुत तरंग।।

- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 06/3 /14  के अंक में प्रकाशित है।

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