गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

कान खोल के सुनिलù साधो, कहते दास कबीर. ना लहै तù तुक्का समझौ, लहि गयो तù तीर

यूपी में महाभारत 2012 चालू हो गइल बा। सजो सेना सजि गइल हई। आरोप-प्रत्यारोप के दौर शुरू बा। एही बीच में कबीर बाबा की दरबार में कुछ प्रत्याशी-ओरतासी पहुंचलें। कहलें बाबा! हमरा पक्ष में कुछ कवित्तई लिख दीं। बाबा बोललें- कान खोल के सुनिलù साधो, कहते दास कबीर। ना लहै तù तुक्का समझौ, लहि गयो तù तीर।। कबीर बाबा के इ कवित्तई देखीं कवना सेना पर केतना सधत बा।
सेना नंबर एक-        अफसरन से चोरी करववलू, कमीशनखोरी खूब मचवलू। 
                                  अब तù गद्दी छोड़ मैडम, रोंआं-रोंआं बड़ा दुखवलू।।
                                     अफसर चोर, मंत्री दलाल, खूब तू भइलू मालोमाल।
                                   दुहि के सबके कइलू ठठरा, अब भ्रष्टाचार के नाम हलाल।।
सेना नंबर दो-       जेकरा याद गुंडई आई, उनकी पर ना मोहर लगाई।
                         उनकर भाई भतीजा बेटवा, आखिर कबले एकछ खाई।। 
                      उनकी छाती चढ़ि हम हुंमचवलीं, उनके रसातल में पहुंचवलीं।
                      पनके देइब सभै नहि अबकी, माठा डालि के हमीं सुखवलीं।।
  सेना नंबर तीन-                     हमरा त पता ना रहे, अइसन भी युग आई। 
                                            जन्म हमार भइल बा कहंवा? न्यायालय बतलाई।।
                                           हमरी नावे पार उतरलें, कटलें खूब मलाई। 
                                         कुरसी पवलें हमें भुलक्ष्लें,अब जनता उन्हें भुलाई।।
  सेना नंबर चार-         जागù जागù बबुआ, जागù हो किसान। 
                                 यूपी के बदल द अबकी, शुरू करù अभियान।। 
                                 जाति-पाति से उपर उठù, मति अचिकौ कुम्हिलाय।
                                 सबके न्याय सुरक्षा मिली, इ जुमला दोहराव।।
सेना नंबर पांच-                        छोट दल मति बुझù, बड़ बा बड़ा इरादा।
                                               कठफोड़वा की चोंच मरले, जाला निकल बुरादा।।
                                                   छोटे-छोटे नथिया से पड़ेला नकेल।
                                                     दाव चढ़ि जइबù, देइ छोटके ढकेल।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह  भोजपुरी व्यंग्य  राष्ट्रीय सहारा के २८ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

चलù चलीं जां नदी किनारे घाट बइठ के गिने लाश..



जिस्म कांपे, हाड़ कांपे, रुह में भी कपकपी।
सौ-सवा सौ रोज मरते, केकर-केकर नाम जपीं।।
भीड़ से अचिका सा हटिके, इहो तमाशा देखिं लीं।
बंट रहल कंबल बा कइसे, गहरा कुहासा देखिं लीं।। 
गील बोटा उठे धुआं, तापीं अलाव ना हो निराश।
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
ठंड से मुअत मनई अखबारवाला छापत हवें।
सरकारी महकमा के देखीं, टंपरेचर बस नापत हवें।।
उनकी फाइल में ना जाने, मृतकन के नाम कहवां गइल। 
माघ जे ना निबुकी, जमराज की उहवां गइल।। 
साहब कहें कि लाश के चिरवा के कराùव एहसास। 
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
ठंड मारत जान बाटे, गरीबन की घर में घुसिके।
सरकार सुतल आंखि पट्टी, कान रुई ठूंसिके।।
कुछ बहुरुपिया जनसेवा के स्वांग रचा मुसकात हवें।
बांटत हवें सरकारी सेवा, याकि सीधे खात हवें।।
कब मिटी इ धुंध घेरलसि, बा जवन विरोधाभास।
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
मार कोहरा के परत , जनजीवन सब ठप्प बा।
रेल बस वायुयान लेट, का इहे बतिया गप्प बा।
सर्दी के सितम से केतनन के डोंटी ढील बा। 
जोड़न में दर्द अंकड़न बा, जइसे धंसल कोई कील बा।। 
दांत बाजत कड़कड़ात कइसे बीती इ पूस मास। 
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
बहुतन के धइलसि झुनझुनी, केतनन के अंग सुन्न बा।
माथा पिरात कस के बा, बेहोश बा कि टुन्न बा।।
भीड़ अस्पताल में बा, समस्या बड़ी विकराल बा।
सर्दी शीतलहर कहीं कि साक्षात इ त काल बा।।
हम गिन-गिन छापीं ठंड मरन, उ कहलें इ बकवास।
चलù चलीं जां नदी किनारे, घाट बइठ के गिने लाश।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती की यह व्यंग्य रचना राष्ट्रीय सहारा के २२ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

जेतने कपड़ा ओतने जाड़, जाड़ की मारे कांपे हाड़


हाड़ कंपा देत जाड़ में किकुरल कांपत- मनई के जिनगी खाड़ हो गइल बा। जाड़ के लेके बहुत कहावत कहल गइल। जइसे- ’लइकन के हम छुअब नाहीं, जवनका लगे जेठ भाई। बुढ़ऊ के हम छोड़ब नाहीं, चाहें केतनो ओढ़िहै रजाई‘। जाड़ से कांपत लोग भगवान के कइसे गोहरावेलन, एहु पर कहावत कहल गइल-’दई दई घाम करù, सुगवा सलाम करे, तोहरे बलकवा के जड़वत बा। पुअरा फूंकि-फूंकि तापत बा‘। जाड़ से बचे के उपाय भी पुरनिया लोग बतावल- रूई,धुईं या दुई। रूई के जे बहुत हल्लुक बुझत होखे उ मुगलता में ना रहो, रूई एतना भारी ह कि जाड़ के बाड़ के रूप में काम करेले। रूई के आशय गरम कपड़ा से भी बा। धुईं के मतलब अलाव, साधु-महात्मा के धुईं। आ दुई के मतलब त रउरा सभे बुझते होखब। जीवन की गाड़ी के दु पहिया- एगो मरद त दुसरका मेहरारू। मेहनतकश इंसान का कइसन ठंड। गांव-देहात में पटवन चलत बा। जाड़ से भले लोग के हाड़ कांपत होखे लेकिन जे खेते में हत्था लेके उतर गइल ओकरा केइसन जाड़। दस हत्था की बाद त पसीना निकल जाता। बिजली के दशा बाउरे बा। डीजल की मंहगी से किसानन के गरमी छिटक जाता। ऐही बीचे अगर केहु के पंपसेट ठंडाइल त अउर गरमी बढ़ जाई। जे गाय-भैस पलले बा ओकर गोबर- पानी करे में जाड़ देखल जाई त दूध की बेरा उ लात देखा दी। रोज कमा रोज खा वाला मनई की जिनगी में कइसन जाड़? कमाई तबे ना खाई। जेके जाड़ सताई उ त इहे दुहराई-’ना सौ बाघ ना एक माघ‘। जेकरा मेहनत मजूरी से पेट भरे के बा उ कही- ’आधा माघे कंबल कांधे‘। जाड़ा से लइकन के बचावे खातिर जिला के साहब फरमान सुनवलें कि स्कूल साढ़े नौ बजे खोलल जाव। सरकारी स्कूल में त साहब के फरमान लागू हो जाई लेकिन प्राइवेट वालन के हाल त गजबै बा। साते बजे घंटी बाजत बा। लइकन के तैयार करावल में महतारी लोग का आ स्कूल पहुंचवला में बाबुजी लोग का एह ठंड में परेशानी उठावे के परत बा। ओइसे भी जेकर लइका कान्वेंट में पढ़ी ओकर ठंड कमे लागी। पीठ पर एतना भारी बस्ता रही कि दनाइल रही। गार्जियन भी गरमाइल रहिहन कभी ड्रेस के लेके त कबो फीस के लेके। जाड़ा से कई जने के नाड़ा उकसि गइल बा। बुढ-पुरनिया पर एकर गहगर मार गिरत बा। कई जने असमये सरग सिधारत हवें। प्रशासन के घोषणा बा कि ठंड से केहु के ना मरे दिहल जाई लेकिन जवन खबर आवत हई ओहमा रोज ठंड से इतना मरे..। एही मुआवे वाली ठंड पर इ कविता-
जेतने कपड़ा ओतने जाड़। जाड़ की मारे कांपे हाड़।।
किकुरल कांपत जिनगी खाड़। सजो व्यवस्था चूल्हा भाड़।।
तपता मनई ढीला नाड़। फूंकत पुअरा उजरत बाड़।।
अइसन ठंड करेजा फाड़। मरि गये बुढ़ऊ घोठ उजाड़।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के १५ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

सपा काला दिवस को भूली , शौर्य दिवस भाजपाई ....



मनबोध मास्टर भिनही-भिनही फटाफट अखबार के पन्ना पलटत रहलें। कहीं कुछऊ ना लउकल। ताजिया दफन आ बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस , कपिल के कूटिनीतक बयान आ कुछ अवर छोट-बड़ खबर। सात दिसंबर की अखबार में सन 93 से पिछला साल ले कहीं शौर्य दिवस त कहीं काला दिवस के खबर। येही खबरन से लोकल छपसुअन के फोटू-ओटू लउक जात रहे। असों सात दिसंबर के अस करेड़ कुहासा पड़ल की इ दुनो के समर्थक भी किकुरले रहि गइलें। लगल कि दुनो की दुकानदारी मंदी की मार से घाही हो गइल बा। होखहु के चाहीं, आखिरकार कहिया ले धरम-करम की नाम पर नफरत बोअल जाई। दरअसल जेकरा पक्ष में काला दिवस मनावल जात रहे उ सजो लोग असों मोहर्रम के मातम मनावला में लागल रहे, आ शौर्य दिवस वालन के चेहरा लोग पहिचाने लिहल। झगराहे घर सही रामजी आराम से ओहमा विराजमान रहलें। इ बहादुर लोग अइसन शौर्य देखावल की सब ढहा दिहल आ अब रामजी प्लास्टिक की नीचे शीत- घाम-बरसात सहत हवें। बिना मतलब जरला पर नमक कबले छिरकाई। मास्टर के ’पर-वचन‘ सुनते मस्टराइन कउड़ा की लहास अइसन धधक गइलीं। बोलली िबहाने से राजनीति की चर्चा में दुपहरिया हो गइल, ना खइहें ना खाये दिहें। मास्टर कहलें - हम कहां तोहका रोकलें हईं, झुठों न सती होत हऊ। खा खींच के। के ना खात बा। बहुत जाने का खइला से देहिं पर चर्बी चढ़ जाता त खात-खात रोगी बनि के दवाई खात हवें। अफसर-मंत्री रिश्वत खात हवें। जब फंसत हवें त जेल के हवा खात हवें। ठेकेदार-इंजीनियर कमीशन खात हवें। संत-महंत, पंडा- पुजारी धरम की नाम पर मंदिर के चढ़ावा आ ठाकुर जी पर चढ़ावल प्रसाद खात हवें। सूदखोर व्यापारी व्याज खात हवें। कोटेदार-प्रधान-प्रधानाध्यापक मिल के लइकन के मिडडेमील खात हवें। छेड़खानी करे वाला छछुनर चौराहा पर चप्पल खात हवें। बेइमान कोर्ट-कचहरी में कसम खात हवें। बेरोजगार लोग नौकरी खातिर आ यात्री लोग रेल-बस में यात्रा खातिर धक्का खात हवें। कुर्सी की चाह में युवराज, नेताजी के पुत्तर आ स्वाभिमानी जी गांव गली चौराहा पर रथ से चक्कर खात हवें। वोटर नोट खात हवे आ नेता वोट खात हवें। येही व्यवस्था में सब चलत बा। खइला-खियावला के बात छोड़ù आज की दशा पर हमार कविता सुनù-
मन मैला उजला बसन, भासन लच्छेदार। 
शौर्य दिवस काला दिवस, दोऊ को धिक्कार।। 
प्रजातंत्र के पेड़ पर , यह गिद्धों का बोल।
मरे-कटे जनता भले, ये तो करें किलोल।। 
अबकी बारी छह दिसंबर, क्यों भूल गये है भाई।
    सपा काला दिवस को भूली , शौर्य दिवस भाजपाई .... 11
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ८ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

जस लखनऊवा ‘मैडम’ बोलें तस दिल्ली क ‘बाबू’

अरे भइया जी! इ पब्लिक ह, सब जानेले, लेकिन चुप्प मारि के बइठल रहेले। जब जनावे के समय आवेला त खंड-खंड में बंटि जाले। जब पब्लिक के सब्र के बांध टूटेला त कनपट्टी ले पहुंच जाला। एकै चांटा में देश-विदेश गूंज जाला। जेकरा पर गिरेला ओकर कान सुन्न हो जाला, लगेला भूकंप आ गइल। ‘रियेक्ट’ पैमाना पर खाली पंजा के निशान लउकेला। लोग गावेला- अइसन मरलसि चांटा , गलवा लाल हो गइल। महंगी के चलते इ बवाल हो गइल.। दिल्ली क ‘बाबू’ पडरोैना में नवहन के जगावत रहलें। प्रदेश के तकदीर बदले खातिर नवहन के उकसावत रहलें। इलाहाबादी पढ़वइया‘ हम भिखमंगा नहीं, शर्म करो.’ के नारा लगावत डी एरिया में वइसे पर्चा फेंकलें जइसे एसेंबली में भगत सिंह बम फेंक देले होखें। बाबू की पार्टी-पउवा वाला और कुछ वर्दीधारी वीर नवहन के चिउरा अस कूटि मरलें। सांच सहलो खातिर बड़वर करेजा चाहीं। एक पखवारा ले रजनीतिहा लोग पूर्वांचल के खूब धंगारल ह। केहू स्वाभिमान जगावल ह, त केहू क्रांति मचावल ह। केहू का जन सरोकार से कवनो मतलब ना बा। सब कर लक्ष्य सिंहासन बा। दिल्ली बाला बाबू गरीब की घर रोटी खात हवें। अरे भइया जी! द्वारिकाधीश ना हवें कि सुदामा जी के दू मुट्ठी चाउर चबा के दु लोक के राज थमा दीहें। इ राजनीतिक नौटंकी ह। रहल बात गरीबी मेटावे के, त इ नारा त बाबू के पुरखा-पुरनिया भी देते रहि गइलें। उ सब सरगे गइलें, हम्मन नरक भोगत हई। बाबू के पिताश्री, दादी श्री, दादी के पिता श्री(मतलब बुढऊ नाना श्री) की जमाना में भी गरीबी हटाओ के नारा खूब चलल। गरीबी ना मिटल, गरीब लोग के नाड़ा ढील हो गइल। अब बाबू कहत हवें-‘लखनऊवा हाथी पैसा खा रहा है’। अरे भइया जी! जेकरा पचावे के पावर रही उ न खाई। रहल बाति हाथी के त रउरा जानते हई हाथी के पेट जब्बर होला। पब्लिक का दू जून के रोटी-नमक आ रात के चैन के नींद चांहीं। सुने में आइल कि बाबू के सपना में भी हाथी डरावत बा। इ हम ना, लखनऊवा मैडम कहत हई। बाबू चिहुंकी- चिहाई जनि, कुछ ‘उपरवार’ देखवा लीं। अइसन गंजबांक लगाई कि हाथी होंयùùùù.. कहि के बइठ जा। दिल्ली क बाबू आ लखनऊवा मैडम की पोलिटिकल ‘रड़हो-पुतहो’ पर इ कवित्तई बहुत सधत बा-
बोली पर संयम नहीं, नहीं जुबां पर काबू। 
जस लखनऊवा मैडम बोलें, तस दिल्ली क बाबू।।
अपने-अपने ढंग से, गरीबी रहे मिटाय।
सत्ता सुख आ सिंहासन , खातिर ही चिच्ंिायाय।।
बाबू ,उनकर बपसी, दादी, अउरी बुढ़ऊ नाना।
खूब मेटवलें गरीबी के, बीतल कई जमाना।।
चार पीढ़ी आ चार दशक, कइले सत्ता भोग।
लखनऊवा मैडम करें, पोलिटिक्स क योग।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ०१ दिसंबर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

अइसन चलल सियासी छूरी, यूपी बांटे के मंजूरी...

आषाढ़ बरिसते धरती में लुकाइल मेघा घें-घां.ù कइल शुरू कù देलें। राजनीतिक मानसून 12 में आवे वाला बा, लेकिन 11 में ही लखनऊ-दिल्ली की एसी दरबा से नेता बहरिया के घें-घां कइल शुरू कù दिहलें। ‘महरानी जी’ बाभन-बिसुन लोग के नेवता देके ‘भाईचारा राग’ अलापे लगली। आई सभे-आई सभे, फेरु से शंख बजाई सभे ,हाथी के तिलक लगाई सभे। बाभन-बिसुन लोग के मान-सम्मान हमहीं न रखले बानी। इ बात सुनते मनबोध बाबा भड़क गइलें, कहलें- हे महरानी! तोहरा राज में सजो लाभ सतीश मिसिर, अंटू मिसिर, नकुल दुबे, रामवीर उपधिया, बृजेश पाठक के ही मिलल बा। हमरा त दहियो-चिउरा दुलुम बा। हम्मन की चक्कर में जनि पड़ीं, सामने देखीं। देखत ना हई, एक जने ‘राष्टवादी’ नेता स्व-अभिमान यात्रा निकारि के हम्मन के जगावत हवें। अइसने लोग की जगावला पर चोटी खोल, लंगोटी बांध के उनकी पार्टी के समर्थन दियाइल रहे ‘रामजी की नाम पर’। रामजी अजुओ प्लास्टिक की पन्नी तरे गुजर करत हवें। एगो दुसर पार्टी के नेताजी के ‘पुत्तुर’ क्रांति रथे से यूपी के मथे लगलें। नेताजी के राज-काज त ठीके रहे, लेकिन जबसे समाजवाद परिवारवाद में समाइल बा, आ अपने सरकार में ‘हल्लाबोल टाइप’ के कार्यक्रम होखे लागल, सत्ता में रहला पर ‘भाईजी लोग’ की लाठी में अंगारी बरसे लागल तबसे मन उचट गइल। रहल-सहल काम त पीस पार्टी वाला ठीक करत हवें। एगो ‘राजकुमार’ भी इडली-डोसा त्याग के झुग्गी-झोपड़ी में सुखल रोटी कूंचत-घोंटत घूमे लगलें। उनकर नौटंकी अलगे बा। इलाहाबाद की झूंसी में ‘बहक-बहक’ के बोल दिहलें- यूपी के नौजवान लोग कबले महाराष्ट्र में भीख मंगिहे, कबले पंजाब में मजूरी करिहन..। अब राजकुमार जी के कइसे समझावल जा, की महाराष्ट्र में धंधा कइल भिखमंगई ना ह। पंजाब में मजूरी कù के भी हम्मन संतुष्ट हई। मनबोध बाबा के बाति सुनते महरानी जी के माथा घुमल। तीन-तीन गो विपक्षी तैयार हवें, कहीं सिंहासनवा ना झटक लें। सिपहसलारन की राय से एक तीर से कई निशाना लगावते महरानी यूपी के ‘खा’गइली। चार टुकड़ा.. अवध, बुंदेलखंड, पश्चिम प्रदेश आ पूर्वाचल में बांटे के मंजूरी दे दिहली। सजो नेता लोग येह बंटवारा बयान पर ‘कच्चाइन’ करे लागल। यूपी के बदहाल व्यवस्था, भ्रष्टाचार में घेराइल मंत्री-मनिस्टर से लोग के ध्यान हट के पूर्वाचल पर अटक गइल। कुछ लोग बुझता, सहजे में सोहारी मिले जाता। अरे भइया लोग! इ राजनीति की गरम तावा पर पानी के छौंका ह, कवनो व्यंजन नाहीं बनत बा। भ्रष्टाचार से घेराइल सरकार से लोग के ध्यान हटावे खातिर छोड़ल शिगूफा ह। एके सियासी छूरी से सपा, कांग्रेस आ भाजपा के भोंके के प्रयास ह। आगे-आगे देंखी होख जाता का..
नेता रथी बेरथ के जनता, बाभन-बिसुन के दिहली नेवता।
स्व-अभिमान में आइल यतरा, जुटीं सभे ले पोथी पतरा।
क्रांति रथ लेके उ अइलें, शहर-शहर में सभा भी कइलें।
राजकुमार भी लगलें धावे, गली-मुहल्ला गांवें-गांवें।
अइसन चलल सियासी छूरी, यूपी बांटे के मंजूरी।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के १७ नवम्बर ११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

हमरा सिर पर चढ़ल बा कातिक, तोहरा गहना सुझता

कातिक के भीड़ चलता। असो हथिया की ना बरसला से रबी के बुआई के खर्चा बढ़ि गइल बा। डीजल की महंगी से खेत ‘चिरई नहान’ पाटि जाउ उहे ज्यादा बा। गांवन में सरकार एतना बिजली भेज देति बा कि टय़ूबवेल चालू क के खेत में पहुंच तबले लाइन गोल। अइसन लाइन से खेत भला केइसे गहगर पाटी? बिजुलिया त लखनऊ की अंबेडकर पार्क में भेजा गइलि बा। जहां बाबा साहब, मान्यवर साहब आ मैडम के मूर्ति पर उजियार कइल जाता। देश के तरक्की त पत्थरे पर अंजोर कइले से न होई। किसान का लाइन-ओइन के कवन जरूरत बा। जेकरा निजी पंपसेट बा ओहु के खर्चा साठ रुपया घंटा पड़ि जाता। दूसरा से चलवलवा पर सवा सौ रुपया पड़ता। एक घंटा में मुश्किल से तीन कट्ठा खेत पाटत बा। जेकरा बाप दादा के दस बीघा जमीन बा, ओकरा माटिये पटावला में माटी लागि जाई। कर्जा-उआम से खेत पाटि जाय त जोताई के जोगाड़। छहावन, चास, सोमरा, तिखरा, मिलवट, हेंगावन.। येही से कहल गइल-‘तेरह कातिक तीन आषाढ़’। बैल बिका गइलन, सब टेक्टरवे से जोतवाई। जोतवावते में उखड़ जइहन। ओकरा बाद खाद-बीया के जोगाड़। सरकार भरपूर व्यवस्था कइले बा। दस बीघा खेत खातिर किसान बही पर दो बोरी डीएपी, दो बोरी बीया। खेत बोआई कि सूंघल जाई। सरकारी गोदामन से खाद-बीया उठावत में नानी याद आ जइहन। गजब व्यवस्था बा, गेहूं पैदा करी किसान आ बीया बेंची सरकार। बैल-गोरू ना रखला से कंपोस्ट के जमाना लदि गइल। अंगरेजी खाद की महंगी से किसानन के कमर टूटत बा। जवन डाई पिछला साल छह सौ ले मिलल उ असो नौ सौ में मिलत बा। अब त डाई के नाम सुनते बाई ध लेता। किसान पर जेतना भीर बा ओतना केहु पर ना होई। लाठी-लुठी खात कवनो ना खेत बोआई त एकइसवे दिन फिर पनिहट के झंझट। अगर एही बीचे केहु के मेहरी कवनो गहना गढ़ावे के कही दी, त उ कहवे करिहन- हमरा कातिक ना बोआइल तोहरा गहना सुझता। पहिले की जमाना में घाघ कवि कहि गइलें-‘ उत्तम खेती, मध्यम बान, निषिद्ध चाकरी भीख निदान’। अब की जमाना में खेती के जे उत्तम बतावे उनके जोतला पलिहर में दस बीघा खाद-बीया छिटवा द ठीक हो जइहन। जवना नोकरी-चाकरी के घाघ जी निषिद्ध कइलन ओही में मजा बा। गोड़े-हाथे धूर-माटी लगही के नइखे। नीमन-चिकन रहù। किसान त हमेशा मइलभिलोरे ना रही। देश के किसान त भगवान हवें,उनकी उपजावल अनाज से सबकर पेट भराता, लेकिन वाह रे! व्यवस्था किसान भगवान लोग खातिर कवनो व्यवस्था ना होत बा। सरकार शहर में भागत नौजवानन के रोके खातिर मनरेगा चलवलसि। किसान के मजदूर के अभाव हो गइल। मशीनी युग आइल, खेत कंबाइन से कटाये लागल। चारा- भूसा पर आफत आ गइल। हमरा समझ में जे सबसे ज्यादा परेशान ओकर नाम किसान। जेकर निकर जाव जियते पिसान,ओही के कहल जाव किसान। एइसन किसान के मेहरी जब गहना के बाति करी तब इहे कहल जाई-
हमरा सिर पर चढ़ल बा कातिक, तोहरा   गहना सुझता। जेकरा पर बा खेती-बारी, उहे बंदा बुझता।।
कवनो ना पटवलें माटी, खाद-बीया बदे जुझता। सरकार के कवन व्यवस्था, इहे करेजा चुभता।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य १० नवम्बर २०११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

हमरी शहर के बड़ समस्या, अइसन अंड़सल जाम

पुलिस लाइन में यातायात माह के उद्घाटन समारोह भइल। साहब-सुब्बा लोग खूब हांकल। हम हइ कù देइब, हम हउ कù देइब। अरे भया! का करबù? इ तù माहवारी खतम होइ तब बुझाई। इ यातायात माह कवनो पहिला बेर ना मनत बा। पहिलहुं के साहब लोग मनावल, लेकिन व्यवस्था ना सुधरल। सुधरहुं के ना चाहीं। जब सब सुधर जाई तù येह लोग के कवन काम रही। साहब-सुब्बा लोग का करी। सड़किया सिकुरत गइल। लोग फइलत गइल। गाड़ी-घोड़ा हैसियत के पैमाना बनि गइल। बाप-दादा की जमाना में जे चार कोस पैदले धावत रहे, ओही की नाती-पोता का चार कदम पैदल चलल में नारा-पोटा ढील हो जाता । जमिनिया उहे बा। सड़किया उहे बा। मनइया बढ़त गइल। सवरियो बढ़त गइल। कहल जाला शहर में सभ्य मनई रहेंले, लेकिन भइया हो! सड़क पर चले के सउरे ना आइल। जे जेतना जबर दबंग, उ ओतने करता तंग। शहर में सबसे ज्यादा संख्या में आटो हवें। आटोवालन के हाल उ बा कि अगिला चक्का समाये के जगह मिल जाय त पछिला त धक्का-धुक्की में पार हो जाता। जहां चार डेग जमीन ना बा, ओहूं स्टैंड बना दिहल गइल। सबसे रफ त उ चलता जेकर कालर सफेद आ गाड़ी लग्जरी बा। अपनी रुआब में आड़ाति रछा, वायां-दहिने कहीं से निकार लिहें। अगर कवनो गाड़ी में हूटर-शूटर होखें त दुबर- पातर, हलुक-छेहर लोग त ओइसहिं दुबक जाई। सरकार साल में ग्यारह बेर तेल के दाम बढा देउ, लोग की सेहत पर कवनो प्रभाव नेइखे पड़ेवाला। स्कूले के बड़का -बड़का बसवालन की बाबुएजी के सड़क ह। जहें चाहें लरिकन के उतारें-चढ़ावें। चौराहा के जाम त सरकारी ह। यातायात सुधरला खातिर तैनात लोग यातायात बिगाड़ के वसूली में लागल बा। नगर निगम त अवर नरक बनवले बा। बीत्ता भर के जगह में कई पोरसा के होर्डिंग लगवा के पइसा कमात बा। बाति ठीके बा, लोग जाम में फंसल रही त येही बहाने होर्डिग के विज्ञापन त पढ़ि ली। एकरा अलावा सड़क पर कुछ बिसुकल, बहिला, बूढ़, बीमार गइया-मइया आ कुछ कनटूटा, लंगड़ा, भुअरा, मरखहवा. नंदी महराज लोग बइठ के आराम से पगुरी करेंले, जेइसे गोशाला में हवें। एगो सवाल अवर बा- जवना सड़क पर आम मनई एगो वाहन लेके जाम में हांफत-डांफत, खोंखत-ढकचत परेशान रहे ला, ओही सड़क से ललकी-निलकी बत्ती वाला लोग सैकड़न गाड़िन के रेला ले के सरसरात कइसे चलि जाला? शहर की समस्या पर इ कविता बा-
रेलमरेली ठेलमठेली, बुद्धि भइल नाकाम। हमरी शहर के बड़ समस्या, अइसन अंड़सल जाम।। 
होर्डिग लागल चौराहा पर, टाने खातिर दाम। जेकरा जिम्मे यातायात बा, उहो बा बदनाम।।
ठेला खोंमचा रिक्शा आटो, बाइक कार तमाम। सड़क पर जेतना जे धकिया ले, इहे मरद के काम।।
जे जे अतिक्रमण करि बइठल, ओकर बड़वर नाम। संघ-संगठन बना यूनियन , जीयल करें हाराम।।
गोरखपुर के बड़का साहब, बड़ा ताम आ झाम। लगता अब सुधार ही दीहें, दुपहर शाम के जाम।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ३ नवम्बर ११ के अंक में प्रकाशित है . 


 

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

आज है धनतेरस

कुबेर, यम व धन्वंतरि के पूजन की त्रयोदशी


कात्तिर्क कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानी तीन देवों के पूजन की तिथि। आज के दिन धन के देवता कुबेर , मृत्यु के देवता यमराज व सेहत के देवता धन्वंतरि का पूजन किया जाता है। इस वर्ष यह महापर्व 24 अक्टूबर को पड़ रहा है। कात्तिर्क कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को पारंपरिक रूप से धनतेरस कहा जाता है। इस तिथि का महत्व इस लिए है कि आज ही के दिन देवताओं के वैद्य ऋषि धन्वंतरिअमृत कलश के साथ सागर मंथन से प्रकट हुए थे। तभी से इस तिथि को धन्वंतरि जयंती मनायी जाती है। सेहत के देवता को विशेष रूप से वैद्य-हकीम मनाते हैं। स्वस्थ्य सेहत और निरोग काया की इच्छा भला किसमें नहीं होती। इस लिए भी धन्वंतरि की पूजा की जाती है। इस धरती पर धन की इच्छा भला किसमें नहीं होती। कहा गया है अर्थ बिना दुनिया व्यर्थ। कुबेर धन के देवता हैं। धनतेरस के दिन कुबेर की पूजा के लिए दीप दान करते हैं। यह कामना करते हैं कि मेरे घर में धन की वष्रा हो। इस दिन चांदी खरीदने की परंपरा है । इसके पीछे यह कारण बताया जाता है कि चांदी चंद्रमा का प्रतीक है। यह शीतलता भी प्रदान करता है। मान्यता है कि चांदी खरीदने से संतोष रूपी धन का भी हृदय में वास होता है। त्रयोदशी के दिन यम की भी पूजा की जाती है। इस पूजन में घर से दक्षिण दिशा में यम का दीप(जम्हु के दीया)जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि यम दीप जलाने से घर में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती। इस संबंध में एक लोक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि किसी समय में हेम नाम के एक राजा हुए। उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योतिषियों ने राजकुमार की कुंडली देखकर बताया कि जब इसका विवाह होगा तो चार दिन बाद मृत्यु हो जायेगी। राजा ने राजकुमार को ऐसी जगह भेजवा दिया जहां किसी स्त्री की परछायीं भी राजकुमार को देखने को न मिले। दैव योग से जहां राजकुमार रहता था, एक दिन उधर से एक राजकुमारी आ गई। दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये। राजकुमार ने उसके साथ गंधर्व विवाह कर लिया। विवाह के चार दिन बाद ही यम के दूत उसके प्राण हरने पहुंच गये। नवविवाहिता विलाप करने लगी। उसके करुण कंद्रन से एक यमदूत भावुक हो गया। उसने हिम्मत करके यमराज से कहा कि क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है कि किसी की अकाल मृत्यु न हो। यमदूत के बिनीत भाव को सुनकर यमराज ने कहा कि कात्तिर्क कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन जिस परिवार में मेरे नाम की दीपमाला दक्षिण दिशा को जलेगी उसके घर किसी की अकाल मृत्यु नहीं होगी। कहा जाता है कि उस दिन भी त्रयोदशी थी, जिस दिन यमदूत राजकुमार के प्राण हरने गये थे। यम दूत के बताने के अनुसार नवविवाहिता ने यम दीप जलाया और यमराज की आज्ञा से उसके प्राण छोड़ दिये। कात्तिर्क कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन यम, कुबेर व धन्वंतरि का पूजन किया जाता है। धनतेरस के दिन चांदी के अलावा बर्तन भी खरीदने की परंपरा है।
नर्वदेश्वर  पांडेय देहाती का यह लेख राष्ट्रीय सहारा में २४ -१०-११ को प्रकाशित है .

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

आंचल में बा लाश, झरे आंखिन से पानी.।

आंचल में बा लाश, झरे आंखिन से पानी.।
पौराणिक काल में बहुत राक्षसन के नाम सुनले होखब सभे। येह समय बीमारी के रूप में डोढ़ी, ताड़का, जम्हु, नरकासुर, कालीनाग, बकासुर..आदि के सम्मलित अवतार भइल बा। नाव बा- जेई, इंसेफेलाइटिस,नवकी बीमारी, जापानी बुखार। इ राक्षस केतना माई-बहिनिन की गोद के लाल खा-चबा गइल। केतना कुल के दीपक कुल-परिवार के रोशन कइला की पहिले ही बुझ गइलें। कवनो अइसन दिन ना बा जवना दिने येह बीमारी से पांच-छह गो लरिका ना मरत हवें। आजादी मिलले 64 साल भइल, लेकिन 32 साल से इ बीमारी भी आजाद हो गइल बा। पहिले की जमाना में हैजा, प्लेग, तावन आवत रहे। आज की समय में जापानी बुखार, नवकी बेमारी। बीमारी की वजह से कविता के लाइन बदल गइल- पूर्वाचल की माई बहिनिन के इहे कहानी। आंचल में बा लाश, झरे आंखिन से पानी.। पूर्वाचल में इ बीमारी भले महामारी के रूप ध लेले बा, माई-बहिन लोग की आंखि से पानी भले झरत हवे, लेकिन सरकार आ लालफीताशाही चदरा तान के सुतल बा। जगला की नाम पर जागल हवें शहर के सांसद आ विधायक। मंगर की दिने बाबा व्यापक जनजागरुकता अभियान चलवलें। मेडिकल कालेज से लेके कमिश्नरी तक पदयात्रा कइलन। बड़ा समर्थन मिलल। बात त संसद अउर विधान सभा में भी दमदारी से उठे के चाहीं, कुछ उठलो बा। सड़क पर बात उठवला के लोग ‘ पर-दर्शन ’ कहत हवें। मेडिकल कालेज से कमिश्नरी आठ किलोमीटर पैदल यात्रा में संसद आ विधायक की साथ कुछ जागरुक लोग जगावत कमिश्नरी ले आ गइलें। एक किलोमीटर लंबा लोगन के भीड़ रहे। जब ज्ञापन दिहला के बेरा आइल, त दुनो जने के इगो टकराइल। आठ किलोमीटर बाबा चलि के अइलें लेकिन दस कदम भीतर ना गइलें। कमिश्नर भी दस कदम बाहर ना अइलें। कमिश्नर साहब कहलें- दफ्तर से बहरा निकर के ज्ञापन ना लेइब। योगी बाबा कहलें-हम अकेले ना हई, हजारन मनई साथ हवें। दफ्तर में एतना मनई कहां समइहें। सही कहल गइल बा- ‘ घर के योगी योग-ना, आन गांव के सिद्ध’। बीमारी के मुद्दा पीछे, आ भीतर गइला बाहर अइला के मुद्दा आगे हो गइल। अंत में संत का सुझल बीच के राह। ज्ञापन नोटिस बोर्ड पर ही चस्पा करि के चल दिहलें। लोकतंत्र आ लालफीताशाही की कड़वाहट में कुछ कड़वी कविता-
आपन आंखि तरेर के, कहे जापानी बुखार। कुलदीपकों को खाउंगा, एक-एक को मार।।
मेडिकल में आकर के नित, क्यों फंसते इंसान। लाश रोज ही छोड़ता, हर लेता है प्रान।।
कितने कुल दीपक बुझे, कितनी कोख बीरान। साफ-सफाई हवा हवाई,पहुंच रहे श्मशान।।
मां की ममता रो रही,गिरते पिता पछाड़। दुख की दरिया बह रही, दिया कलेजा फाड़।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय  सहारा के २० -१०-११ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

गांवन में धरकोसवा घूमें, शहर में लागे जाम वोट बदे प्रत्याशी घूमें, पांचों वखत सलाम


बाबा बहुत चिंतित हवें। जब चिंता के कारण पूछल गइल त कहलें- का बताईं , गांवन में धरकोसवा के बहुते हल्ला बा। हितई-नतई रात-बिरात गइला में नाहके लोग पिटा जात हवें। संतकबीरनगर में ऊंखि की खेत में प्रेमी युगल बोरा बिछा के इलू-इलू करत रहलें, गांव वाला धरकोसवा कहि के धुन दिहलें। देवरिया में एक जने मरद-मेहरारू स्टेशन से उतर के पैदले सढ़ुआने के राहि धइलें, अंजोरिया रात में गांव की सिवाने पर पहुंचलें, तवले गांववाला लाठी डंडा लेके बटुर गइलें। धरकोसवा-धरकोसवा कहि के धुने लगलें। उ चिचियाते रह गइलें हम फलनवां के मउसा हई, हई मउसी हई.। सबसे खराब हालत बेलोरो वालन के बा। कवनो गांव में रात में बेलोरो गइल कि आफत आइल। अइसने बहुत खबर। शहर में राहि चलल मुश्किल बा। कवनो ओर जाइब, जाम में घेराइब। बहुत व्यवस्था बदलाइल, लेकिन जाम से मुक्ति ना मिलल। मिलबो ना करी, गाड़ी-घोड़ा बढ़त जात बा सड़किया त उहे बा। इ त रहल गांव-शहर के खबर। अब तनि अखबारन की दफ्तरन के हाल सुनीं। गोरखपुर में प्रेस क्लब के चुनाव होखेवाला बा। बहुत हलचल बा। प्रत्याशी लोग पत्रकारीय काम छोड़ के नेतागीरी पर उतर गइल हवें। पांचों वखत दुआ-सलाम। जवना पत्रकार भाई के अपने मेहरी-लरिका  कहना नेइखे सुनत उहो कंडीडेट लड़ावत हवें। दावत के दौर ओइसे चलत बा जइसे गांवन में परधानी के चुनाव। कई जने पत्रकार भाई एतना खींच के खा लेत हवें कि दुनो पवन चलत बा। उल्टी-सीधी दूनों शुरू। अरे भइया, दाना भले दूसरे के ह देंहि त आपने ह, बचा के..। चुनाव भले पत्रकार लोग के होत बा, लेकिन प्रचार में सेल्समैन, हेल्थमैन,गनमैन,मशीनमैन,गुड मैन, बैडमैन, हैटमैन, फैटमैन, चैटमैन, रैटमैन, कैटमैन, दुकानदार, ठेकेदार, वफादार, दफादार, दागदार, रसूखदार, रसदार ..(सब शब्दन के अर्थ अपनी हिसाब से लगा लेइब सभे) अउर न जाने कवन-कवन लोग लगल बा। एक जने पत्रकार कम ठेकदार अइलें, कहलें-बाबा!
असों फलां के अशीर्वाद दिया जाव। इ जीतिहें त ‘शीला के जवानी’ आ ‘मुन्नी बदनाम’ से भी बढ़िया कार्यक्रम होई। दावत में बिरियानी बिछवा दिहल जाई। बोतल-शीशी के कवन कहीं ड्रम के ड्रम के मिली। बाबा भड़क के खाड़ हो गइलें, कहलें अब इहे ‘पत्रकारिता’ रहि गइल बा। प्रेस क्लब के कमाई कम ना बा। पचास हजार रूपया महीना त बटुराई जाता। तीन गो कर्मचारी रखल हवें पंद्रह हजार में निवट जात होइहन। दस हजार के बिजली फूंकात होई। तबो तीन लाख बचि जात होई। सवाल इ बा- ए तीन लाख में पत्रकारहित के कवन काम होला? अपने हीत-नात-बात के लाभ भले दिया जात होई। सामूहिक बीमा के बात त बहुत सुनल गइल, लेकिन शुरू केहू ना करावल। मनबोध मास्टर कहलें- बाबा शीरा में गिरल- पड़ल-मरल चिउटा जनि निहारीं, मिठाई के मिठास देखीं। असों फलाने के वोट दे दीं। बाबा कहलें- केके दे दीं, हमरा खातिर सभे बरोबर बा-
जइसन उदयी ओइसन भान। इनका आंखि ना उनका कान।।
बाइस पसेरी सगरो धान। रुख ना बिरिछ तहं रेड़ परधान।।
सौ पुराचरन ना एगो दुराचरन। केतना ले सुख दीहें दुखहरन।। 
अन्हरा सियार के बा गुलरी मिठाई। पापी के पाप से पड़ोसी भी जाई।।
नाव दरियाव हवे पानी के ठेकान ना। नीम त हकीम हवें खतरे में जान बा।।
चार के जोन्हरी चौदह आना के मचान बा। ओखरी में मूड़ मूसरे लहान बा।।
नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के १३ अक्तूबर २०११ में प्रकाशित है . 

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

लकड़सुंघवां, धोकरकसवा धरिहे-घेरिहे, जागते रहो..

  पूर्वाचल में एह समय अफवाह के ‘वाह-वाह’ बा। कहीं लकड़सुंघवां, कहीं धोकरकसवा, कहीं चोर, कहीं डाकू। कानून-व्यवस्था के अवस्था बहुत खराब चलत बा। भय आ आतंक के आलम इ बा कि गांव के लोग पहरेदारी करत हवें। रात नौ बजे से भोर चार बजे ले ‘जागते रहो’ की गूंज से गांव के सिवाना गूंजत बा। येही अफवाह में केतना पागल पिटा गइले। एगो पागल के कच्छा बनियान गिरोह के सदस्य बतावल गइल, जबकि उ कच्छा-बनियान की जगह मैक्सी पहिनले रहे। एगो दूसर पागल के पकड़ के पीछे-पीछे हजारन मनई नारा लगावत रहलें-पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद। ओकरा पगलयीला में पुलिस के कवन भूमिका रहे? लेकिन झेले के पड़ल। झेलला की पीछे कारन इ रहे कि इलाका में चोरी-डकैती के बहुत घटना होत बा। आलम इ बा कि धरिहे-घेरिहे की शोर में कई जने शरीफ मनई भी पिटा जात हवें। रात में ट्रेन पकड़ल, चाहे ट्रेन से उतर के गांव गइल गुनाह हो गइल बा। लुहेड़न के लहान आइल बा, जहे चाहें हाथ साफ करत हवें। बोलेरो से कुछ लोग रिश्तेदारी में दावत खाये जात रहलें, रास्ता में एगो गांववाला नौ बजे ‘जागते रहो’ के पहिला एलार्म दिहलें कि सामने गाड़ी के लाइट पड़ल। जुट के टूट पड़लें, कूट दिहलें। उ कहें हम फलां के मउसा हई, गांव वाला कहें ससुरा डाकू हवें, अमवस्या जगावे जात हवें। बेलोरोवाला लोग नवरातन की एक दिन पहिले ही व्रत काटि लिहलें। कई जगह धोकरकसवा, पेटचिरवा, लकड़सुंघवां, कपरफरवा..और न जाने कौन-कौन नाम के आतंकी पैदा हो गइल हवें। गांव के लुहेड़ा सर्टिफिकेट बांटत हवें कि फलनवां गांव में लकड़सुंघवां आ गइल रहल। अफवाह की येही दौर में दुबई से फोन आइल पानी जहरीला हो गइल बा, जे पी ऊपर चलि जाई। येह लीला से कई जने बिन पानिये के रहि गइलें। एगो दूसर अफवाह फैलल, जेकरा जेतने संतति ओतने दीया जरावें। दीवाली त दूर बा गांव-गांव ‘दियादियारी’ मने लागल। कुछ लोग कहल कि रात में गांव से अब अपरचित लोग के गुजरल मुश्किल हो गइल बा। अब लूला, लंगड़ा, अंधा, भिखमंगा भी गांव में रात गुजरला से परहेज करत हवें। सब शहर की ओर भागत बा। अबहिन पागलन के र्चचा चलते रहे, येही बीचे बाबा गोरखनाथ की पावन धाम में धमाका हो गइल। धमाका की बाद एगो संदिग्ध पागल धराइल। जांच पड़ताल में पता चलल कि उ एगो संगठन के कार्यकर्ता ह। गनीमत रहल दूसरा मजहब के ना निकरल, नाहीं त माहौल गरम हो गइल रहित। पड़ताल में ओकरा पास से संगठन के परिचय पत्र मिलल। अब सवाल इ उठत बा कि पगलन के संगठन क परिचय पत्र काहें दियात बा? आकी परिचय पत्र पाके उ पगला जात हवें? येही र्चचा में बात साफ भइल कि ओकरा लगे पत्रकार संगठन के भी परिचय पत्र मिलल। इहो पता चलल कि एक हजार में खरिदले रहे। पूरा पागल बा, जवना शहर में तीन सौ में ही रिक्शावाला, खोंमचावाला, ठेलावाला और न जाने कवन- कवन वाला के पत्रकार संगठन के परिचय पत्र बेंचि दीहल जाता, उ एक हजार में खरीदलसि। बस सजो समस्या के इहे समाधान बा- जागते रहो..।
नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के २९ सितम्बर के अंक में प्रकाशित है .

बुधवार, 21 सितंबर 2011

ए अरियार , का बरियार , फलाने के माई जिउतिया भूखल बाड़ी


मंगर के मंगरुआ के माई जिउतिया के व्रत रहे। बुध की दिने अबै बुधिया खरना करत रहे, तबे खबर आइल कि आजुओ छह गो लईका  फेर नवकी बेमारी से मरि गइलें। अबहिन कलिहे तù बुधिया सांझ की बेरा जिउतिया के कथा (चिल्हो-सियारिन वाली)सुनलसि। कथा में पंडिताइन बतवली कि बहुत समय पहिले के बाति ह, एगो जंगल में चिल्हो सियारो रहत रहली। दुनो कुछ मेहरारू के जिउतिया के व्रत करत देखली।चिल्हो-सियारो भी व्रत रहली। जब रात कुछ बीतल त सियारो का भूख से पेट कुलबुलाए लागल। उ चुपके-चोरी गइली, जंगल से शिकार ले अइली। जब खाये लगली त चिल्हो कहली, का चूरुर-चुरुर करत बा? सियारो कहली, भूख से अंतड़ी बथतिया उहे चुरचुरात बा। व्रत में नेम-धरम बिगड़ला की वजह से सियारो के जेतने लईके  भइलें, सब मरि गइलें। चिल्हो के जेतने भइलें, खूब गदरइलें। चिल्हो-सियारो के कथा सुनला की बाद व्रती महतारी लोग बरियार(एगो जंगली पौधा)के अंकवार दिहली। कहली-‘ए अरियार, का बरियार। जाके राजा रामचन्नर से कहिहù समुझाय। फलाने के माई जिउतिया भूखल हई’। ए जिउतिया के ही प्रताप ह कि कवनो बड़वर घटना-दुर्घटना में जब केहु सुरक्षित बचि जाला त लोग कहेले- जा लाल! तोहार माई खर-जिउतिया कइले रहली ह। अब सवाल येह बात के बा कि का जेकर लक्ष्के नवकी बेमारी से मरत हवें उ जिउतिया के व्रत ना कइली का? पंडी जी की पतरा में जवन ना रहे उ पंडिताइन की अंचरा में रहे। पंडिताइन के जिउतिया वाली कथा सुनलो की बाद बुधिया के बचवा ना बचल। पूर्वाचल में इ नवकी बेमारी एतना लइकन के खा-चबा गइल जेतना ताड़का, पूतना ना खइले-चबइले होइहें। मेडिकल कालेज मउअत के कालेज बनि गइल बा। जिउतिया की दिने जिउतबंधन महराज काहे ‘मौतबंधन’ बनि गइलें। बाबा नवकी बेमारी की विरोध में धरना देत हवे। बुधिया अइसन केतने महतारिन के कोख उजरत बा। अइसन हालात पर कुछ कहे के मन त ना करत बा, लेकिन कहला बिनु भी ना चलत बा-
ए अरियार, का बरियार, काहें आन्हर भइल सरकार।
केतना माई भूखें जिउतिया, तब्बो लईके  स्वर्ग सिधार।।
फइलल बहुत बेमारी नवकी, सब केहू बा बहुत लचार।
इन्सेफेलक्ष्टिस धावा डरलसि, मेडिकल कालेज भइल बेकार।।
माई के व्रत-खरना अकारथ, कथा चिल्हो के चतुर सियार।
बाबा बइठ के देलें धरना, राजनीति के बहल बेयार।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य  राष्ट्रीय सहारा गोरखपुर के २२ सितम्बर २०११ के अंक में छपा है .
जियुतिया की खबर भी पढ़िए 
अश्रि्वन कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन मंगलवार को जीवत्पुत्रिका व्रत परंपरागत रूप से आस्था व श्रद्धा के साथ मनाया गया। माताएं पुत्रों के सुख, समृद्धि व दीर्घायु के लिए निर्जल व्रत रहीं। जीवत्पुत्रिका व राजा जिमूतवाहन की षोडसोपचार पूजा-अर्चना करने के बाद बरियार वृक्ष की विधिवत पूजा कर अपने पुत्रों के मंगल के लिए सीता माता को संदेश भेजीं। माताएं दिन भर निराहार व निर्जल रहकर दोपहर बाद या सायंकाल सोने, चांदी या सूत की बनी जीवत्पुत्रिका एवं राजा जिमूतवाहन की पूजा कीं। कुछ जगहों पर राजा जिमूतवाहन की कुश से बनी हुई प्रतिमा की पूजा की गयी लेकिन ज्यादातर जगहों पर बरियार वृक्ष को उनका प्रतीक मानकर माताओं ने पूजन-अर्चन किया और सीता माता को संदेश भेजा- ए अरियार, का बरियार, सीता से कहिह भेंट अकवार, हमार पूत मारि आवें, मरा न आवें, ओरहन लेके कब्बो न आवें।
महर्षि गौतम से स्ति्रयों ने प्रश्न किया कि उनके पुत्र किस व्रत से दीर्घायु होंगे। महर्षि ने कथा के माध्यम से जीवत्पुत्रिका व्रत पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सूर्यवंश में पैदा हुए राजा जिमूतवाहन एक स्त्री के पुत्र की रक्षा के लिए गरुण को अपने शरीर के मांस खण्ड का दान कर दिये। गरुण प्रसन्न होकर स्वर्ग लोक से अमृत लाकर उन बच्चों के अस्थि समूहों पर उसे बरसाये जिन बच्चों का उन्होंने भक्षण किया था। वे सभी जीवित होकर दीर्घायु हो गये। उस दिन अश्रि्वन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। गरुण ने वरदान दिया कि जो स्त्री इस दिन जीवत्पुत्रिका की कुश की आकृति बनाकर पूजा करेगी, उसका सौभाग्य बढ़ेगा और वंश की वृद्धि होगी- तासां सौभाग्य वृद्धिश्च वंशवृद्धिश्च शाश्र्वतम्। भविष्यति महाभाग नाऽत कार्या विवरणा।।  

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

पूजा नेम-धरम के चीज ना रहल

शहर जाम की झाम से परेशान रहे। यातायात व्यवस्था में बहुत बदलाव भइल। लेकिन परेशानी दूर ना भइल। ग्रामीण इलाका के टेंपो शहर में अंड़सल हवें। अइसने एगो टेंपों में हमहूं ठूंसा के आवत रहलीं। .. में भयंकर जाम । सोचलीं इ कवन नया जाम प्वांइट बनि गइल। पता चलल माताजी के कुछ भक्त लोग हाकी-डंडा की साथे चंदा मांगत(वसूलत) हवें। जवन टेंपों वाला चूं-चां करें, गाली-फजिहत के परसाद पहिलहि पावें। टेंपो से उतर के बाहर सड़क के नजारा लेबे लगलीं। मनबोध मास्टर भी मिल गइलन। कहलें- देखी बाबा, बांस गड़ा गइल, दशहरा आ गइल। आधा सड़क ले पांडाल गड़ाइल बा। अब महीना भर चंदा के धंधा भी जोर से चली। एहू पूजा में लीला होई। लक्ष्के-फइके राम बनिहें। पोंछि बान्हि हनुमान बनिहें। कैकेई, मंथरा, सुरसा, सूपनखा, ताड़का सब आ जइहें। मारिच भेष बदल के हरना बनी। रामजी सीता मइया की खुशी खातिर हरना की पीछे भगिहें। मायाबी लीला करी, लछुमन-लछुमन चिल्लाई। लखनलाल धुनहा लेके धइहें। एने रावन साधु की वेश में आई, सीता मइया के हरि ले जाई। दुनो भाई बने-बने भटकिहें। कोल-भील, भालू-बंदर से दोस्ती होई। रावन फेर विभिषण के लात मार के घर से निकाल दी। समुंदर पर पुल बंधाई। लंका फूंकाई। रावन जरा दिहल जाई। हर साल इहे कहानी दोहरावल जाता, लेकिन केहू की मन के रावन ना मरल। पूजा नेम-धरम के चीज ना रहल अब प्रदर्शन हो गइल। घर में माई पानी बिना टें-टें करिहें। लक्ष्के सड़क पर जय हो -जय हो करिहन। माई की थान पर नंगटन के नाच होई। गंदा-गंदा गीत होई। माई-बोहिन लोग मुड़ी निहुरवले जइहे, खोंइछा भर के माई के विदाई कù दीहें। हर वर्ष इहे लीला होता। बंगाल से आइल इ दुर्गापूजा अब गांव-गांव फइलल बा। अब तù एतना माई के भक्त हो गइल हवें कि असली-नकली के पहिचान दुलुम हो गइल बा। मनबोध मास्टर के बतकही पर हमार कवित्तई शुरू हो गइल-
आस्था उमड़ी सड़क पर, सरै न एकौ काम। माई की पूजा बदे, खूब वसूलें दाम।।
लुच्चा -लंपट भी बने, देवी मां के भक्त। हाकी-डंडा लिए खड़ी, सेना उनकी सशक्त। 
चंदा का धंधा शुरू, हुआ जागरन नाम। नाचे-गावे कमर हिलावें, जय हो- जय हो बदनाम।।
नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी लेख ८ सितम्बर २०११ के राष्ट्रीय सहारा गोरखपुर में छपा है

सोमवार, 5 सितंबर 2011

तस्मै श्री गुरवे नमः

  शिक्षक दिवस (डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती) के अवसर पर गुरुवो के श्री चरणों में शीश नवा कर यह विचार प्रस्तुत कर रहा हु 
वैश्विक परिदृश्य में गुरु-शिष्य संबंधों में भी काफी बदलाव आया है। यह उतार-चढ़ाव कई बार बाजार की जरूरत जैसा लगता है। कोचिंग संस्थान प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए छात्रों का दाखिला लेते समय उनका शोषण करते हैं और जब वही छात्र टॉप करता है, तो उसकी चिरौरी कर अपने संस्थान का नाम प्रचारित करने से भी पीछे नहीं रहते। कभी-कभी छात्र इस प्रचार की कीमत भी वसूल लेते हैं। यह दर्शाता है कि अब अर्थ प्रधान हो चुका है यह रिश्ता। तभी आज का शिष्य पूछता है, गुरु काहे लागूं पांव। सवाल यह उठता है कि कहां गया शिक्षक और शिष्य के बीच का वह अनकहा अनछुआ सा रिश्ता। कहां गई गुरु शिष्य परंपरा। कहां गई नैतिकता। शिक्षक बच्चों को दंड नहीं दे सकते। इसमें कानूनी अड़चन है।अधयपाकी बिजनेश हो  गयी.यही कारण है कि शिक्षकों और छात्रों में व्यावसायिक संबंध हो गया है। शिक्षक खुद नैतिक रूप से मजबूत नहीं हैं।  वह विद्यार्थियों को क्या नैतिकता का पाठ पढ़ाएगा। अब शिक्षक अध्यापन को महज नौकरी मान बैठे हैं। समाज और देश में अपनी भूमिका के महत्व को नहीं जान पाते। यही कारण है कि शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। ऐसे में गुरु शिष्य परंपरा कहां सुरक्षित रहेगी।  गुरु शिष्य परंपरा तभी जीवित रहेगी, जब शिक्षा का व्यवसायीकरण रुकेगा। गुरुजी खुद चरित्रवान नहीं हैं और विद्यार्थियों को चरित्र की शिक्षा देते हैं। इन सब के बावजूद भी  छात्रों को चाहिए कि वे अपने गुरुओं का सम्मान करें।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

हिंदू राष्ट्रवादी का ये इश्क महंगा पड़ा

राम कुमार दिल्ली से एक सवाल उठाए है

सांसद और पत्रकार तरुण विजय : हिंदू राष्ट्रवादी का ये इश्क महंगा पड़ा

अपनों पे सितम, गैरों पे रहम। एक मुस्लिम महिला के प्रेमपाश के कैदी हिंदू राष्ट्रवाद के प्रवक्ता श्रीमान तरुण विजय का कच्चा चिट्ठा आखिरकार जनता के सामने आ ही गया। दिल्ली से लेकर भोपाल और यूरोप तक जिस शेहला मसूद के साथ रंगरेलियां मनाई गईं, वो शेहला मसूद किसके हाथों कत्ल हुई, ये सवाल तो बाद का है।
पहला और सबसे ख़ास सवाल है कि हिंदू राष्ट्रवाद का पहरुआ आखिर किसके मोहपाश में बंधा अपनी हिंदू बीवी और बच्चों को सड़क पर फेंकने को आमादा हो गया। जिस श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन के निदेशक के तौर पर तरुण विजय ने बीजेपी में पारी शुरू की, उस फाउंडेशन के कार्यक्रमों के आयोजन का ठेका किसी स्वयंसेवक के द्वारा संचालित संगठन या संस्था को देने की बजाय शेहला मसूद की इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को ही तरुण विजय ने क्यों सौंपे रखा। पुलिस जांच में तमाम बातें बेपर्दा हो गई हैं/ दोनों के बीच मुलाक़ातों का सिलसिला काफी बरस पहले शुरु हुआ और बात शादी तक पहुंच रही थी, अपनी हिंदू पत्नी वंदना विजय को तलाक देने की तरुण विजय की तैयारी भी मुकम्मल थी, ये तमाम चौंकाने वाली बातें मीडिया के जरिए छनकर जनता तक पहुंच गई हैं। बीते तीन सालों से तरुण विजय के भ्रष्टाचार की ख़बरें लगातार मीडिया में सुर्खिया बनीं। ख़ास तौर पर जब आरएसएस ने उन्हें अपने मुखपत्र पांचजन्य के संपादक पद से विदा किया। तब लोगों को लगा कि तरुण विजय का सूर्य अस्त हो गया लेकिन दिल्ली की सियासत में गहरी पैठ रखने वाले तरुण विजय इतनी जल्दी हिम्मत हारने वाले नहीं थे। उन्होंने एक एक कर आरएसएस में अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाना शुरू किया। शुरूआत आरएसएस के उस प्रचारक से हुई जिसने तरुण विजय के खिलाफ आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत को जांच रिपोर्ट सौंपी थी।
ये जांच तरुण विजय द्वारा पांचजन्य के संपादक पद का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपये का वारा न्यारा करने से संबंधित थी। इस बारे में मार्च 2008 में पंजाब केसरी, द स्टेट्समैन, इंडिया टूडे, आऊटलुक समेत तमाम अख़बारों में खबरें प्रकाशित हुई थीं । दरअसल ये खबरें उस जांच रिपोर्ट से छनकर आई थीं जिसमें आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक दिनेश चंद्र ने तरुण विजय के खिलाफ जांच की और आरोपों को सही पाया।
जिंदगी भर संघ का गीत गाने वाले तरुण विजय को क्या पुरूष मित्र कम थे जो महिला मित्र की जरूरत पड़ गई। वक्त चिंतन और आत्ममंथन का है, बीजेपी के लिए भी और आरएसएस के लिए भी। ऐसे व्यभिचारी चरित्र वाले शख्स को और कब तक बर्दाश्त करेंगे?
राज कुमार के सवालो का आप जवाब खोजे , और हमें भी  बताये 
 

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

कहीं चांद देख के गले मिलें कहीं चान देख चलावे लें ढेला

समुन्दर की मंथन से चौदह को रतन निकलल। चान भी ओही में के एगो रतन हवें। बंटवारा में देवता लोग की बखरा पड़लें। चंद्रमा सुख शांति के कारक हवें।शीतलता के प्रतीक हवें, लेकिन जब उग्र हो जालें त पल्रय भी आ जाला। चंद्रमा मन के कारक हवें, बहुत चंचल हवें। कंट्रोल करे खातिर महादेव की बखर दिया गइलें। महादेव जी जइसे अपना जटा-जूट में गंगा की वेग के रोक दिहलन, ओइसहीं चंद्रमा के अपनी ललाट पर जगह दीहलें। चांद जब अजमंजस में रहेलन त लोग कहेलें दुइजी के चान हो गइल। कवि-साहित्यकार, कौव्वाल- गजलकार चान के चहेट-चहेट के अपनी रचना में बन्हलें। सुन्नर चेहरा चान बना दिहल गइल। चान अंजोरिया-अन्हरिया के पैमाना हो गइलें। पूरनवासी के चान, कातिक के नहान प्रसिद्ध हो गइल। चान लुकाइल त अमवसा हो गइल। मुसलमान भाई लोग जब ऐही चान के देख लेलें, त ईद के घोषणा हो जाला। चांद की दीदार की बिहाने ही ईद मनावल गइल। महीना भर दिन में रमजान, सांझ के इफ्तार क के रहमत बटोरे वाला भाई लोग ईद की मौका पर गले मिलल। मुबारकबाद दिहल। साम्प्रदायिक सौहार्द की सूत्र से लोकप्रियता बटोरेवाला लोग दिल मिले ना मिले गले मिलत मिललें। असों के ईद की साथ ही तीज के तिहुआर भी रहल। येह लिये भी साम्प्रदायिक सौहार्द बनल रहल। कहल गइल इ सब अन्ना के असर रहल। अन्ना के बाति छोड़ी चन्ना की बात पर आई। कृष्ण भगवान येही चान खातिर यशोदा मइया के परेशान कइलें। सूरदास के भजन तैयार हो गइल-मैया मो तो चंद्र खिलौना लैहों.। भादो की चौथ के भगवान देख लिहलें त कलंक लागल। येही से चौथ की चान के कलंकी चान भी कहल गइल। जवना चांद के दुईज के देख के एगो वर्ग खुश भइल ओही चान के चउथ के दिने देखला पर दूसरका वर्ग पास-पड़ोस में चेका चलावे लागल। अइसन चउथ के पाथर चौथ कहल गइल। जवन वर्ग आज चेका चलाई, जब करवा चौथ आई तो चलनी से चान निहराई, अघ्र्य दिआई। अइसने स्थिति पर देहाती बाबा कहलें-
‘कहीं चांद देख के गले मिलें, कहीं चान देख चलावे लें ढेला।
कहु चान ना दिखे लुकाइल लोग , कहीं चान के देखले लागल मेला।
कहीं दुइज के चान हो गये पिया, कहीं चान सा चेहरा निहारे अलबेला।
येही चान के अघ्र्य से करवा चौथ,केतना कहीं हम येही चान के खेला।।’
नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा गोरखपुर के १ सितम्बर  २०११ के अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

हैंडपंप उखड़वाकर थानों में जमा होंगे

मंडल में इंसेफेलाइटिस की कहर को रोकने के लिए गांवों-शहरों में लगे छोटे हैंडपंप उखड़वाकर थानों में जमा होंगे। मंडलायुक्त के. रविन्द्र नायक ने मंडल के सभी जिलाधिकारियों को पत्र भेजकर कहा है कि हैंडपंप उखाड़ने से यदि कोई रोकता है तो उससे बलपूर्वक निपटा जाए। इसमें संदेह नहीं है कि छोटे हैंडपंपों के अशुद्ध पानी के कारण जलजनित संक्रामक रोग फैल रहे हैं।यदि ग्रामीण अथवा शहरी क्षेत्र में अशुद्ध जल पीने से बीमारी फैलती है तो सम्बंधित अधिकारी दोषी माने जाएंगे। मौत होने की दशा में उनके खिलाफ धारा 304 ए का मुकदमा दर्ज कराकर कार्रवाई की जाए। साथ ही सम्बंधित ग्राम प्रधान को पदच्युत कर दिया जाए। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में खंड विकास अधिकारी व नगरीय क्षेत्र में अधिशासी अधिकारी से अनुपालन कराने को कहा है। उन्होंने स्वीकृत इंडिया मार्का हैंडपंपों को युद्ध स्तर पर लगाने का निर्देश दिया है।
  मंडलायुक्त महोदय हम आप को बतावे - जब यही चापाकल  आया तो लोगो ने कुए का पानी पीना छोड़ दिया . गावो में सबके यहाँ एक्वागार्ड या इंडिया मारका नहीं है .  चापाकलो को उख्द्वाकर थाने में  जमा करा देगे तब तो गरीब आदमी पानी बिना ही मर जायेगा . आप को पता होगा आप के ही परीछेत्र कुशीनगर में प्रशासनिक संवेदनहीनता से मुसहर बस्तियों की हालत इतनी बिगड़ गयी है कि इन्हें न भरपेट भोजन ही मिल पा रहा है और न ही काम।गरीबों को दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी कठिन है। ऐसे में घोंघा भूनकर भूख मिटाना इनकी नियति बन गयी हैं। हम तस्वीर दिखा रहे है दुदही ग्राम पंचायत के टोला महियरवां मुसहर बस्ती की । जहां कुपोषण के शिकार बच्चों की मौत को अज्ञात बीमारी माना जा रहा है।भूख व गरीबी के आगे बेबस  नरेश व उसकी भतीजी पोखरे व नहर के किनारे से लाये घोंघा को तोड़ कर उसमें से मांस निकाल कर खा रहे है पूछने पर जवाब दिया कि खाने को रोटी नहीं है तो क्या करें? मुसहर बस्ती में लगा इंडिया मार्का हैंडपम्प गंदगी व चारों ओर पानी से घिरा होने के कारण पानी लाने कम ही लोग जा पाते हैं। हमारे मित्र पत्रकार अनिल पाठक ने जो अपनी रिपोर्ट भेजी है, उसे अखबार   ने २६ अगस्त २०११ को प्रमुखता से प्रकाशित किया है, गरीब घोंघा भूनकर भूख मिटा  रहे है, आप चापाकल उखडवा कर थाने में जमा करायेगे . इस देश में बहुत अनाज भण्डारण के अभाव में सड़  रहा है, गरीब भूखो मर रहा है, लगता अब पानी बिना मरेगा .
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती 
,गोरखपुर

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

‘अन्ना लीला’ आ ‘अन्नागीरी’

अन्ना की आंदोलन के गूंज देवलोक में पहुंचल। नारद बाबा आपन वीणा बजावत अइलें। आंखों देखल हाल बतावत हवें- दिल्ली की रामलीला मैदान से गांव -गांव तक ‘अन्ना लीला’ आ ‘अन्नागीरी’ चलत बा। शोर एतना जोर रहे कि पेट में लईको ‘अन्ना- अन्ना ’ बोलत बा। गेट पर ‘अल्ट्रासाउंड कानूनी रूप से अवैध’ के बोर्ड लगवले ‘जनमरवा डाक्टर’एवार्सन के केस निपटा के अन्ना आंदोलन में कूदल हवें। प्रख्यात ज्योतिषी ‘धूर्ताधिराज’गर्भवती महतारी लोग के बतवलें की जन्माष्टमी के दिन जवन लईका  पैदा होई तवन बहुत प्रतापी होई, जल्दी दक्षिना देई, हमरा आंदोलन में जाये के बा। महतारी लोग असमय की पेट फरवा के लईका पैदा करावत हई। लईका ‘केंहा-केंहा’ की जगह पर ‘अन्ना-अन्ना ’चिल्लात हवें। भारी कमीशन की खरीददारी पर मंगावल कई गो टीका जनमते लईका के खोंसाइल बा। महतारी के दूध अमृत समान बतावेवाली नर्स लईका की मुंह में बोतल थम्हवले बाड़ी। बोतल में ‘हरहरगंगे’ ग्वाला वाला दूध भरल बा। बुझनेक लईका चाना मामा आ चेउंआ से ना टीवी की रिमोट से बाझत हवें। ‘ ज्ञान बेचवा’ स्कूल में बहुत सिफारिश की बाद नाम लिखाता। नाम लिखइला की पहिले गार्जियन का ‘पर-इच्छा’ से शिक्षा की दुकान में कापी-किताब, कपड़ा, जूता-मोजा-टाई महंगा दाम पर खरीदे के पड़त बा। नौकरी खोजला में खेत गिरवी होता। जर-जोगाड़ पर लक्ष्का के नोकरी लागत बा त बाबुजी मंदिर मिलावट वाली मिठाई चढ़ा के ‘उपरवार’ के मन्नत मांगत हवें। दहेज कानूनन जुर्म बा लेकिन लईका की विवाह में खींच के लियात बा। जज साहब के सामने ही ‘पेशकारी’ आ ‘नजराना’लियात बा। ‘मुकदमाबझवा’ वकील मोवक्किल से फीस लेके कोर्ट के वहिष्कार क के अन्ना की आंदोलन में कूदल हवें। ‘चंदामंगवा’ समाजसेवी लोग धंधा से जुटावल पइसा से कुछ मोमबत्ती मंगाके कैंडिल जुलूस निकारत हवें।महापुरुष की मूर्ति की आगे बइठ के ‘सूदखोरवा’सेठ अंडा के आमलेट खाके उपवास पर हवें। सुरक्षा में लगावल पुलिस वसूली में मस्त बा। अन्ना के जूता आ किरण वेदी के पर्स भी ईमानदार लोग उड़ा लेले बा। प्रतिवंधित गुटखा आ दुर्गधित दारू से जब रामलीला मैदान बंसा उठल त अन्ना का कहे के परल, गुटखा आ दारू पी के जनि आई। चैनेल वाले आपन बैट्री फूंकत हवें, अखबारवाला अन्ना की खबर से पन्ना रंगत हवें। कई गो ‘कुरफतिये’ लागले रहि गइलें लेकिन एतना बड़वर आंदोलन के बड़वर बात इ बा कि कहीं कवनो हिंसा ना भइल। अब सब पूछत बा-
न्ना चाचा तूहीं बतावù, कहिया अनशन टूटी। भ्रष्टाचार के टांगल हड़िया, अब कहिया ले फूटी।।

नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी  लेख राष्ट्रीय सहारा गोरखपुर के २५ अगस्त २०११ के अंक में प्रकाशित है .

जज ने भ्रष्टतंत्र पर किया प्रहार

  न्यायाधीश अजय पांडे के जज्बे को
सलाम
अन्ना के मंच से बुधवार को जनता को संबोधित करते हुए न्यायाधीश अजय पांडे ने एक वाकया सुनाया-
 हां मैं एक न्यायाधीश हूं। नई दिल्ली के वीआइपी क्षेत्र में अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी भी रहा। अब तीस हजारी में सिविल जज के पद पर कार्यरत हूं। कई बार यहां आया, बाहर से ही लौट गया। मन में डर था कि क्या होगा? अगर अन्ना के आंदोलन में शामिल हुआ तो क्या होगा? लेकिन अंतरात्मा ने मुझे बार-बार धिक्कारा। रामलीला मैदान में स्वयंसेवकों ने जन-लोकपाल के पर्चे दिए तो उन्हें पढ़कर रहा नहीं गया। मन की आवाज सुनी और अपनी बात कहने के लिए आपके सामने हूं। दो वर्ष मैं नई दिल्ली में अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी रहा। उस दौरान एक सांसद की गाड़ी पर संसद का पार्किंग स्टिकर गलत लगा था। जिसमें दोषी सांसद को ठहराया जाना था, लेकिन आरोपी बनाया गया ड्राइवर। ड्राइवर का कसूर सिर्फ इतना था कि वह गरीब था। कल उसकी जगह मेरा बच्चा होगा, तुम्हारे परिवार का कोई सदस्य भी हो सकता है। जब तक कि भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए कोई सख्त और पारदर्शी कानून नहीं बनेगा तब तक ऊपरी दबाव के चलते किसी न किसी व्यक्ति पर दोष थोपा जाता रहेगा। न्यायपालिका पुलिस से कहती है जांच करो, पुलिस वाले नहीं करते। क्योंकि व्यवस्था ही भ्रष्ट हो चुकी है। असल दोषी के खिलाफ निष्पक्ष जांच हो ही नहीं पाती। य् उस कानून और संविधान का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता, जो लोकतंत्र में जनसेवकों को पंगु बनाए और जनता पिसती रहे।
 
  हो सकता है की जज के इस उद्गार से तंत्र को परेशानी हो , फिर भी बड़ी ईमानदारी से उन्होंने आज के समाज का चित्रण  किया है.-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती





शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

पेट में के लईको बोले अन्ना - अन्ना. बारह आना देश अन्ना के साथ बा. चार आना में कुछ चोरवे, चिमचे, चुगुले आ कुकुरे बाडन. उहे जन लोकपाल के विरोध करत हवे

  चार आना , आठ आना,बारह आना. पेट में लईको बोले अन्ना - अन्ना. इ हाल बा अपना देश में  भरस्ताचार आ घोटाला के बोलबाला बा . बारह आना देश आना के   साथ बा. चार आना में कुछ चोरवे, चिमचे, चुगुले आ  कुकुरे बाडन. उहे जन लोकपाल के  विरोध करत  हवे. अपना देश में केतना घोटाला भईल , आयी एहू पर नजर दौरावल जा -
   आदर्श घोटाला- इ उ घोटाला ह जेमे  कारगिल की शहीदन की  में नाम पर आदर्श सोसाईटी में एइसन लोग के फ्लेट दियाइल जेकर कारगिल की  लडाई में कवनो योगदान न रहल , एमे कुछ नेता आ कुछ फौजी लोग भर्स्ट तरीका से कारगिल शहीद के परिजन बन गइलन.
२जी spekatramघोटाला-   इ उ घोटाला ह जेमे दूर संचार मंत्री ये राजा तिहाड़ में मज़ा मारत हवे.इ १२३२ लाइसेंस रेवड़ी अईसन बाट के,खूब मलाई चाट के, देश के खोखला कईला में लागल रहलें . 
 राष्ट मंडल घोटाला-   ये घोटाला   के खेलाडी हवे सुरेश कलमाडी . दिल्ली में भएल राष्ट मंडल खेल की तईयारी में ही खेला का दिहलन . अब तिहाड़ में केला  खा ताड़न खीच के.
 यह  तीन चर्चित घोटाला की पहिले देश में कई गो बहु   चर्चित घोटाला भईल.
एकरा  अलावा तोप कि खरीददारी में भी घोटाला भइल . बोफोर्स  तोप सौदा में स्वीडन कि एगो कंपनी  के  ६४ करोड़ क रिश्वत दिहल गईल. बिहार में ९५० करोड़ के चारा घोटाला भईल . एकरा बाद भी देश में बहुत घोटाला भईल . एइसन घोटाला कि बोलबाला वाला युग में भ्रष्टाचार से लड़े खातिर एगो ७४ वरिश के बुजुर्ग ललकार के खड़ा हो गईल . १६ अगस्त २००११ से भर्सताचार की खिलाफ अनसन के घोषणा क के अन्ना आपन अन्नागिरी देखावे लगलन.अन्नागिरी में गांधीगिरी इतना  दम बा। इ देश  देख लिहल ।  अन्ना की साथ पूरा देश एक पैर पर खड़ा बा। उनके इशारा पर  बच्चे,  नौजवान समर्थन में जुटल हवे. चारो ओर अन्ना की  हल्ला  में, गाव-गली - मोहल्ला रमल बा.  अनशन की बल पर सरकार के निहुरावे वाला ७४ वरिश की बुढ के जवानी लौटल बा। पूरा देश अन्ना -अन्ना करत बा. . गाव -गाव अन्ना कि हल्ला में देश में एगो नया क्रांति के मशाल जलल. अन्ना कि आन्दोलन में बुढ- जवान , लईका -सयान सब खड़ा हो गईल . अईसन माहौल में कहल गईल - पेट में के लईका बोले अन्ना -अन्ना .
-N.D. Dehati . gorakhpur

बुधवार, 17 अगस्त 2011

गांव-गली-मुहल्ला, बस अन्ना के हल्ला

17 अगस्त के पहिला बेर अखबार के पन्ना से गायब हो गइलन प्रधानमंत्री। लालकिला की प्राचीर से दिहल भाषन आ स्वतंत्रता दिवस से जुड़ल समाचार भी गायब हो गइल। पंद्रह अगस्त तù स्वाधीनता दिवस रहल, आजादी की जश्न में खूब लहरल तिरंगा लेकिन 16 आ 17 अगस्त के भी देश में तिरंगा के लहरल कम ना भइल। इ असर रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग ऊर्फ दूसरी आजादी की लड़ाई के। एक ओर सरकार व कलमाडी समर्थक त दूसरे ओर अन्ना समर्थक। गांव-गली-मुहल्ला, बस अन्ना के हल्ला। येही हल्ला में हमरा आल्हा गावे के मन कइलसि, तब सुनिलौ पंचों ध्यान लगाय..
गांधी जी अंगरेज भगवलें, जय प्रकाश जुल्मी सरकार। 
अन्ना चच्चा उठवलें मुद्दा,भगाई सभे अब भ्रष्टाचार।। 
अनशन के जब भइल घोषणा, क्रूर भइल यूपीए सरकार।
सात बजे अले सुबह ही, ढाई सौ पुलिस मयूर बिहार।।
जेपी पार्क पर गइला की पहिले, अन्ना टीम भइ गिरफ्तार। 
आक्रोश देश में उबलल, बोललसि टीवी इ समाचार।। 
शिक्षक छात्र वकील जगलें, सोशल साइट मैसेज मार।
यूपी एमपी महाराष्ट्र का, जम्मू असम झारखंड बिहार।। 
अमेरिका में इंडियन पढ़वइया, दूतावास पर डेरा डार। 
उपवास पर बैठ के गरजें, जल्द मिटा दो भ्रष्टाचार।। 
गोरखपुर में नारेबाजी, टाऊनहाल धरना बरियार। 
देवरिया में अधिवक्ता लोग, कइलन कोर्ट के वहिष्कार।।
बस्ती संतकवीर बा जागल, कुशीनगर कहे ललकार।
रहे विरोधी बउरहवा बाबा, उहो समर्थन में तैयार।।
देश में बहल अन्ना के आंधी, चौरंगी बहि गइल बयार। 
बढ़ल दबाव देश की अंदर, घुटना टेक दिहलसि सरकार।।
रिहाई के गइल परवाना, अन्ना कइ दिहलें इनकार।
छीछालेदर कांग्रेस के, थू थू मचल बा गांव जवार।।
चोरवे चुगले चिमचे कुकुरे, मुहं ओरमवले भये लाचार।
अबौ जेकर खून ना खउलल, ओकरा जियला के धिधकार।।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

नेवले और सांप की लडाई देखते रह जायेगे , 
 मदारी जंतर बेच के चले जायेगे
बाद में आप पछ्ता के क्या करेगे
भूत-भविष्य और वर्तमान से डरेगे .
  लड़ने वाले नहीं ,मजमा लगाने वाले  है ,पालतू है भीड़ को जुटाने वाले है

रविवार, 7 अगस्त 2011

इकीस दिन में आखिरकार फस गया तेंदुआ


इकीस दिन में आखिरकार फस गया तेंदुआ
गोरखपुर के फर्टिलाइजर खाद कारखाना परिसर में पनाह लेने वाला तेंदुआ आखिरकार 21 वें दिन रविवार को भोर में पिंजरे में फंस गया। गत 11जुलाई  से उसे पकड़ने का प्रयास हो रहा था . अन्ततह ८ अगस्त को वन विभाग को कामयाबी मिली .कई दिनों से भूखे तेंदुए ने बकरी को देखा तो  भूख शांत करने के लिए झपट्टा मारा ,बकरी बेचारी  की जान गयी, लेकिन तेंदुआ फस गया । .नागरिको  को दहशत से मुक्ति मिली।
फर्टिलाइजर के सुरक्षा गार्डो ने भोर में तेंदुआ को पिंजरे में फंसा देखा। समीप ही बकरी मरी पड़ी थी। पिंजरें में बंद हो जाने के कारण तेंदुआ गुस्से में था. सूचना पाकर `डीएफओ ए.पी. त्रिपाठी,रेंजर शैलेन्द्र चतुर्वेदी, रेंजर सुरेश राम, वन दारोगा अमरनाथ सिंह, एसडीओ मूलचंद वन कर्मियों के साथ फर्टिलाइजर पहुंच गए।
जिलाधिकारी संजय कुमार भी मय फोर्स फर्टिलाइजर पहुंच गए। इसके बाद लखनऊ से तेंदुआ को बेहोश करने के लिए डाक्टर की मांग की गयी। शाम करीब पांच बजे लखनऊ से डाक्टरों की टीम व सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग की टीम भी आ गयी। ट्रक पर जरिए क्रेन तेंदुआ को बिना बेहोश किये लादा गया। हालांकि इसमें दो घंटे लगे। वन कर्मियों ने भी काफी मशक्कत की तब कहीं जाकर शाम सवा सात बजे तेंदुआ ट्रक पर लादा जा सका। करीब साढ़े सात बजे तेंदुआ को लेकर ट्रक भारी पुलिस बल व वन कर्मियों के साथ सोहगीबरवा को रवाना हुआ।

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तेंदुआ देखने  उमड़ी भीड़
इक्कीस दिन से रातों की नींद उड़ाने वाले तेंदुआ को भर आंख देखने के लिए क्षेत्र की जनता दिन भर फर्टिलाइजर गेट पर जमी रही। हालांकि शाम तक जमे रहने के बाद भी वह तेंदुआ को नहीं देख पायी और निराश लौटी। शाम सवा सात बजे तेंदुआ ट्रक पर लादा गया । करीब साढ़े सात बजे तेंदुआ को लेकर ट्रक भारी पुलिस बल व वन कर्मियों के साथ सोहगीबरवा को रवाना हो गया . और जनता दूर से तमाशा वीन रही ,उसे तेंदुआ का दर्शन नहीं हुवा .

गदायिल बा मकई

खा मिठू मिया ,गदायिल बा मकई .
अपनी मचान पर , न हवे धनई .

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

गोरखपुर से उड़ा जगुआर मऊ में गिरा , भागलपुर में मचा हल्ला

  देवरिया के पड़ोसी जिले मऊ के मधुबन क्षेत्र में 4/8/11 को जगुआर के दुर्घटनाग्रस्त होने के दौरान हुए धमाके के बाद आतंकी वारदात की आशंका से हर कोई सहम गया। घटनास्थल से 10 किमी की परिधि में जिंदगी की रफ्तार मानो थम गई थी। भागलपुर में शोर मचा की आतंकी बम गिरा रहे है  .  चारो तरफ भगदर मच गयी   . किसी अनहोनी व आतंकी हमले का भय लोगों में समा गया। पता चला   मऊ जनपद के मधुबन थानांतर्गत ग्राम ढिलई फिरोजपुर में दिन के 12.05 बजे अचानक तेज धमाके व आग की उठती लपटों को देखा  गया। जैसे ही लोगों को सूचना मिली कि एयरफोर्स का विमान गिरा है, लोगों की भागदौड़ थमी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक दुर्घटना के चंद मिनट पहले 3 किमी की दूरी पर ग्राम पहाड़ीपुर के समीप ही विमान से आग की लपटें निकलती दिखीं।  विमान अनियंत्रित होकर पास के ही 33 हजार वोल्ट के विद्युत तार व पीपल के पेड़ से टकराते हुए ढिलई फिरोजपुर के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया। 
यह नियमित अभ्यास उड़ान पर गोरखपुर एयरबेस से उड़ा था . दुर्घटना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट सिद्धार्थ पांडेय और खेत में कम कर रही युवती रूमा (20) की घटनास्थल पर ही मौत हो गई, पिता नागेश्वर सहनी, मां और एक अन्य बुरी तरह से घायल हो गए हैं।
 दुर्घटना में जान गवाने वाले पायलट सिद्धार्थ पांडेय के पिता अभय नरायण पांडेय आईटीआई मनकापुर गोंडा में वित्त अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। माता रीता पांडेय गृहणी हैं। छोटी बहिन श्रेया उर्फ सांची पांडेय (22) गाजियाबाद से एमबीए कर रही है। सिद्धार्थ माता-पिता के इकलौते पुत्र थे। सिद्धार्थ ने आईटीआई मनकापुर के सेंट माइकल स्कूल से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की थी। वह वर्ष 2002 में एनडीए में चयनित हुए। 2005 में उन्हें पहली तैनाती भुज गुजरात में मिली। इसके बाद उनका स्थानान्तरण अंबाला कर दिया गया जहां से पांच जुलाई को गोरखपुर स्थानान्तरित कर दिए गए। सिद्धार्थ अभी अविवाहित थे। अभय नारायण पांडेय मूल रूप से इलाहाबाद के अल्लापुर मोहल्ला के निवासी हैं। घटना   के कुछ ही समय बाद हेलीकाप्टर   से पहुचे सेना के जवान पायलट सिद्धार्थ पांडेय का शव लेकर चले गए .
 मधुबन की खबर के साथ
नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती
rastriya sahara , gorakhpur 



गुरुवार, 4 अगस्त 2011

यह है नंदी महाराज

यह है नंदी महाराज . सड़क पर बहुत उत्पात किये , थक गए तो गोरखनाथ थाना में ही बैठ कर पगुरी करने लगे. कितना जिमेदार है नगर निगम .


रउरो में कवनो के सींग कबो धंसी...


रउरी सिद्धान्त पर हमरा हसी आवत बा । रउरा बहुत बड़वर पशु प्रेमी हईं (पता ना मनई से प्रेम ह.. कि ना) रउआ हाईकोर्ट से मुकदमा दर्ज करावत हई । नगर निगम के महापौर अन्जु चौधरी, नगर आयुक्त राजमंगल, पूर्वनगर आयुक्त वीके दुबे सहित तीस लोग पर मुकदमा दर्ज करे के आदेस दिहलसि। आरोप बा कि 2007 की पहिले से लेके अबतक दस हजार गोवंशीय पशुधन के क्रुरता पूर्वक पकड़ के काजी हाऊस में बन्द क... दीहल बा। रउरी पशु प्रेम के बंदगी बा। हकीकत ई बा कि महानगर के सड़कन पर अबहीनों दस हजार से ऊपर की संख्या में छुट्टा जानवर घुमत हवें। हार्न के पों पों बाजत रहे, लेकीन ऊ नन्दी महाराज लोग पगुरी कइला में लागल रहेला। जाम के झाम में भी येह लोग के बहुत योगदान बा। सड़क पर जगह-जगह मुफ्त में कइल गोबर पर जब कौनो चरपहिया के चक्का चढ़े ला त बगल से गुजरत बाइक सवार चाहे पैदलिहा मनई के कपड़ा पोतनहर अइसन हो जाला। सब्जी मार्केटन से आसमान की भाव चढ़ल तरकारी खरीद के बहरियात कवनो माई-बहिन पर के झपट्टा मार के चौपाया गुण्डा चबा जालन त ओह घर में 'रोटी प्याज' के ही आसरा रहि जा ला। शहर के पॉस इलाका में घूमत टहलत कउनो बड़मनई के पिछवाड़ा में सींग लगा के उलाटत शायद रउरा ना देखले हईं। यूनिवर्सिटी परिसर में बिगड़ैल सांड़ जब कउनो छात्रा के चहेंट ले ला अ बेचारी के हाथ से कापी किताब छितरा जा ला। जान बचावल मुश्किल हो जाला ओह दृश्य के रउरा ना देखले होखब। कबो कबो सड़क पर सांड़न के जंग अ खुरचारी दौड़ में राहगीर भी गंतव्य तक ना पहुंच के अस्पताल पहुंच जा ला। अइसन बहुत उदाहरण बा जवना से पशु के प्रति प्रेम ना जागि सकेला। शहर के चर्चित चितकबरा, कनटूटा, लंगड़ा, भुंवरा, काना, कैरा, गोला, घवरा में कवनो से रउरा प्रेम ना देख सकेलिन। इ कवनो आतंकवादिन से कम ना हवें। रउरा बहुत बड़वर पशु प्रेमी होइब, हम ना जानत हईं। लेकिन अपना आहाता में केतना बीमार, अचलस्त गोवंशी के दवा-दारू, खरी भूंसा के इंतजाम कइले हईं एहुके खुलासा क के समाज के सामने रख दीं। पशु, पशु होलें। मनई के प्रति प्रेम भाव देखाईं। जवन पशु खूंटा से बन्हि के ना रहेलन उ अवारा कहल जालन। उनकर असली जगह जंगल ह। जहां जंगलराज चलेला। गोरखपुर शहर ह, महानगर ह। एइजा नगर निगम के भी कुछ नियम बा। नागरिकन की सुरक्षा खातिर यदि अवारा पशुन पर डंडा चलता त कवनो बाउर नेइखे होत। अबे बहुत ढीलाई बा। अगर सही में अवारा पशु काजी हाउस में बंद रहितन त सड़क पर ना दिखतन। आंख खोलीं, सड़क पर जानवरन के 'डाराज' देखीं, ओकरा बाद कवनो मनई पर मुकदमा ठोंकीं। हमरा त रउरी येह सिद्धांत पर आवता हंसी, रउरो में कवनो के सींग कबो धंसी।।

एन. डी. देहाती

सर्व शिक्षा अभियान कù सपना..



सर्व शिक्षा अभियान की नाम पर सरकार बहुत पइसा ठेलले बा। एकरा बावजूद भी सरकारी स्कूलन में पढ़ाई लिखाई में सुधार ना भइल। एगो पत्रकार भाई सरकारी स्कूल पर पहुंच गइलें शिक्षा-दीक्षा के जायजा लेबे। माट साहब का बर्दास्त ना भइल। सब बात भोजपुरी कहावत में कहि दिहलें- सरकार के मिड डे मील, स्कूल के खिचड़ी। उ खिचड़ी जवना के चार यार, दही पापड़ घी अंचार। एइजा चारों के अकाल। प्रधानजी लोग की हाथे सब व्यवस्था बा। दाल के पानी, पियरका रंग, खींचे लक्ष्के माड़े संग। इहो रोज ना बनत बा। कबो घानी घना, कबो मुट्ठी चना, कबो उहो मना। अबरे के मेहरारू गांव भर के मौजाई के हाल बा। जेही स्कूली पर आवता धमका के चलि जाता। लक्ष्का लोग करिया अक्षर भइंस बरोबर भले ना जनलें थरिया लेके पहुंच जात हवें। स्कूल के हाल उ बा सेतिहा के साग गदपुरना के भाजी। नेटा बहावत, जंघिया सरकावत लक्ष्के चलि आवत हवें। प्रधान जी आन की धन पर कनवा राजा भइल हवें। पांच गो रसोइया तैनात क देले हवें। बुढ़वा भतार पर पांच टिकुली। सजो मजा प्रधान जी मारत हवें, आ चेकिंग -ओकिंग में तनख्वाह कटत बा मास्टरन के। खेत खाए गदहा, मारल जाव जुलहा। हम तù गइयों हूं, भइसियों हूं। दस्कतिये ले हाथ बा। कोदो देके ना पढ़ले हई लेकिन हई जवन दूसरे के कमाई पर तेल बुकवा लगत बा, भगिमाने के भूत हर हांकत बा। गांव वाला चुन के बइठा देले हवें अइसन बेह्या के की ओकरा पीठी रुख जामल, उ कहे कि छांह भइल। चार आना के जोन्हरी चौदह आना के मचान। लक्ष्कन के ठेकाने नेइखे आ भवन पर भवन बनवाबति बा सरकार। गांव वालन के हाल उ बा कि एक तù बानर दूसरे मरलसि बिच्छी। तोहं लोगन फोटो खींचे चलि आवत बाड़ù आ पूरा गांव तमाशा देखे बटुरा जात बा। जेतने मुंह ओतने बात। देश में चारों ओर भ्रष्टाचार बा लेकिन तोहं लोगन का इसकूलिए लउकत बा। मुर्गी गइली बंसवाड़ी, बुझली वृंदावन आ गइली। इ शिक्षा विभाग अथाह बा। बड़- बड़ ऊंट दहाइल जा , गदहा पूछे केतना पानी। माट साहब के बात सुनि के पत्रकार भाई मुसकी मारत चलि दीहलें। पाड़े बाबा क  कवित्तई चालू हो गइल-
गुरुजी समायोजन में, शिक्षा मित्र आंदोलन में। चूल्हाभाड़ में गइल पढ़ाई, लईका  जुटलें भोजन में।। गांव-गांव स्कूल खुलल, पइसा आइल एतना। ना सुधरल, कब सुधरी,सर्व शिक्षा कù सपना।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती 
रास्ट्रीय सहारा , गोरखपुर

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

पुलिस बिकवाती दारू ,विरोध करें मेहरारू




गोरखपुर के इमानदार कहे जाने वाले आईजी विजय कुमार अपने बेईमान सिपाहिओं को कब ठीक करेंगे.
महिलाओं ने गोरखपुर के  खोराबार पुलिस और कच्ची शराब के कारोबारियों के बीच हुई साठगांठ की पोल खोलकर  रख दिया .पुलिस वसूली में लगी रही तो पहली अगस्त को महिलाओं ने कच्ची  के कारोबारियों को पस्त कर दिया . महिलाओं द्वारा की गई कार्रवाई में 5 कुंतल महुआ लहन नष्ट किया गया जबकि 1000 लीटर कच्ची शराब बरामद की गई। आबकारी के लोग का साडी पहिन ले  .अपाची सिपाही केवल मुद्रा बिमोचन में लगे है . औरतो की बहादुरी सून  आईजी  ने  थानेदार को फटकार लगाई तो उन्होंने  एक कारोबारी को गिरफ्तार किया।  जंगल सिकरी गांव की श्रीमती सुभावती देवी, श्रीमती इंद्रावती, श्रीमती मीना, श्रीमती सोनारी, श्रीमती चंद्रावती, श्रीमती नर्मदा, श्रीमती रेशमी देवी, श्रीमती गेंदा, श्रीमती राजपति समेत सैकड़ों महिलाओं ने आज सुबह फुर्सतपुर चौराहा स्थित कच्ची शराब के कारोबारियों राजाराम निषाद, उसकी पत्नी, कोइल व उसकी पत्नी, सदाबृक्ष उर्फ कोइल पुत्र हरिद्वार के कच्ची शराब के अड्डों पर छापेमारी की। महिलाओं ने 1000 लीटर कच्ची शराब बरामद की। महिलाओं ने  खोराबार पुलिस के विरुद्ध नारेबाजी शुरु की। इतना ही नहीं महिलाओं ने इसकी जानकारी आईजी रेंज विजय कुमार को दी। आईजी की फटकार पर मौके पर पहुंचे थानेदार विनय कुमार पाठक ने लहान को नस्ट कराया

अब आप बताईये गोरखपुर की पुलिस को चूड़ी  पहन कर घर में बैठ जाना चाहिए की नहीं ? आबकारी  के लोगो को  साडी पहन लेना चाहिए  की नहीं ? और महिलाओं में ऐसे ही जागरूकता रही तो पुलिस की शह पर चल रहा कच्ची  शराब का कारोबार बंद हो जायेगा की नहीं ?
 

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

देवरिया के रुद्रपुर में है दूसरी काशी

देवरिया  जनपद मुख्यालय से लगभग बीस किमी दूर स्थित रुद्रपुर नगरी को काशी का दर्जा प्राप्त है। यहां भगवान शिव, दुग्धेश्वरनाथ के नाम से जाने जाते है। शिवलिंग जमीन के अंदर कितने गहरे तक है, इसकी थाह कोई नहीं लगा पाया। शिव पुराण व स्कंद पुराण के साथ ही चीनी यात्री ह्वेंनसांग ने भी बाबा की महिमा का बखान किया है।
 उप ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के संबंध में पद्म पुराण की निमन् पंक्तियां उल्लिखित हैं-
खड़ग धारद दक्षिण तस्तीर्ण दुग्धेश्वरमिति ख्याति सर्वपाप:, प्राणाशकम यत्र स्नान च दानं च जप: पूजा तपस्या सर्वे मक्षयंता यान्ति दुग्धतीर्थ प्रभावत:।
ईसा पूर्व 332 में रघु वंश से जुड़े महाराजा दीर्घवाह के वंशज राजा ब्रजभान रुद्रपुर आए थे। तब क्षेत्र :जंगल से आच्छादित था। सैनिक मचान बनाकर रहते थे। एक रात उन्होंने देखा कि एक गाय आकर खड़ी हो गई और उसके थन से स्वत: दूध निकल रहा है। राजा ने जिज्ञासा शांत करने के लिए उस स्थान की खुदाई कराई। उन्हे वहां एक शिव लिंग दिखा। उस स्थान की साफ सफाई कराकर वेदपाठी, विद्वान ब्राह्मणों द्वारा शिव लिंग का रुद्राभिषेक कराया गया। चूंकि गाय ने प्रथम बार लिंग का दूध से अभिषेक किया था, इसलिए पीठ का नाम दुग्धेश्वर नाथ रखा गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल दधीचि व गर्ग आदि ऋषि-मुनियों की तपस्थली भी है।
देवारन्य की इस धरती को बार -बार नमन करने का जी करता है . हर हर महादेव ... om namah shivay

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

राहुल कोई भगवान् राम नहीं है .

 राहुल कोई भगवान्  राम नहीं है . लेकिन गोरखपुर में आये तो आमी के प्र्दुसन से त्रस्त लोगो ने उसी तरह गुहार लगाई <उतराई नाहीं चाही, पनिए शुद्ध करा देईं> मीडिया ने केवट -राम सवाद का सहारा लिया और दाग दी भोजपुरी की हेडिंग से एक खबर . और बना दिया राहुल को हीरो .
एक अख़बार ने लिखा - अयोध्या से जितनी दूर दक्षिण श्रृंगबेरपुर है लगभग उतनी ही दूरी पर पूरब दिशा मे बसा है गोरखपुर का कटका गांव। श्रृंगबेरपुर में भगवान श्रीराम ने केवट को सुई नदी पार कराने एवज में उतराई देने की कोशिश की थी। आज राहुल ने कटका में आमी नदी पार कराने के एवज में केवट को उतराई देनी चाही। राहुल के कटका दौरे में गांव के हर बड़े बुजुर्ग की जबान पर राम केवट संवाद बरबस चर्चा में आ गया था।दो नामों में र अक्षर ने इस चर्चा को और भी आगे बढ़ा दिया। तब तो केवट ने कहा था-
कहेउ कृपालु लेहु उतराई,केवट चरन गहे अकुलाई.
नाथ आजु मैं काह न पावा,तिटे दोष, दुख, दारिद दावा।
आज कटका गांव के दो मल्लाहों ने सपने में नहीं सोचा था कि उनकी नाव पर राहुल गांधी बैठेंगे। बाढ़ के सीजन में नदी में तीन माह तक नाव चलाने वाले जीतू निषाद एवं रमेश निषाद ने जब राहुल गांधी को नदी के पार उतारा तो राहुल ने उतराई देनी चाही । बस क्या था तपाक से जीतू ने कहा, साहब पइसा नाहीं चाही, आमी के पनिए शुद्ध करा देईं।
बतौर जीतू एवं रमेश अजीब संयोग था। जब राहुल गांधी का काफिला नदी के किनारे छताई पुल के पास पहुंचा तो वे सुर्ती मल रहे थे। जब वे उनके पास आये तो वे पहचान नहीं पाये कि यह लोग कौन हैं। नाव में पूछकर वे लोग बैठ गये नदी पार करने के दौरान जीतू से उसे परिवार के बारे में रीता बहुगुणा जोशी ने पूछा। जीतू ने उन्हें बताया कि उसके चार बेटे एवं दो बेटी हैं। बीस वर्ष से बाढ़ के वक्त नाव चलाने वाले जीतू के मन में एक व्यक्तिगत मुराद (बेटो ं को नौकरी) पूरी कर लेने की इच्छा हुई लेकिन उसने सामाजिक हित को महत्व दिया। वह कहता है कि मन में एक बार आया कि कि कह दे लेकिन आत्मा ने गवाही नहीं दी। जीतू कहता है कि नदी का पानी जब शुद्ध हो जाएगा तो कई लोगों के बेटे का जीवन संकट से बचेगा। रमेश निषाद कहता है कि उसकी जाति के पूर्वजों ने भगवान राम को नदी पार कराया था। वह अपने जीवन में इतने बड़ी हस्ती को पार कराकर काफी खुश है। सपने में भी उसने नहीं सोचा था कि ऐसा अवसर कभी उसके जीवन में आएगा। 
 दुसरे अख़बार ने लिखा -हैण्ड पम्प ले के  पानी जहर ugilat बा .पानी पि के larika bimar ho jat हवे .
 एक  ने लिखा - राहुल ने खरीदी  700 में तीन किलो प् कौ डी....
पढ़िए और इस राजनितिक ड्रामा पर अपनी प्रतिक्रिया भी दीजिये 

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

सबका खातिर चढ़ल बा सावन, उनका खातिर बसंत...


शहर में तेंदुआ फंसावे खातिर वन विभाग के लोग दू दिन से पिजरा में बकरी बान्हि के जाल बिछवले हवें लेकिन उ फंसते ना बा। लेकिन मेडिकल के छात्रा गुरुजी की जाल में फंसि गइली। बबुनी मेडिकल पढ़त-पढ़त प्रेम के पाठ पढ़े लगली। पुलिस महकमा परेशान रहे। ‘गोद में लक्ष्का शहर में डवरेरा’ की तर्ज पर पुलिस वाला जौनपुर से लखनऊ ले छान मरलन, लेकिन बबुनिया गोरखपुर के ही एगो होटल में गुरुजी से ‘एकांत शिक्षा’ लेत रहे। सुबह जब अखबार देखली तù पता चलल कि उ गायब हई,गुमशुदगी दर्ज बा। इश्किया रोगी डाक्टर व छात्रा कù इलाज पुलिस वाला ना कù पवलें। कारण ,दूनो बालिग हवें। अब सवाल इ उठत बा कि बालिग गुरु-शिष्या के संबंध जायज बा? अइसन गुरु समाज के कवन संदेश दीहन? डाक्टरी पढ़े बाली बबुनी माई-बाप की आंख में धुरि झोंक के इ कवन पढ़ाई पढ़त हई? भारतीय संस्कृति में अइसन संबंध के मान्यता कहां बा? इ तù एकदम अंगरेजी सभ्यता हù जवना में ‘लीव इन रिलेशनशीप’ कù पाठ बा। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य के संबंध पिता-पुत्र अइसन होला। समाज में जेतने शिक्षा बढ़त बा, ओतने संस्कृति खराब होत बा। लोक-लाज कù जनाजा निकरल जाता। अब तù गंउअन में भी इहे रोग फइलल जाता। पहिले का समय में ‘कुजतिहा’ छंटला के व्यवस्था रहल तù समाज के भय से भी लोग ‘लंगोट के पक्का’ होत रहलें। गांव में केहू एगो-दुगो लोग ‘बहकल’ तù जवार-पथार ले हल्ला हो गइल। फलनवां ‘पंद्रहआना’ हो गइल। मतलब की खांटी रहे खातिर सोरहआना रहल जरूरी रहत रहल। अब पंन्द्रहआना के कहे, आठ आना भी ना बचल बा। कानून से ‘लवलाइटिस’ ना रोकल जा सकेला। कानून तù अइसहीं आपन पल्ला झाड़ के खड़ा हो जाई कि बालिग हवें.। इ सब रुक सकेला संस्कार से, सामाजिक भय से, लोकलाज से। बबुनी मेडिकल के पढ़ाई पढ़ के पास होइती तù देश-समाज के नाम रोशन होइत। लेकिन उ पास हो गइली इश्कबाजी में.। एगो कवित्तई में घटना के अर्थ निकारीं सभें- 
सबका खातिर चढ़ल बा सावन, उनका खातिर बसंत। येह बरुअन के का कहीं, जेकर आदि न अंत।। शिष्या को जब पकड़ लिया, लवलाइटिस का रोग। गुरु की साथे मौज मनावे, कब तक सहे वियोग।। सोचले ना रहलें बाबा कि, इहो जमाना आई। गुरु अपनी गरिमा के त्यागी, मटुकनाथ बन जाई।।


बुधवार, 20 जुलाई 2011

आस्कर अवार्ड विजेता फिल्म स्लमडाग मिलेनियर की लतिका यानी रुबीना

आस्कर अवार्ड विजेता फिल्म स्लमडाग मिलेनियर की लतिका यानी रुबीना को ‘पूरब’ की आब-ओ-हवा खूब भा गयी. वह बुधवार १९-०७-११ को गोरखपुर आई. थी . गोला के बनरही गाव निवासी दिनेश दुबे के घर घूमने आई रुबीना अपने पापा रफीक अजगर अली कुरैशे के साथ सहारा के दफ्तर में पहुची . रुबीना संपादक श्री मनोज तिवारी जी से मिली . जाते-जाते वादा कर गयी की मौका मिला तो फिर आउंगी .

रविवार, 17 जुलाई 2011

पत्थर की नाव तैरती दिख जाए तो ...

आपने लकड़ी की नाव देखी होगी और उसके बारे में सुना भी होगा लेकिन मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में एक शिल्पकार ने पत्थर की ऐसी नाव बनाई है जो तैर भी सकती है.
लगभग एक साल की मेहनत के बाद दीपक विश्वकर्मा ने ग्वालियर सेंड पत्थर की नाव बनाई है.
दीपक की यह नाव है तो पत्थर की लेकिन तैरती ठीक लकड़ी की नाव जैसी है.
इस नाव में राम, लक्ष्मण, सीता सवार हैं तथा उसे केवट चला रहा है.
पत्थर की नाव पानी पर कैसे तैरती है,
इस पर दीपक का कहना है कि रामायण में भगवान राम की सेना को रामेश्वर को पार करना था तो हनुमान की बानर सेना ने पत्थर पर सिर्फ राम का नाम लिख दिया था, फिर वह तैरने लगा था.
वह कहते हैं कि यह राम के नाम का प्रताप था कि पत्थर भी तैरने लगा था.
दीपक के मुताबिक यह नाव दो फुट लम्बी तथा नौ इंच चौड़ी है. इसको बनाने में 70 हजार की लागत आई है.
वह कहते हैं कि नाव का संतुलन बनाने के लिए उन्हें काफी मशक्कत करना पड़ी.
संतुलन बनाने के लिए तीन माह तक कड़ी मेहनत करने के बाद वह पूरी तरह पत्थर से बनी इस नाव को पानी पर तैराने में सफल रहे. दीपक द्वारा बनाई गई इस पत्थर की नाव का दिल्ली की प्रदर्शनी के लिए भी चयन हुआ है. इस बात को लेकर दीपक व उनका परिवार काफी उत्साहित है.
- sahara samay

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

मुलायम बताये उनके लाडले ने सही प्रत्याशी का चयन किया है

यह कैसी निष्ठा है .गोरखपुर ग्रामीण से सपा के घोषित प्रत्याशी लाल अमिन खान जब गोरखपुर पहुचे तो सपाइयो ने उनका पुतला फुक कर विरोध जताया . अब मुलायम बताये उनके लाडले ने सही प्रत्याशी का चयन किया है .

धावत धोती ढील भई, सात रेस कù कोर्स



 mai bahut sapna sajaya tha, mere neta lalu ji ko kendriya mantrimandal me mantri pad milega,lekin kangressiyo ne aisa nahi kiaya. mai dipreson me dusra sapna dekhne laga....
लालू और पासवान एक दूसरे की कान्हे पर हाथ रखले, दिल्ली की राह पर गुनगुनात रहलें- ‘दो दिवाने दिल के.’। दिल्ली में ‘सिंह इज किंग’ कù मंत्रीमंडल विस्तार कù खेल होत रहल। लालू बीच राहि में ही पासवान के भुलकी मार के दस जनपथ पहुंच गइलन। पासवान गावे लगलें- ‘लालू भइया, तू बड़ा दगाबाज निकला’। हांफत-डांफत पासवान भी दस जनपथ पहुंचले, एकरा पहिले ही लालू सात रेस कोर्स में डेरा डाल के गुनगुनात रहलें-‘रेल मंत्री हो जइहे भइया तोहरे लालू, एसी में चलिहù जा टिकट लेके चालू’। येही बीचे मनमोहन विस्तार की नाव पर ‘कुछ साफ-सफाई, कुछ नया धराई’ कù कोरम पूरा कù दिहलन। लालू-पासवान दूनो की अरमान पर पानी फिर गइल। पासवान दाढ़ी खजुआवत कहलें‘ . आ जइहन जब नीक दिन, बनत न लगिहे देर’। लालू मुड़ी निहुरवले रास्ता में मिललें। पासवान बोललें-लालू भया, तोहरे वजह से हमरो काम खराब हो गइल। देश में चारो ओर भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार के शोर होत बा, येह बीचे तूं काहे कù मंत्री बनला के सपना देखे लगलù। लालू बोललें-चुप्प बुड़बक। जरला पर फोरन डारत हवे। चलù हम खटाल खोल लेत हई, तू ताड़ी कù दुकान। इ नेतागीरी-ओतागीरी छोड़ दिहल जा। पासवान समझवलें- वक्त के नजाकत समझù लालू भइया। हम्मन से खाली नेतागीरी कù दुकान चल सकेले। पासवान दिल्ली में ही रहि गइलें, लालू पटना अइलें। अपने घर की गेट पर ज्यों पहुंचलें,त्यों मलकिन से भेंट हो गइल। मिसिरी अइसन बोली आज बंदूक की गोली अइसन निकरे लागल। आ गइलें रेल मंत्रालय लेके.। मंत्रालय हाथ में रहे तù हमरे नैहर ले रेल लाइन दौरावत रहलें.। देवरिया से हथुआ ले छुकछुकिया चलावेवाला रहलें.। गइल रहलें हंù दिल्ली.। आठ करोड़ बिहारी लोग के नाक कटा दिहलें.। हाथ पसरलें.।  हम बेर-बेर बरिजत रहलीं., सोनिया की शरण में गइले कुछ ना भेटाई., राहुल के पकड़ù., सरकार में उनहीं के चलता.। कहत रहलें, राहुल चार दिन कù लवंडा से हम बात नहीं करेगा। लालू बोललें-ए बकबकाना बंद करù.., हम बिहार में ही अलख जगायेगा.., पार्टी को मजबूत करेगा.., कांग्रेस को उसकी औकात बतायेगा..। पांड़े बाबा कविता गुनगुनात रहलें- रावड़ी अंगारा हुई, ऐसा समय का खेल। मनमोहन विस्तार में लालू हो गये फेल।। दस जनपथ मिलते रहे,बहुत लगाये सोर्स। धावत धोती ढील भई सात रेस कù कोर्स।। पासवान ने तुरत मढ़ा, लालू पर एक आरोप। दोस्ती में अलकतरा लगा दिया तू छूरा घोंप।। अपने तो डूबे भया, हमको दिये डूबाय। आठ करोड़ बिहारी भइया मंद-मंद मुसकाय।।

सोमवार, 11 जुलाई 2011

बकरे का भाग्य



कोई मरता है तो कफ़न भी नसीब नहीं होता .देवरिया में एक बकरे का ऐसा भाग्य की ३३ किलोमीटर की शवयात्रा निकली और देवरिया के  रामपुर चंद्रभान से बरहज तक गूंजा <राम नाम सत्य है >.उसे बरहज के सरयू तट पर वैदिक मंत्रों के साथ  जल समाधी दी  गयी .मामला रामपुर कारखाना के गांव रामपुर चंद्रभान का है।
 नि:संतान दंपति गोबरी का अति प्रिय बकरा बालमती बीमारी के बाद रविवार को मर गया। । वे उसे 22 साल से पाले हुए थे। बकरे से उनका बेटे जैसा लगाव था। उन्होंने उसका बीमा करा रखा था। यह दृश्य देखने बहुत लोग जुटे थे। आमतौर पर लोग बकरा- बकरी या तो व्यवसाय के लिए पालते है या फिर उसका मांस खाने के लिए। पर गोबरी का प्रेम अद्भुत था। उसने बकरा पालकर औलाद न होने का गम कम कर लिया था। उसके लिए अलग बिस्तर, बेहतर चारा का इंतजाम था। बकरा भी दंपति के हर संकेत समझता था। उसका 50,000 का बीमा भी करा रखा था। पर 22 वर्षों का यह साथ रविवार को छूट गया। उन्होंने ट्रैक्टर ट्राली पर बैंड बाजे के साथ उसकी शव यात्रा निकाली और नदी में प्रवाहित कर दिया। इस अद्भुत दृश्य को देखने श्मशान घाट पर भीड़ जुट गई थी। कोई इसे पुनर्जन्म के रिश्ते से जोड़ रहा था तो कोई गोबरी के पशु प्रेम की तारीफ करते नहीं अघा रहा था। बातचीत में दुखी गोबरी ने बताया भी कि बालमती (बकरे का यही नाम रखा था) उसके लिए बेटे के समान था। 16 दिन बाद वह उसका ब्रह्मभोज कराएगा। बताया जा रहा है की बकरे का 50 हजार का बीमा था .वह अब गोबरी को मिलेगा . गोबरी का कहना है की मांसाहार पाप है .
- नर्वदेश्वर पाण्डेय , रास्ट्रीय सहारा , गोरखपुर

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

उसे बालिका बधू बना लिया

धन लोभियों ने एक लड़की का हाथ रस्सी से बांध क़र जबरिया उसके मांग में सिंदूर डलवा दिया . १० वर्षीय मराछी कुशीनगर जिले के नेबुआ नौरंगिया थाना के नर्चोचवा के रामलोचन कुशवाहा की बेटी है . गाव के ही वाशिन्द्र ने अपने बेटे पंडित उम्र ११ वरस से पुरामछाप्रा पिजावा स्थान कुटी पर ले जाकर मराछी का हाथ पीछे कर रस्सी से बांध कर अपने बेटे से जबरिया सिंदूर डलवा दिया . और उसे बालिका बधू बना लिया . लड़की के माँ को कचहरी ले जाकर उसकी जमीन भी लिखा लिया . लड़की के बाप रामलोचन ने पुलिस में तहरीर दिया है . रिपोर्ट नहीं लिखी गयी है. यह है हमारे समाज का घिनौना चेहरा ...
नर्वदेश्वर पाण्डेय , रास्ट्रीय सहारा , गोरखपुर

एक सवाल का जवाब दो राहुल

यूपी में दलालों की सरकार : राहुल
 किसान संदेश यात्रा के तीसरे दिन गुरुवार को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के तेवर माया सरकार के खिलाफ और तल्ख हो गए। करीब 21 किलोमीटर पदयात्रा के दौरान राहुल ने कई गांवों में छोटी-छोटी सभाओं को संबोधित करने के दौरान कहा, यूपी में दलालों की सरकार है।
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एक सवाल का जवाब दो राहुल -दलालों की सरकार को दाना पानी देकर तुम्हारी ही सरकार जिलाए है . यदि यूपी की  सरकार से इतनी नफ़रत है तो बर्खास्त करा दो . जनता उब चुकी है .
हम अपनी ब्लॉग पर राउर स्वागत करतानी | अगर रउरो की मन में अइसन कुछ बा जवन दुनिया के सामने लावल चाहतानी तअ आपन लेख और फोटो हमें nddehati@gmail.com पर मेल करी| धन्वाद! एन. डी. देहाती

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