गुरुवार, 28 जून 2012

तीन ‘एम’ ना, तीसों एम बा ..

‘मुल्ला’ नमाज अता करे मस्जिद खातिर चलल रहलें कि बीच राह में रीता बहुगुणा की भाषण में अझुरा गइलें। उ बोलत रहली, शहर के समस्या खोलत रहली। बोलली- गोरखपुर में ‘तीन एम’ से परेशानी बा। एक एम से मच्छर, दूसर से माफिया। तीसर की बेर मैडम के स्वर मंद हो गइल। कहली रउरे सब तीसरका एम के अर्थ लगा लेइब। मुल्ला के माइंड एम पर मरडाये लागल। शहर ही ना पूरा पूर्वाचल के बड़वर समस्या बा मस्तिष्क ज्वर। येह ‘एम’ पर कवनो र्चचा ना भइल। गांव-देहात में एगो कहावत कहल जाला- मालगाड़ी, मकुना, मेहर, महंत, येह चारो के मिले ना अंत। इ सब ‘एम’ से ही शुरू होला। मालगाड़ी खुल जाई त अगर लाइनक्लियर मिले त बड़-बड़ जक्शन ले ना रूकी। आ खड़िहा जाई त केतना घंटा तीन नंबर में लगल रही, केहू माई-बाप ना मिली। मकुना हाथी बिगड़ जाई त केहु की बश में ना आई। मेहर मतलब मेहरारू अगर खिशिया गइल त मरदे के पानी आ जवानी बिगाड़ के राखि दी। महंत के अंत भला मूढ़ लोग कहां पाई। अगर कवनो शाकाहारी मनई से पूछींतो हरा कवन समस्या बा? उ बोली- मुर्गा, मछरी, मांस, मदिरा से परेशानी बा। इहो त ‘एम’ से ही शुरू होला। बहरहाल, मुल्ला के माइंड फिर घूमल। एमपी, एमएलए,मेयर इहो तीनो त ‘एम’से ही शुरू होला। अबहिन तीनों लोग एक ही राग में रहल। नगर के केतना विकास भइल? अब तीनों के राहि जुदा-जुदा हो गइल बा। मतदाता सूची भी परेशानी के जड़ बा। विधायकी में कुछ और मेयरी में कुछ और। चुनाव प्रचार में एक जने मेयर प्रत्याशी कहली- निर्वतमान मेयर साहिबा के कुत्ता बहुत कटहा रहे। कटहा कुक्कुर की चलते लोग आपन समस्या लेके ना जात रहलें। जनता बोल उठल- कुक्कुर त रउरो पोसले हई। उ कहली- हमार कु्क्कुर कटहा ना ह, चटहा ह। मुल्ला कहलें-काटे चाटे स्वान के दुनों भांति बिपरित। एम वाला मानसून मेहराइल बा, लोग एहू से परेशान बा। हिंदूवादी नेता लोग मदरसा से परेशान हवें। कहत हवें, आतंवादिन के ट्रेनिंग सेंटर हो गइल बा। मुसलिमवादी नेता बोलत हवें- मंदिरवाला लोग भावना भड़कावत बा। भया मुल्ला की माइंड में बहुते ‘ एम’ बा जवना से परेशानी बा। लेकिन मेयर की चुनाव में एतना जागरुकता की बादो मतदान के प्रतिशत ना बढ़ल इहो एगो परेशानी बा। रहल बात रीता बहुगुणा के त उनका येह शहर के तासीर ना बुझाई। तीन ‘एम’ की जगह अपनी कांग्रेस के कथनी आ करनी निहारीं। विधायकी की चुनाव में येह शहर के लोग रउरी क्षमता के बता देले रहे। मेयरी में सात के खुलाशा हो जाई। ‘ एम’ ही जिंदाबाद रही।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 28 जून  2012 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 21 जून 2012

दादा, दीदी आ नेताजी

मौसम करवट बदल दिहलसि। नेताजी रंग बदल दिहलन। गिरगिट शरमाए लागल। मेघुचा टर्राए लागल। देश में राष्ट्रपति चुनाव के र्चचा चालू बा। दादा वाला लोग अगराइल बा। दादा खातिर कुरसी नियराइल बा। दीदी नधियाइल हई। नेताजी चरखा पढ़ा दिहलें। मिसाइल मैन मना क लिहले। राजग के बेचैनी बढ़ गइल। मानसून के बदरी ओरिआनी तर आके अटकल बा। राजग के साझ वाली सुई सेंघरा पर टंगाइल बा। सियासी दांव-पेंच से बेखबर मनई महंगाई की मार से दुबकल बा। ओकरा का, प्रणब दादा होंखे चाहे कलाम काका। कवनो फरक ना पड़े वाला बा। नेताजी के चाम कù जीभ लाम चलि गइल। पहिले बंगाल शेरनी ममता दीदी की साथे रहलें। दुनो मिलके संप्रग के योजना पर पानी फेरला पर लागल रहलें। राजग के लोग सोचले कि अबकी संप्रग के पानी-पानी क दिहल जाई, लेकिन अब अपने पानी बचावल मुश्किल हो गइल बा। नाक बचावला में नाक पोंछा गइल। कलाम काका भी स्थिति देख के मुकर गइले। दस जनपथ में जवन सियासी खिचड़ी पाकत रहे ममता दीदी का पता ना रहे। दु वर्ष बाद लोकसभा के चुनाव होखे वाला बा। लोग के रुझान राजग की ओर बढ़त रहल ह, लेकिन अब राजग के मुश्किल देख के लगत बा भाजपा मुसीबत में बा। राष्ट्रपति की चुनाव में संप्रग के विरोध करे खातिर एक अदद प्रत्याशी के भी इंतजाम ना क पावति बा। संगमा त मंगनी के टिकुली हवें, उनकी भरोसे कवले लिलार चमकी। राजग के एगो टंगरी कहाए वाला शिवसेना त प्रणब दादा की साथे ही खड़ा हो गइल। राजग के राजनीति बालू की भीति अइसन भरभरात बा। अब त लगत बा कि सशक्त विपक्ष के भूमिका निभावला में भी उ अक्षम हो गइल बा। संप्रग प्रणब दादा के निष्कलंक बतावति बा, लेकिन लोग जानत बा कि 2007 में चावल निर्यात की मामला में उनकी पर आरोप लगल रहे। पश्चिम अफ्रिका के एगो देश घाना ओह समय प्रणब दादा की खिलाफ जांच के सिफारिश कइले रहे। घाना के आरोप अपना महान भारत में अवते मुट्ठी भर चना अइसन हो गइल। देश की राजनीतिक हालात पर चार लाइन के कविता देखीं केतना सधत बा-
 ‘दादा’ की हाथे में देश के लगाम!
 ‘दीदी’ दहाड़ पर भी लागी विराम।।
 ‘नेताजी’ अइसन बदल दिहलन रंग।
 देख के ‘गिरगिटवा’ भी रहि गइल दंग।।
 चलल ना राजग के साझ वाली नीति।
 भहराइल जेइसे हो बालू के भीति।।
 मारि लिहलसि बाजी,बजावे लोग गाल।।
सफल ‘इटालियन’ के सियासी चाल।
- नर्वदेश्वर  पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 21 जून 2012 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 14 जून 2012

सेनुर, बिंदी आ चूड़ीबिहीन, साड़ी की आड़ में मर्द लड़ेंले

बाति कहब फरिछा, केहू का मीठ लागी केहू का मरिचा। हम जानत हई कि बाति बा निरकेवल, केहु के भतार रुठिहें केहू के देवर। नगर निकाय की चुनाव में जवन देखत हई उहे बकत हई। आरक्षन की तहत सीट भले मेहरारून खातिर रिजरब बा, असली लड़ाई त मरदे लोग लड़त हवें। मादा की सीट पर मर्द लोग माद्दा देखावत हवें। हाथ जोड़ले, दांत निपोरले सांझ -सबेरे धावत येह आरक्षन घोटू प्रतिनिधि के देख के इहे कहल जा सकेला कि मेहरारून की हक पर डाका डालेवाला हवें। जवन मेहरारू आपन हक लुटावत हई उ अपनी पद के गरिमा कहां ले बचा पइहन। संविधान की अनुच्छेद 14 से लगायत 18 तक नर-नारी के समानता के अधिकार दिहल गइल। संविधान की तिहत्तरवा आ चौहत्तरवा संशोधन अधिनियम 1993 में सरकार मेहरारू लोग के आरक्षन देके पंचायत आ नगर निकाय की महत्वपूर्ण पद पर पहुंचे के रास्ता सरल बना दिहलसि। पहिले 33 प्रतिशत आरक्षन दियाइल। बाद में आरक्षन के प्रतिशत 50 हो गइल। महिला सशक्तिकरन पर लंबा चौड़ा भाषन लोग भले झारि दे, लेकिन महिला आरक्षन के लाभ पति, पुत्र, ससुर, देवर, भतीजा अइसन रिस्तेदार ही उठावत हवें। दरअसल मेहरारू आ चना के हाल एक जेइसन बा। जेइसे मनई चभक के चना के मुंह में डार लेंले। चना हरिअर होखे चाहे पाकल। खेत में होखे चाहे खरिहान में। कच्चा होखे चाहे भुनल। कहल जाला कि भगवान की दरबार में न्याय मांगे गइल चना पर भगवान जी के भी लार चुये लागल। ठीक उहे हाल महिला लोग के बा। सीट सभासद के होखे चाहे अध्यक्ष के। फुफुती की आड़ से रिस्तेदार लोग ही लड़त बा। नाम मादा के आ मलाई नर लोग चाभत बा। छोटकी पंचाइत में मेहरारू लोग के कोटा मरद लोग पूरा कù देत बा। बड़की पंचाइत में इ सब संभव ना बा । येही से रजनेतिहा लोग लोकसभा, राज्यसभा आ विधानसभा में महिला आरक्षन ना दिहल चाहत हवें। महिला आरक्षन तबे सार्थक होई जब मेहरारू लोग में संपूर्ण नारीत्व जागी। लोहिया जी कहले रहलें- ‘शक्ति’ मौका अइला पर प्रकट होले। अब मौका त आइल बा। शक्ति के शोषण करे वाला पुरुषवादी प्रभुत्व से बची तब न आपन शक्ति देखाई। एगो कविता देखल जा, केतना सधत बा आजकल की चुनाव पर- लाज न बा तनिको उनका, मेहरारू कù सीट आ मरद मरेंले।
 आंखि पसारि के देखीं तनी, चारो ही ओर अनेति करेंले।। 
सरकार इ काहे आरक्षन देति, नाम बा मादा के नर ही दिखेंले।
 सेनुर, बिंदी आ चूड़ीबिहीन, साड़ी की आड़ में मरद लड़ेंले।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 14 जून 2012 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 7 जून 2012

कहीं खाये के रोटी ना कहीं 35 लाख के शौचालय

आपन देश गजब ह। कहीं लोग के खाये के रोटी ना मिलेला त कहीं लोग 35 लाख की शौचालय में हल्लुक होलें। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया कार्यालय में बैठ के प्रति व्यक्ति आय 28 रुपया निर्धारित कù के गरीब मनई के गरीबी रेखा से उपर उठा दिहलें त ओतना कष्ट ना भइल जेतना अधिकारियन की इस्तेमाल खातिर तीन गो बाथरूम बनववलें जवना के कीमत लगभग 1 करोड़ 05 लाख रुपये बा। मतलब एगो शौचालय पर 35 लाख खर्च। अट्ठाइस रुपया रोज कमाये वाला मनई आटा, दाल, चावल की जोगाड़ में ही रह जाई। ओकरा शौचालय के जरुरत कवन बा। उ त इ हे कहीं - ‘मुंदहु आंख कते कुछ नाहीं.’। झाड़ के आड़ मिली त मिली ना मिली त कहीं मुड़ी निहुरा के हलुक हो जइहन। गांवन में स्वच्छता अभियान की नाम पर शौचालय की निर्माण खातिर एपीएल कार्डधारक के 1100 और बीपीएल कार्डधारक के 1400 रुपया सरकार देले। अब सवाल इ बा की येह महंगी में एतनी पइसा में शौचालय कइसे बनी। अगर बनि भी गइल त केइसन रही। हद के बेहयागिरी तब देखे के मिलल जब योजना आयोग कहलसि की इ सामान्य रखरखाव के प्रक्रिया रहल। ऐके फिजुल खर्ची कहल दुर्भाग्यपूर्ण बा। बाति सही बा। अहलूवालिया साहेब की विदेश यात्रा पर रोज दु लाख से ऊपर रुपया खर्च भइल। अइसन लोग खातिर 35 लाख के शौचालय कवन बड़वर बाति बा। अब मनबोध मास्टर येह मुद्दा के लेके कई लोगन से बाति कइलन कि अगर रउरा के 35 लाख के शौचालय मिल जाय त का करब? एक जने कहलें हम ओकर प्रयोग शौच खातिर करबे ना करब। अइसन बाथरूम में ढुकते शौच सुटक जाई। सरकार में बइठल योजनाकार लोग गरीबी नापे वाला पैमाना तोड़ के फेंक देव। पंच सितारा - सत सितारा सुविधा से लैस कमरा में बइठ के देश के गरीबी के पैमाना ना बनावल जा सकेला। जेकरी पांव ना फटल बेवाई, उ का जानी पीर पराई। देश में भुखमरी आ गरीबी के हालत बिकराल बा। पिछला छह दशक से देश से गरीबी मिटावल जाता, लेकिन वाह रे गरीबी, मिटे के नामे ना लेत बा। अहलूवालिया साहब ! रउरी अइसन लोग 35 लाख ना 35 करोड़ की बाथरूम में पाखाना करी, काहें कि रउरा नियंता हई। गरीबन के भाग्य विधाता हई। लेकिन हमरो दु लाइन सुन लीं-
भुखमरी से मौत रोक दीं, रोक दीं सजो बेमारी।
 रउरी हाथे सब कुछ बाटे, रउरा बड़वर अधिकारी।। 
जेकरा घरे जरे ना चूल्हा, ओकरो बदे कुछ कर दीं।
 ना कुछ कर पाई यदि रउरा,कूड़ापात्र में रिपोटिया धरि दीं।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रिय सहारा के 7 जून 2012 के अंक में प्रकाशित है .
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