गुरुवार, 27 मार्च 2014

राजनीति के धुआं-धुक्कुन धइले बा बहरबांसू..

मनबोध मास्टर का बहुत कोफ्त बा। लहर पर कहर बन के कलह गिरल बा। कलह के भी कारण होला। जब एगो अनार रही आ सौ जने बीमार रहिहन त इहे होई। कबो-कबो त लहर उठेला। सत्तहत्तर में उठल रहे। सैंतीस साल बाद फिर उठल बा। लहर त बा लेकिन चुनाव पहिले ही कलह भी कम नेइखे। सत्तहत्तर में अइसन कलह चुनाव पहिले ना रहे भले बहत्तर चोंप पर खड़ा तंबू चुनाव की कुछ दिन बाद भहराइल। इ लोकतंत्र के तकाजा ह। सेवा खातिर टिकट मांगल जाता। जीतते मेवा खाइल शुरू। चुनाव की पहिले जनसेवक आ जीतला की बाद लोकतंत्र के राजा। विरोध के बाजा अनासो ना बाजत बा। ‘नाथ जी’ कई जने के ‘बे-नाथ’ बनावला पर लागल हवें। नाराजी के दौर, नया-नया ठौर। उल्टी गंगा बहावल जाता। बनारस वाला के कानपुर में पटकल जाता। गाजीपुर वाला देवरिया उतारल जाता। डुमरियागंज में पल्टीमार पर तकरार। इलाहाबाद में केशरी त अयोध्या में कटियार कुपित। बस्ती ना मिलले वेदांती लाल-पीयर। लखनऊ से टंडन टकसा दिहल गइलन। जौनपुर में अनुराग के राग बदल गइल। आडवाणी, जोशी, जसवंत, सुषमा, चिन्मया, लालमुनी चौबे, सुभाष महारिया, महादीपक शाक्य, शाही, जनरल, जिप्पी, जयप्रताप..। लमहर फेहरिस्त बा। ‘ नाथ जी’ से बसा एगो सवाल- इ लोग पार्टी के वफादार स्तंभ ना ह? घर के जोगी जोगना आन गांव के सिद्ध। संघर्ष, सेवा, निष्ठा के महत्वहीन बना के पल्टीमारन पर विश्वास। एहीसे होता सत्यानाश। अन्जाम का होई? आगाज में अनुशासन तार-तार । अनुशासित कहाये वाली पार्टी में नाराज कार्यकत्र्ता अध्यक्ष जी के पुतला फूंकत हवें, मुर्दाबाद के नारा लगावत हवें। असली-नकली के द्वंद्व उठल बा। पार्टी के केतना फायदा पहुंची? जनसेवा, समाजसेवा आ राष्ट्रसेवा खातिर ही यदि नेतागिरी बा त स्वहित छोड़ के जनहित, पार्टीहित, समाजहित आ राष्ट्रहित की बारे में सोचल जा। राजनीति की धुआं-धुक्कुनधुंध में अपना-पराया के पहिचान मिट गइल बा। ‘नाथ जी’ की चलते ही ‘महराज जी’ के भी पुतला फुंकाइल, मुर्दाबाद के नारा लागल। इ कम क्षोभ के बात ना बा। समय रहते स्थिति ना सम्हरायी त निरादर आ अपमान की आग में बहुत नुकसान होई। बहुत लोग से पुछलीं- भइया! पार्टी के कवन रोग धइले बा? जवन जवाब मिलल, उ दु लाइन में- 
ओझा-सोखा, वैद्य-तांत्रिक, बात कहें सब धांसू। 
पार्टी के ‘पछेड़’ करत बा, धइले बा बहरबांसू।।
- मेरा यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 27 /3 /14 के अंक में प्रकाशित है।

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

बांटत टिकट, विकट विरोधा..

मनबोध मास्टर के सियासी फगुआ लगता बुढ़वा मंगल की बाद ले चली। नेतन के टिकट कटले पर अइसे बुझात बा जेइसे नटई कटा गइल। सेवा की मेवा से वंचित नेता टिकट कटते किटकिटा के दांत पीसत अपने पार्टी की अध्यक्ष के कच्चे चबा जाये वाला नजरिया से खूब पुतलादाह करावत हवें। हाल उ बा जइसे- ‘ बांटत टिकट, विकट विरोधा। अपने दल पर, करते क्रोधा।’ कुछ लोग अइसन समय पर पाला बदलल जइसे सरसई धरत आलू पर पाला, लहलहात सरसों पर लाही आ किकोरा पकड़त आम पर किकुरा। होली के खुमारी उतर गइल, चुनाव के चढ़ गइल। देवरिया में दु लोग की लड़ाई में तीसरा का लहि गइल। एक जने त चुप बाड़न लेकिन दुसरका जने अपनी लोगन से खूब खुराफात करावत हवें, अपने ही अध्यक्ष जी के पुतला फुंकवावत बाड़न। अध्यक्ष जी के मुर्दाबाद-मुर्दाबाद करावत हवें। सलेमपुर में समाजवादीपुत्र के भाजपाई टिकट पर सब खुश बा। चौदह साल में रामजी वन से लौटल रहलें, एइजा चौबीस साल में भाजपा लौटलि बा चुनाव लड़े। डुमरियागंज में जिनगी भर कांग्रेस के सेवा करे वाला पाल का मलाल रहे कि उनकी हैसियत की हिसाब से पार्टी में जगह ना मिलल। उनहुं की दिल में कमल खिलल। जबले टिकट नइखे कटत तबतक पार्टी से निष्ठा, आ टिकट कटते अपने दल बन जाता विष्ठा। इ कलमुंही राजनीति जवन ना करा दे। जवन महतारी अपनी पुत्तुर की विवाह के निमंत्रणपत्र छपवावे में भी देर करत हई, उहे पार्टी के घोषणापत्र थमा के गली-गली दौड़ावत हई। बेटा के सीएम, बहू के पीएम, भाई के मनिस्टर बनववला की बाद भी संतोष नइखे। कुनबा में केहू बेरोजगार ना रहे एकरा खातिर आजमगढ़ के जमीन जोत-हेंगा के रफारफ करे खातिर आवत हवें। आई, राउर स्वागत बा। समाजवाद के झंडा लहराईं, परिवारवाद के आगे बढ़ाई।

अब कुछ सियासी छंद - 
दिल्ली में दिल ना लगा, अब करेंगे काशीवास।
 खेल बिगाड़ने जो आये, हो उसका सत्यानाश।। 
दो-दो जगह से जो लड़े, जीत के छोड़े सीट। 
ऐसे जीव को क्या कहें, राजनीति के कीट।।

-- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 20 /3 /14  के अंक में प्रकाशित है।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

‘सूर्पनखा’ की नाक की चलते..

मनबोध मास्टर दुखी मन से कहलें- असों होली ना
मनाइब। मस्टराइन पूछली- काहें? उ कहलें- सूर्पनखा की नाक की चलते। बात सही बा। जहां-जहां गड़बड़ बा, बूझीं सूर्पनखा के नाक फंसल बा। हम्मन की प्रेम के, स्नेह के, आत्मीयता के, सहयोग के, सहानुभूति के, उपकार के, उदारता के, देशभक्ति के कवन सिला मिलल? सत्य के सूरज अस्त ना भइल बा, कुछ बादल की टुकड़ा की घेरले अंधकार ना हो जाई। जल्दी ही सब कुछ साफ हो जाई। जनता बुझति बा, समझति बा। इ प्रजातंत्र ह। सिस्टम में कुछ दोष आइल बा। व्यवस्था डंडीमार भइलि बा। धिक्कार बा अइसन अधिकार के जवना के नाहक प्रयोग कइल जाता।
प्रजातंत्र की पेड़ पर कोयल ना अब कौआ किलोल करत हवें। चारों ओर चमगादड़के बोल सुनात बा। न्याय आ अन्याय के अंतर बस एतने रहि गइल बा- ‘जेकर लाठी ओकर भैंस’। बेकारी, बेमारी, बेरोजगारी आ भुखमरी की बीच घनघोर महंगाई में आदमी जीयत बा। बेर-बेर, कई बेर उहे फाटल पेवल सीयत बा। केतना सुग्घर रहे आपन देश भारत। हिंदुस्तान कहल जाता लेकिन हिंदी आ स्वदेशी से परहेज कर के
अंगरेजी आ विदेशी से मोहब्बत करे वाला भी कम ना हवें। विदेशी के चेहरा गोर लउकत बा, हृदय में झांक के देखीं केतना काला बा। सूरत पर गइला के जरूरत ना बा। रामायण काल में भी सुंदरता की चलते बहुत भ्रमजाल फैलावल गइल। तब भी बहुत दिक्कत भइल, आज भी दिक्कत बा। बहरहाल! सूर्पनखा के नाक ना रहित त ‘रामजी’ के पुरुषार्थ के कथा रामायण बन के हम्मन के बीच कइसे आइत। रामचरित मानस लोग कइसे गाइत। सूर्पनखा के नाक ना रहित त राम-रावन युद्ध ना होइत आ
अंत में रावन ना मराइत। नककटैया के लीला, रामलीला में बहुत प्रसिद्ध भइल। आज फिर जरूरत बा नकटी के नाक काट के, नकेल डाल के, नथूना ठेंका दीं। काहें की सूर्पनखा सिंबल ह राक्षसी प्रवृति के। मनुष्यता के बचावे खातिर संकल्प करीं, उठा लीं हथियार आ काट दीं सूर्पनखा के नाक। ‘ ना रही बांस ना बाजीबंसुरी’। अब ये कविता के अर्थ निकालीं। अर्थ के अनर्थ जनि करब, नाहीं त सजो मेहनत व्यर्थ चलि जाई।
‘सूर्पनखा’ की नाक की चलते, ‘देशभक्त’ का मान नहीं।
 बिक गया ‘वो’ किसके हाथों, करता क्यूं सम्मान नहीं।। 
योगदान को भूल गया क्यूं, मद में ऐसा वर्ताव किया। 
अधिकार का दुरुपयोग कर, अतिवादी व्यवहार किया।।
-- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 13 /3 /14  के अंक में प्रकाशित है।

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अंग-अंग फड़कन लगे..



मनबोध मास्टर मगन हवें। दिन बहुर गइल। वोटर के दिन, सपोर्टर के दिन। सोलहवीं लोक सभा के महासमर के घोषणा हो गइल। जइसे नौ माह में बच्चा पैदा होलन वइसे नौ चक्र की मतदान की बाद नवकी सरकार पैदा होई। वोटर के बुझौवल बुझावल जाता। तुरुप के पत्ता केकरा लगे बा? भइया वोट की चोट से भ्रष्टाचार मिटावे के बा त प्रत्याशी के पूरा वायोडाटा पढ़ी। केकरा पर केतना मुकदमा? दलन की दलदल में जन फंसीं। महामुकावला में आरोप के गुब्बार उठी। चुनावी खुमार चढ़ी। सिद्धांत, ईमान, सेवा सजो सत्ता की कुरसी की पाया तरे दबावला के प्रयास होई। दिल मिली ना मिली हाथ मिलावत लोग मिली। चारो ओर जय जयकार की शोर से सराबोर लोकतंत्र के उत्सव मनावल जाई। वइसे जइसे होली के कबीर। विनम्रता के मुखौटा लगा के एक से बढ़कर एक बदतमीज अइहें, हम्मन के लुभइहें। पांच साल खातिर उनकर दिवाली हमार दिवाला। फेर महंगी के मार। हर बोल के मोल समझे के परी। बोल भी अनमोल मिली। एक से बढ़के एक झोल मिली। सबकर आपन-आपन ढोल रही। ओ ढोल में अंदर पोल रही ऊपर खोल रही। जवना जनता की बू से सफेदपोश परेशान रहलें उहे खुश-बू। हथजोड़ी के दौर, दंतनिपोरी के दौर। भइया अबकी बारी हमरी पर कृपा। वोटर निर्मल बाबा की राह पर निकर जइहें। सब पर कृपा बरसइहें। अबकी बेर वोट मशीन में एगो नवका बटन भी आ गइल- नाटो। राजनीति के खिलाड़ी आपन खेल बना सबकर खेल बिगाड़े के तैयारी में लाग गइलें। चोटी-लंगोटी वाला, दाढ़ी-टोपी वाला सबकी पर स्नेह के बरखा बरसावल जाई। मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत जी कार्यक्रम घोषित क दिहलें। 543 लोकसभा सीट खातिर बिगुल बजल बा। दल सजल बा। रउरो जागीं। अंग-अंग फड़काई। घर में जनि अलसाई। बूथ तक जाई आ अपनी पसंद के बटन दबाई। राउर इ बटन 16 मई के बता दी केकरा में बा केतना दम। राउर इ बटन दे दी संसद में चिल्लाये के अधिकार, आ नवकी सरकार। 
अब इ कविता- 
अंग-अंग फड़कन लगे, जब बजा चुनावी चंग। 
चढ़ल चुनाव बजल दुंदुभी, आपन-आपन ढ़ंग।। 
महासमर में उतर रहे, योद्धा लेय उमंग।
 मतदाता की मनमंदिर में,उठ रहल बा बहुत तरंग।।

- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 06/3 /14  के अंक में प्रकाशित है।

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

केहु चाय पियावत बा केहु दूध पियावत बा

मनबोध मास्टर घर से निकल के ज्योंही चौराहा पर अइलें,कुछ उज्जर कुरता वाला लोग भेटइलें। घेर के हथजोड़ी कइलें, एक गिलास दूध हाथ में धइलें। बोललें-पी लीं, पी लीं। स्वास्थ्य बनल रही। मास्टर बोललें- भइया! हम जतरा पर निकरल हई, दूध पी के जतरा कइले खतरा होला। ‘ दूध बंटवन’ से गला छोड़ा के मास्स साहब भगलें। दिमाग में एक-एक लोग के चेहरा नाचे लागल। सबके चिन्हन हई। इ कवन चाल चलत हवें लोग। ना गाय पललें, ना भैंस-भेड़-बकरी। फेर एतना दूध मुफ्त में काहें बंटात बा। लगता देश में श्वेत क्रांति आ गइल। सतयुग लौट आइल। दूध के नदी बहे लागल। चलीं अच्छा भइल, चालीस रुपया लीटर के पनछुछुर दूध खरीदला से मुक्ति मिली। अब खांटी मिली। हर चौक-चौराहा पर स्टॉल लगाके दूध पियावल जाई। जे पियला में आना-कानी करी ओकरा घरे पोलियो ड्राप जइसे दूध के खुराक पहुंचावल जाई। गावल जाई- पी ले पी ले हे मोरे राजा, पी ले पी ले ए मेरे जानी। अब फ्री के जमाना आ गइल। एक पर एक फ्री। कहीं चाय फ्री त कहीं दूध। भइया अपन तो सीधा-साधा फंडा ह, अगर कहीं फ्री त बुझिहù कुछ गड़बड़ बा। फ्री आ फाड्र के अंतर बुझला में बहुत बुझदानी-समझदानी के जरूरत बा। गांव-देहात में शिक्षा फ्री भइल त लोग अपनी लरिकन के शहर की महंगा कान्वेंट में पढ़ावे लगलें। सरकारी अस्पताल में दवाई फ्री भइल त लोग महंगा नर्सिग होम में भर्ती करावे सिलसिला शुरू कइलें। फ्री वाली चीज के लोग फालतू बुझे लागल। मास्स साहब बड़बड़ाये लगलें- फ्री मतलब धोखा, जालसाजी, पल्रोभन। इ उ चारा ह जवना के फेंक के वोटर रूपी मछली फंसावल जाता। चौसठ साल से जनता के खून चूसे वाला अगर खैरात बांटे त उनकी दरियादिली के का जनता ना बुझी? बहुत-बहुत नजारा देखे मिली। अब इ कविता-
केहु चाय पियावत बा, केहु दूध पियावत बा।
 सब समझत बा, सब बूझत बा, बेवकूफ बनावत बा।
 केहु मोदी गावत बा, केहु राहुल गावत बा।
 केहु दर्जनभर के मिला के , खिचड़ी खूब पकावत बा।। 
झांसा में मत अइहो भइया, बहुरुपिया धावत बा। 
जे खून चूसले चौसठ साल, उ फेरु भरमावत बा।।
 खैरात बंटत बा चहुंओर, दरियादिली दिखावत बा। 
वोटर भी बुझनेक भये, कहें चुनउआ आवत बा।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 27 /2 /14  के अंक में प्रकाशित है।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

ये मोदी-मोदी क्या है


मनबोध मास्टर के माथा चकरा गइल, जब एगो पत्रकार भाई की सवाल पर सीएम साहब उखड़ के बोललन- ‘ ये मोदी-मोदी क्या है’? सीएम साहब के टोन ‘ ये इलू- इलू क्या है?’ टाइप के लागत रहे। मास्टर मोदी के मतलब समझावत रहलें। मोदी मतलब-नरेंद्र दामोदर दास, चाय वाला, भाजपा के मुखौटा, राजनीति में मकसद के मायने, मीडिया में दबदबा, मिशन 2014, विरोधी दलों का माथा दर्द, 56 इंच की करेजा वाला नेता, माद्दावाला मनई, गुजरात के मुख्यमंत्री.. और भी बहुत कुछ। अब भी ना समझ में आवे त सुनीं- जनता में जोश, जुनून आ जज्बा पैदा करे वाला नेतन की जमात में एगो अलग टाइप के नेता। देश में नेता भाषण सुने खातिर भीड़ जुटावला में पैसा खर्च करेले। आ मोदी मतलब पैसा वसूल। सीट बुकिंग। मोदी मतलब सत्ता की राह के रोड़ा। मोदी के रोके खातिर 11 दल एक में जोड़ा। मोदी मतलब महा मुकावला। अब भी मोदी के मतलब समझ में ना आइल होखे त नेताजी से पूछीं, पप्पू से पूछीं, बहिन जी पूछीं. 2014 के चुनाव केकरा से लड़े जात हवें। मतलब समझ में आ जाई। मोदी मतलब राजनीति के उ खिलाड़ी जवन सबकर खेल बिगाड़े के कइले बा तैयारी। चोटी-लंगोटी वाला त उनकर समर्थक पहिले से ही रहलन अब दाढ़ी-टोपी वाला जुटत हवें। नया फामरूला में खाली जै श्रीराम ना जपल जाई अब दलितन में जगह बनावे खातिर बाबा साहब, बाबू जगजीवन राम, के आर नारायण आ कांशीराम के नाम भी जपल जाई। चलत-चलत एगो उदबेगी खबर बता दीं- बॉलीवुड अभिनेत्री मेघना पटेल मोदी की समर्थन में नवहन के रिझावे खातिर अंग-अंग से कपड़ा उतार के भाजपा के चुनाव चिह्न कमल के फूल से बनल ब्रा आ बिकनी पहिन के जब फोटो ख्ंिाचवली त तरासल बदन निहार के बुढ़ऊ लोग कहलें- अइसन त ना रहल आपन संस्कृति। गोरखपुर की मानबेला में पहिले मोदी रैली कइलन अब सीएम साहब, इहे होला मतलब। उ जहां-जहां जइहे इ उहां-उहां ना जा पइहें। मोदी पूरा देश घूमत हवे आ सीएम साहब के दायरा यूपी में सिमटल बा। जब हर सभा में सब दल मोदी के ही टारगेट पर रखलें होखें , आ नेताजी आ सीएम साहब के हमला भी मोदी पर रहे त मतलब साफ बा, मोदी के मतलब रउरा सभे बुझते हई फिर काहें पूछत हई- ये मोदी-मोदी क्या है ?
अब इ कविता- 
मतलब मोदी के समझवलीं, हम ना मोदीवादी हैं।
 जो सच है वह सुना दिया, ना वादी ना प्रतिवादी हैं।। 
जै श्रीराम को जपने वाले, बाबा, बाबू कांशी जपें।
 सबका खेल बिगाड़ेंगे ये, अब कौन कहे मनुवादी हैं।।

नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह  भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 13 /2 /14 के अंक में प्रकाशित है


मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

आज गोरखपुर जंकशन खाक हो गया होता

बाबा गोरखनाथ की कृपा से गोरखपुर जंकशन खाक होने से बच गया।  प्लेटफार्म नंबर छह -सात के बीच लाइन नंबर 11 पर एक बोगी में आग लग गयी।  बोगी धू -धू  कर के जलने लगी।  सुरछा में केवल यात्री , कुछ कर्मचारी और आरपीएफ के जवान दिखे।  अधिकारियो के कम ही दरसन हुए।  बगल की लाईन नबर 13 पर पेट्रोलियम भरे 60 टेंकरो में यदि आग पकड़ ली होती तो गोरखपुर का एक बड़ा हिस्सा भस्म हो गया होता।  घटना के कारणो का पता नहीं लग पाया है। रेलवे परामर्श दात्री समिति के सदस्य होने के नाते हम घटना की उच्च स्तरीय जांच कि मांग करते है और सँरछा के लिए दोषी अधिकारियो पर कठोर कारवाई की मांग करते है।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

खूब लगाये रेस, भैंस को खोज


मनबोध मास्टर शुरू से ही भैंस के समर्थक रहलें। जव भी कबो अक्ल आ भैंस में बड़वर कौन? के सवाल उठे, त हमेशा भैंस के बड़वर बतावत रहलें। कबो-कबो अपनी मोट मेहरी के भैंस कहला में ना सकुचात रहलीं। भैंस की सहनशीलता भी बेजोड़ ह। केहू केतनो बीन बजाओ, उ त पगुरइबे करी। भैंस हमेशा लाभकारी रहल। जवन दूध दिहलसि ओकरे सहारे पानी भी दूध के दाम बिक गइल। भैंस मरल त बनल जूता आ अक्ल मरल त मिलल जूता। अक्ल के रूप-रंग के देखले बा? भैंस के रूप-स्वरूप सामने बा। सोशल साइट पर भैंस र्चचा में बहुत कुछ सुने- गुने-धुने के मिलल। इ मन के विकार ना आपन-आपन विचार ह। अखबारी जीवन में जब भी भैंस चोरी के कवनो मामला आवे, इ कह के टरका देत रहलीं - ‘ इहो कवनो खबर ह’। हमरो अक्ल घास चर के लौटल जब अखबार से लेके टीवी तक आ सोशल साइटन पर भैंस चोरी की घटना के र्चचा चलत रहे। इ कवनो कटाक्ष ना, कवनो उपहास ना। हकीकत के बात बा। मंत्री जी के भैंस चोरी भइल। यूपीपी के शाबासी देबे के चाहीं। सैकड़ों गुमशुदगी में बरामदगी शून्य आ फरार अपाराधिन के पकड़ला की मामिला में आंख मून वाली पुलिस महज 36 घंटा में मंत्री जी की तबेला से गायब भैंस के खोज निकरलें। मंत्री जी के भैंस सामान्य भैंस ना, वीआईपी भैंस होले। तबे त भैंस खोजे खातिर एसपी लगलें, एएसपी भगलें, सीओ जगलें, कई थाना के फोर्स लागल, क्राइम ब्रांच, डॉग स्क्वॉयड, खुफिया..। मतलब की पूरा महकमा भैंस की पीछे। भैंस खोज निकरलें, फिर भी एगो चौकी प्रभारी आ दु सिपाही नपा गइलें। खैर, सोशल साइट पर बहुत प्रतिक्रिया अइली। गुदगुदावे वाली कुछ प्रतिक्रिया सुन के हम इ कहब‘ हेलल-हेलल भइंसिया पानी में..’। एक जने कइलें-भैंइसिन के जेड प्लस सुरक्षा मिले के चाहीं। दुसरका जने कहलें- इ बीन की आगे पगुरावे वाली भैंस ना रहली, इ राजनीतिक रूप से जागरूक भैंस रहली, दिल्ली में आप के टिकट मांगे गइल रहली। तीसरा जने कहलें- मेरठ में मोदी के रैली देखे गइल रहली। चौथा जने कहलें- पुलिस के नाक आ नौकरी के बात आइल त भैंस लौट अइली। और भी बहुत कुछ., लेकिन एगो सवाल त साफे हो गइल- जिसकी लाठी उसकी भैंस। पुलिस फामरुला में बहुत पर्दाफाश देखले होखब, जेमे चुहिया भी हाथी हो जाले। अब इ कविता- 
यूपी में चर्चित भइल, भला भैंस के केस। 
पुलिस महकमा जुट गइल, खूब लगवले रेस। 
नाक आ नौकरी की चलते, भैंस के खोज निकारे।
 तबहुं तीन पुलिसकर्मी, नप गये बेचारे।।

- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह  भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 06 /2 /14 के अंक में प्रकाशित है. 

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

सियासती धुंध में लोक लुभावन बरसात

मनबोध मास्टर के चश्मा से सियासती धुंध लउकत बा। येह धुंध में लोक लुभावन
बरसात होत बा। दिल्ली दिल खोल के त लखनऊ बड़-बड़ बोल बोल के चुनावी चाशनी
से पगल खैरात बांटत बा। लोग कहेलें नाम बदलला से का होला? काहें ना होला,
ना होइत त रानी लक्ष्मीबाई के नाम के वॉय-वॉय कर के समाजवादी पेंशन के
कांव-कांव ना होइत। आसमान में धुंध बा, लोक किकुरल बा लेकिन सियासत की
द्वंद्व में बहुत गरमी बा। येही गरमी में गोरखपुर की मानबेला में एक जने
गरज गइलें त दूसरका जने बरसे की तैयारी में हवें। जवना शिक्षामित्र लोग के
कई बार लखनऊ में लाठी सेवा भइल ओह लोग के अब बल्ले-बल्ले। बांट भइया, बांट
भइया खूब रसगुल्ले। कहीं इ सियासतबाजी ना हो जा। देश में घोषणा, अमल, अदालत
के चक्कर में बहुत मामिला पिसा के ठीक हो जालें। चुनावी मौसम देख के
राजनीतिक दल दिल खोल के दिलदारी देखवावत हवें। आस्तिन चढ़ावे वाला पप्पू
भइया के बोल तबसे बदल गइल जबसे मौनी बाबा उनके हरियर झंडी दे दिहलन। फैसला त
जनता की हाथ बा। मौनी-मैना की बोलले का होई? जवन लोग साठ साल में देश के
तरक्की ना करा सकल उ तीस दिन में दिल्ली की छोटकी सरकार से हिसाब लेत बा।
दिल्लीवालन के का कहल जा। जेके लोग अंगुठी के नगीना बुझत रहलें उ कइसे नाक
के पोंटा हो गइल? राजनीति के सफेद जरायम बुझत में जनता हमेशा ठगा जाति बा।
कभी ओकरा हाथे त कभी दूसरा की हाथे। जनता के सुनते के बा? अगर सुनत त डेढ़
सौ चिट्ठी लिखला की बाद भी सुनवाई ना भइला से नाराज लोग बुधवार की दिने
मौनी बाबा की विज्ञान भवन में आयोजित वक्फ विकास निगम की कार्यक्रम में
हंगामा ना करितन। झाड़ू से भ्रष्टाचार मिटावे के संकल्प करे वाला आम आदमी
अब चंदा के जानकारी दिहला में भी कतरा ता। आज मौनी आमवस्या ह। मुंह खोलला
की पहिले नहा लिहला के जरूरत बा। नहइला की दौरान मुंह से आवाज ना बहरिआई त
बहुत पुन्य होई। नहा-धो के तैयार हो जाई। मुंह खोलीं चाहें ना खोलीं। बोलीं
चाहें ना बोलीं लेकिन विचार के मंथन अंदर ही अंदर चले दीं। येही मंथन से
निकरल अमृत लोकतंत्र की जीवित रखी। देश में मोदी के लहर भले चलत होखे,
शंकराचार्य स्वरूपानंद की निगाह में मोदी हिंदुत्व खातिर बड़वर खतरा हवें।
येह पर रउरा सभे सोचीं। हम कुछ ना बोलब। आज मौनी आमवस्या ह।


- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह   भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 30 /1 /14 के अंक में प्रकाशित है. 

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

न मिलता सिंहासन, चाहें कितना भी रोते..

मनबोध मास्टर की कपार पर आज फिर एगो ठीकरा फोरा गइल। मास्टर के कपार बरियार
ह, काहे की उ मीडियावाला हवें। लोकहित की चाह में आज गली-गली मुफ्तखोरी के
चाय पीये के मिलल। आज ले छुंछ पानी भी ना पूछत रहलें। विकास के बाजा बजा
के राजा बने की युगत में के ना लागल बा? कबो रानी जी, कबो महरानी जी, कबो
बेटिंग आफ पीएम, कबो एगो सीएम, कबो केहू-कबो केहू.। मीठा-मीठा त गप्प हो
जाता, तनिसा कड़ुआ भइल की मीडिया के दोष। मीडिया गांव के करिमना हो गइल बा।
जवना की बारे में कहल गइल-‘ रहल करिमना त घर गइल, गइल करिमना त घर गइल।’
लोकतंत्र के जनतंत्र, भीड़तंत्र, धनतंत्र, लट्ठतंत्र, धर्मतंत्र,
मर्मतंत्र, कुकर्मतंत्र,बेशर्मतंत्र आदि कई तंत्र की रूप में बदलत बहुत
करीब से देखले बा करिमना। देखले त मनबोध भी बाड़न लेकिन उनकी ऊपर जवन
मीडियावाला के ठप्पा लागल बा, ओहसे बहुत बच-बचाके बतावेलन। सत्ता के स्वाद
चीखते आदमी के चाल , चरित्र, चेहरा बदलत लउकत बा। देश में ईमानदार दिखला के
होड़ लागल बा। अच्छा बात बा, बेईमान आ बेईमानी खत्म हो जा त का बुराई बा।
कपार पर उज्जर टोपी पर कुछ करिया अक्षर लिख के पहिन लिहले का सचहूं
ईमानदारी के सर्टिफिकेट मिल जाई? का सचहूं चरित्र उज्जर हो जाई? देश से
भ्रष्टाचार मेटावे खातिर सब आगे आवता। कई जने के चेहरा देखते याद आ जाता
उनकर लड़कपन, जवानी आ ढलानी के कहानी, नादानी, शैतानी, बेईमानी..। हंसी
आवति बा। सरकार , सरकार से लड़ति बा। दु दमदार की लड़ाई में नुकसान त जनता
के ही होई। लड़ला-लड़ावला की लटका-झटका से का सुशासन लौट आई। सत्ता में रह
के धरना-प्रदर्शन के बात कवनो नया ना बा। बहुत हल्लाबोल टाइप के नौटंकी
देखल गइल। दिल्ली में आम आदमी सत्ता पा गइलें,फिर काहें आम आदमी परेशान बा?
शासन में अइला की बाद अनुशासन से काम करे के चाहीं। विरोध त विरोधी की
बखरे छोड़ देई। दिल्ली के सरकार मीडिया पर खिसिआइल बा। खिसियाइल त यूपी के
एगो मनिस्टर भी बाड़न। भईया! आईना पर दोष काहें लगावत हवें। जेइसन चेहरा
रही ओइसने मोहरा दिखी। दिल्ली के सरकार बनवला के दोष भी मीडिया पर ही लागल
रहे। अब एगो कविता-

मीडिया न होता, तो सरकार नहीं होते।
 सिंहासन न मिलता,
चाहें कितना भी रोते।। 
कह रहे मीडिया आधा कांग्रेसी, आधा भाजपाई है। 
हम
कहते हैं, यह पूरा का पूरा मौकाई है।। 
आईना का क्या दोष, जो देखा बता दिया। 
मीठा तो बहुत हुआ, थोड़ा मिर्चा चखा दिया।। 
गालियां बको या बददुआ दो,
मिटेगा न मीडिया। 
जब भी कुछ कहोगे, सामने ही होगा मीडिया।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती  भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 23 /1 /14 के अंक में प्रकाशित है 

बुधवार, 22 जनवरी 2014

बुढ़िया की मरला के ना, दइब की परिकला के डर बा

बुढ़िया की मरला के ना, दइब की परिकला के डर बा मनबोध मास्टर कहलें- बुढ़िया की मरला के ना, दइब की परिकला के डर बा। येही डर से पीड़ा बा। लोग के मन सहम जाता। राजधानी में कई जने के पानी थहला की बाद नौवजवानन में जवन जज्बा पैदा भइल बा उहो लोग की चिंता के कारण बा। देश में आप के पल्राप चलता। कई लोग घोर संताप में पड़ गइल हवें। कहीं सरक ना जाये, कहीं घिसक न जाये, मेरे सिंहासन की शान रे..। भीषण शीतलहर के प्रकोप बा लेकिन राजनीति के कुड़ुकल मुर्गी आजकल अंडा ज्यादा देत हई। अंडा की साथ ही करिया झंडा के डिमांड बढ़ गइल बा। कई जगह ईट-पत्थर-डंडा भी.। दिल्ली में आम आदमी जवन अब खास बनल बा, खांसता त देश के सियासत हांफति बा। कई जगह त शीशा में अपनी परछाहीं की जगह आप के परछाहीं देख के लोग चिहुक जाता। सैफई में हीरो-हीरोइन की डांस पर, त पडरौना में मंत्री जी की ठुमका पर सवाल। सवाल जनता ना सियासतबाज उठावत हवें। जनता नयापन की उम्मीद में उंघइला से जागलि बा। एगो लहर उठल बा। जवना में वंशवाद के बहववला के ज्वार उमड़त बा। बड़े-बड़े अधिकारी, मीडिया कारोबारी, डॉक्टर- प्रोफेसर.. सरसरात समात हवें। शहर में प्रबुद्ध लोग के वॉकयुद्ध चलता लेकिन गांवन में अबो जाति-बिरादरी के बाति बतिआवेवाला लोग कहता- सराहल धीया.. ( एगो जाति विशेष, जवना के अछूत कहल जाला) घर जाली। गांववाला कहलें- हम्मन गांधी बाबा की जमाना से देखत हई। ठगे-ठगे बदलक्ष्या होता। कवो उ ठगता, कबो इ ठगता। शहर के लोग के कहता- आजादी के दूसरा जंग शुरू बा। भ्रष्टाचार , सांप्रदायिकता, जातिवाद, भाई-भतीजावाद के मार के भगा दिहल जाई। नैतिक साहस की बल पर अमेठी अइसन गढ़ में एगो कविहृदयी ललकारत बा। भाड़ा के लोग ओकरा ऊपर अंडा मारत बा। अंडा के फंडा भी कहीं प्रचार के जरिया न बन जाये काहें कि मरला की बाद भी कई अंडा फूटत ना बा। अब अंडा चलो चाहें डंडा। झंडा त ऊंचा होखबे करी। धंधा-पानी खत्म भइला की आशंका में सजो मौसेरा भाई एकजुट होके नवका लहर के रोके की षड़यंत्र में लागल हवें। मौजूदा हालात पर बस एगो कविता, जवना के अर्थ अपनी-अपनी हिसाब से निकारीं- 
शीतलहर में बह रही, यूं कुछ गरम बयार। 
बेवजह भी हो रही, अंडों की बौछार।। 
स्वेटर, मफलर, टोपियां, खांस रहे हैं आप। 
सहन नहीं क्यू हो रहा, उनको यह पल्राप।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती  भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 16 /1 /14 के अंक में प्रकाशित है

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

रउरी हाथे ही हो जाई, लोकतंत्र के शुद्धिकरण..

मनबोध मास्टर की कपार पर आज फिर एगो नवका टोपी चढ़ गइल। आजादी की लड़ाई में गांधी बाबा की कपारे भले कम लउकल लेकिन गांधीवादिन की कपार पर ज्यादा लउकल गांधीवादी टोपी। नेताजी के टोपी आजाद हिंद फौज के टोपी रहल। देश आजाद हो गइल लेकिन नेताजी की मौत से रहस्य के पर्दा आज ले ना उठा पवलें टोपीधारी लोग। भगत सिंह वाली टोपी पहिनले से केहू क्रांतिकारी ना हो सकेला। भगत सिंह त देश खातिर फांसी चढ़ गइलें। रमजान की महीना में रंगिबरंगी टोपी लउकेली। रोजा न रहे लेकिन कपार पर जालीदार टोपी पहिन के कुछ हिंदूवादी लोग भी अफ्तार कइला से ना चुकेलन। टोपी मान ह, सम्मान ह, निशान ह, पहिचान ह। टोपी की प्रकार पर बात कइल जा त बहुत विस्तार हो जाई। मौसम की मिजाज से भी लोग टोपी के चयन करेलन। बरसात में बरसाती टोपी, गरमी में धूपी टोपी आ इ जवन जाड़ा चलत बा येहमा मंकी टोपी ही लउकत बा। कई लोग के मुंडी पर शौकिया हिमांचली टोपी, राजा मंडा वाली टोपी, क्रिकेटवाली टोपी आदि बहुत प्रकार के टोपी शोभा देली। आज कल एगो खास टोपी आम आदमी की कपार उग आइल बा। देश में टोपी उछलउअल के खेल होता। टोपी राजनीति में समइला के भी जरिया बा। आखिर हरज का बा। टोपी पहिन सत्ता में समाई फिर टोपी के उल्टा कर के पीटो -पीटो। धन पीटो। दौलत पीटो। मोटर-गाड़ी, बंगला-लॉकर पीटो। टोपी-टोपी, पीटो-पीटो करत एगो साम्राज्य खड़ा कर दीं। फिर वंशवाद के वेल बढ़ाई। लोकतंत्र की नाम पर राजतंत्र चलायीं।आंख उठाके देखीं, येही वंशवाद की चलते सत्ता कुछ परिवारन की हाथ के खिलौना बन के रहि गइल बा। सब बदलाव चाहत बा, लेकिन एगो नियम बनावला के बात केहू ना उठावत बा कि जे लोकतंत्र के राजा चुना जाई ओकर भाई-भतीजा-भांजा, चचिआउत, पितिआउत, मौसिआउत, फुफुआउत, ममिआउत चाहें कवनो आउत होखे राजनीति में समइला पर प्रतिबंध रही। अगर अइसन नियम बन जा त राजनीति पवित्र हो जाई। इ परिवर्तन रउरी एगो वोट से हो सकेला। वोट माने मत। मत माने बुद्धि। त आई संकल्प कइल जा अपनी बुद्धि के हरण ना होखे दिहल जाई। अब इ कविता-
 रउरी हाथे ही हो जाई, लोकतंत्र के शुद्धिकरण। 
बहुत-बहुत बहुरूपिया अइलें, सबकर हो गइल अनावरण।। 
 सत्ता पवते के ना कइलें, मद-मोह आ लोभवरण।
 पैंसठ साल में एतना चूसलें, चौतरफा हो गइल क्षरण।।
 जनता के हथजोड़ी कइलें, पूजववलें फिर आपन चरण। 
रणक्षेत्र शिखंडी निकरल, बूझत रहलीं वीर करण।। 
जाति-धरम के फसल उगा के, कइले बहुत ही वोटहरण।
 कहें देहाती जगों सपूतों, होने ना दो बुद्धिहरण।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 9 /1 /14 के अंक में प्रकाशित है।  

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

गंदगी हटी, लगीं फूल-पत्तियां

गोरखपुर (एसएनबी)। अभी कुछ दिन पहले तक जहां दुर्गध उठती थी, गंदगी तैरती थी रेलवे ने उक्त स्थल को सुरम्य बना दिया। गोरखपुर रेलवे स्टेशन के प्रथम श्रेणी गेट से आने-जाने वाले यात्रियों को प्रतिदिन इस दुर्गध और गंदगी का सामना करना पड़ता था। गत 17 दिसंबर को क्षेत्रीय प्रबंधक जेपी सिंह की अध्यक्षता में हुई रेलवे परामर्शदात्री समिति की बैठक में भी गंदगी का मुद्दा उठा था। रेल प्रशासन ने पहले तो गंदगी फैलाने वाले लोगों पर अर्थदंड की कार्रवाई की, जिससे गंदगी कम हुई। अब प्रथम श्रेणी के प्रवेश द्वार को सुंदर व सुरम्य बना दिया गया। रेल प्रशासन ने उक्त स्थल पर तीन ब्रेंच स्थापित कर दिये जहां यात्री बैठ रहे हैं। प्रवेश द्वार के बाहर जालीदार गमले बनाये गये हैं जिनमें अब फूल-पत्तियां लगायीं जा रहीं हैं। प्रवेश द्वार पर एक पुलिसकर्मी की तैनाती की गयी है जो गंदगी फैलाने वाले लोगों पर नजर रख रहा है। जो लोग अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे हैं उन्हें रेल प्रशासन अर्थ दंड भी लगा रहा है। गौरतलब है कि बैठक में परामर्शदात्री समिति के सदस्यों ने अफसोस जताया था कि विश्व के मानचित्र सबसे लंबा प्लेटफार्म बनकर गोरखपुर ने जो गौरव प्राप्त किया उसे यहां की गंदगी धूमिल कर रही है। गंदगी के मुद्दे पर सभी सदस्यों की राय पर अध्यक्षता कर रहे क्षेत्रीय प्रबंधक जेपी सिंह सदस्यों के साथ एसी लाउंज से प्रथम श्रेणी गेट तक पैदल चलकर गये थे और देखकर दंग रह गये कि प्रवेश द्वार के दोनों तरफ लोग मूत्रत्याग कर रहे हैं और उससे दुर्गध उठ रही है। उन्होंने सदस्यों को आश्वस्त किया था कि शीघ्र ही प्रवेश द्वार सुंदर व दुर्गधमुक्त दिखेगा। रेल प्रशासन के प्रयास को धरातल पर देखने पर परामर्शदात्री समिति के प्रो. श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी, नर्वदेश्वर पांडेय देहाती ने क्षेत्रीय प्रबंधक को बधायी दी है और बैठक में उठाये गये अन्य मुद्दों पर भी प्रभावी कदम उठाने की सिफारिश की है।
- the report is published in  rashtriy sahara gorakhpur on 3 january 14

एतना फुहड़पन त ना रहे अपनी भोजपुरी में ... नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती

आपन विचार लिखी..

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

हर दिन हो खुशहाल, मुबारक हो चौदह के साल..

मनबोध मास्टर पुरनका जमाना के मनई। अंगरेजी कलेंडर के नवका साल पर ना चाहत भी बधायी देबे में लाग गइलें। गोरखपुर अइसन गंवई शहर महानगर त बन ही गइल, महानगरी संस्कृति में भी बहे लागल। इकतीस की रात से ही हुड़दंगई के जवन सिलसिला शुरू भइल उ पहली के सांझ तक रहल। सिटी मॉल गुलजार रहल। इंदिरा बाल बिहार में लोग मस्त रहे। फारेस्ट क्लब में धमाल मचल। गोकुल, जेमिनी में सर्द रात गरम हो गइल रहे।‘ एक लैला-तीन छैला’ की तर्ज पर लोग एक दुसरे के हैपियावत रहलें। रिलेशनशीप वाला जोड़ी बिंदास अंदाज में एक दूसरे की कमर में हाथ डलले अइसे घूमत रहलें जइसे इ गोरखपुर ना मुंबई के जूहू-चौपाटी होखे। रात में रेस्त्रां-क्लब आ दिन में पार्क में बल्ले-बल्ले। नवहा-नवही के जोश की आलम में पहली के दिन-दुपहरी में व्ही पार्क आ रेलवे म्यूजियम में जवन मेला रहल उ बेजोड़ रहल। सामने की सड़क ले अंड़सल रहल। गांवन में भी नवका साल के बुखार पहुंच गइल रहे। रात भर डीजे बाजत रहे। डीजे पर एक से एक धुन। हई- लक्ष्की हई हाई वोल्टेज वाली.., लालीपाम लागेलू.., मलाई खाये बुढ़वा.., सैंया अरब गइलें. मिसिर जी तू त बाड़ù बड़ा ठंडा.., लगा देंही हुक राजाजी..सहित अइसन -अइसन गाना जवना के एको शब्द एइजा ना लिखल जा सकेला। लिखल ना जा सकेला लेकिन बाजता। नया साल की खुशी में कुशीनगर में बुद्ध बाबा के धरती के भी लोग ‘ शुद्ध ’ कइलें। गुरु गोरखनाथ की मंदिर में भी मेला लागल। बाबा के दर्शन की साथे तालाब में बोट के मजा। रात के खुमार अबे ना उतरल रहे तवले बिहाने से ही बधाई दिहला के सिलसिला शुरू भईल। असों के नवका साल कई मामला में विशेष रहल। पहली जनवरी के कांग्रेसी होखें चाहें भाजपाई, सपाई होखे चाहें बसपाई जब केहू के बधाई दें त अगिला इहे कहे- ‘आप को भी’। मतलब की दु लोगन के बधाई में असों ‘आप’ की खाता में भी बिना मंगले बधाई पहुंचत रहे। जेकरा केजरीवाल से विरोध बा उहो-उहो आप को भी. आप को भी. कही के शेयर करत हवें। वास्तव में इ 14 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के उपस्थिति के एहसास रहे। नया वर्ष पर बस इहे कविता- 
हर दिन हो खुशहाल,
 मुबारक हो चौदह के साल।
 चमकत रहे गाल आ भाल,
 सब लोग हो जां मालोमाल।।
 नहीं कहीं दिखे कोई कंगाल, 
केहू के हो ना हाल-बेहाल।
 रउरों छा जाई तत्काल, 
जइसे छवलें केजरीवाल।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती  भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय  सहारा के 2 /1 /13 के अंक में  प्रकाशित है।
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