गुरुवार, 28 मार्च 2013

स्टेशन परामर्शदात्री समिति के सदस्य बने एनडी देहाती

वरिष्ठ पत्रकार एनडी पांडेय देहाती को गोरखपुर जंक्शन स्टेशन सलाहकार समिति का सदस्य नामित किया गया है। रेलवे प्रशासन ने श्री देहाती को मीडिया की ओर से स्टेशन परामर्शदात्री समिति में सदस्य के रूप में शामिल किया है। क्षेत्रीय प्रबंधक, गोरखपुर की ओर से जारी पत्र में यह जानकारी दी गयी है। श्री देहाती समिति की होने वाली बैठकों में स्टेशन पर यात्री सुविधाओं व अन्य सुविधाओं के विकास के लिए सुझाव देंगे। स्टेशन परामर्शदात्री समिति की बैठक 1 अप्रैल को क्षेत्रीय प्रबंधक जेपी सिंह की अध्यक्षता में गोरखपुर जंक्शन के एसी लाउंज में संपन्न होगी। समिति में महानगर के अन्य वर्गो से भी संभ्रांत लोगों को शामिल किया गया है।

गुरुवार, 21 मार्च 2013

यादव जी के झंडा, तोहरी लहंगा पर लहरी

मनबोध मास्टर के मन फगुआइल बा। जीव बौराइल बा। कहलें-‘ बुढ़ापा में जवानी से अधिका जोश होला। भभके ला उहे चिराग जवन जल्दिये खामोश होला’। गनीमत रहल न्यूनतम उम्र तय होत रहल। अधिकतम उम्र तय होइत त बवाल जरूर होइत। लोक सभा में शादी व सहमति से शारीरिक संबंध के उम्र एक समान करे वाला दुष्कर्मरोधी बिल पास होत रहे। देश की बड़की पंचायत में एतना बड़वर मुद्दा पर विधेयक पास होत रहे आ 540 पंचन में 300 से ऊपर लापता रहलें। खरवास में येह पंच लोग के ना जाने कवन लगन लागल रहे, कहां दावत काटे चलि गइल रहलें। जवन पंच लोग पंचायत में रहलें ओहमे बहुत लोग उंघात रहलें। जागत रहलें त तीन यादव। तीनों के बुढ़ौती में जवानी के जोश याद दियावत रहलें। येही से कहीला- हमरी यादव जी के झंडा तोहरी लहंगा पर लहरी। लोक सभा में ‘ बैठ जाइए..। शांत हो जाइए..। आप भी शांत हो जाइए..’ की मधुरबानी आज ना सुनाइल। आज अध्यक्षता करत रहली गिरिजा व्यास। तीन दल के मुखिया लोग आज खुल के एक साथे येह बिल पर विरोध जतावत रहलें। जनता दल यू के चीफ शरद यादव बसंती मन से विरोध दर्ज करावत रहलें-˜ जब लड़की के पीछा कवनो लड़िका ना करी त प्यार कहां से होई?  शरद जी, का आपन पवित्र छात्र जीवन याद आ गइल। बहुत सीटियाबाजी कइलीं। बहुते लड़िकिन के पीछा कइले होइहन तब जाके मन में अइसन विचार जागल होई। शरद जी, रउरा येह मुद्दा पर संघर्ष करीं हम रउरे साथे बानी। आरजेडी चीफ लालू प्रसाद यादव के टोन त हमार आदर्श हù। ताकल, झांकल की मामिला पर लालू के एतराज सहिये रहल। अब मसखरी में कहीं राबड़ी की ओर घूरलें, आ राबड़ी कहीं विरोध दर्ज करा दिहली त बुढ़ौती में कानून की फंदा में फंसही के परी। सपा चीफ मुलायम सिंह यादव भी येह बिल के विरोध में रहलन। रहही के चाहीं। हल्लाबोल वाली पार्टी हù। मायावती पर भी हल्ला बोल देले रहलन। तीनों महान नेतन के महान विचार सुनके मनबोध मास्टर बोल पड़लन- घूरल बाउर रहित त फुलवारी में माता जानकी के रामजी कइसे दर्शन देले रहितन। ताकल-झांकल बाउर रहित त कृष्ण भगवान गोपिन के चीर चुरा के कदंब की डाल पर चढ़ि के चैन के बंसी ना बजवले रहितन, जेल में चक्की पिसत रहितन। गांव-देहात में एगो कहावत कहल जाला- ‘ सट-सूट के सुतù ना त मठ में से उठù’
सहमति आ सहमति के व्याख्या बतावे खातिर काफी बा। सांड-भंइसा भइल मनइन के कानून के फंसरी जरूरी बा लेकिन कानून के केतना दुरुपयोग होला दहेज उत्पीड़न में देखल जा सकेला। दहेज लेबेवाला देबेवाला दुनो की सहमति से दहेज आजुओ फरत-फुलात बा। मामला कुछ और होला आ येह कानून में लोग नाहक हुलात बा। कानून बने ना बने, सबके संस्कार सिखावल जरूरी बा। एगो कवित्तई-
 लालू शरद मुलायम कहलें, तीनों एकै बात।
 कानून की दुरुपयोग से , होई घात-आघात।।
 हम कहलीं कि संस्कार पर , काहें ना देलीं जोर।
चरित्र एगो अईसन हीरा ह ,चहुओर करे अजोर।।
 - नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा में २ १ /३/१ ३/को प्रकाशित है . 

गुरुवार, 14 मार्च 2013

जुआफर का आफर

मनबोध मास्टर आज कवित्तई पर प्रसन्न ना हवें। मौजूदा हालात पर बहुत कोफ्त बा मास्टर के दिल-दिमाग में। केतना उदास लउकल आज जुआफर। आज केहू ना आइल जुआफर में झूठ के आश्वासन देबे। गांव-देहात में एगो किस्सा कहल जाला-‘ चिरई के जान जा,लक्ष्का बझवना’। कुछ अइसने हालात जुआफर में रहल। बेचारा पुलिस अधिकारी शहीद हो गइल। माई-बाप-मेहरी खून के आंसू रोवलन। अधिकारी की बेवा के हिम्मत के भी दाद देबे के परी। आंसू आक्रोश की रूप में बहरिआइल। बेवा की आक्रोश की चलते सरकार से लेके दफादार तक हिल गइलन। जे गइल, उ लौट के ना आइल ना आई, लेकिन गइला के तौर-तरीका इतिहास की पन्ना में अमर हो गइल। आज से तेरह वर्ष पहिले 29 अगस्त 2000 के बात ह, पडरौना में भुल्लन नाम के सब्जी विक्रेता पुलिस की गोलीबारी में शहीद हो गइल रहलन। भुल्लन के बाप के आंसू भी ना रुकत रहे, ना सूखत रहे। पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा भी दौड़ल आ गइल रहलें। पडरौना के गन्ना आंदोलन में सब्जी बिक्रेता भुल्लन के शहादत इतिहास की पन्ना में अमर हो गइल। मनबोध मास्टर की जेहन में तेरह साल पहिले के दृश्य बेर-बेर नाचत बा। कइसे पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा दौड़त रहलें। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह अइलें। सोनिया गांधी भी आइल रहली। देश आ राज्य स्तर के बहुत नेता लोग गांव में आइल। ज्योंहि ललकी-निलकी बत्ती सिवान पर दिखे, भुल्लन के बाबुजी पुक्का फार के रोवल शुरू क दें। समय की साथे लोग भुल्लन के भुला गइलें। पडरौना के घटना एगो छोट सब्जी बेचेवाला से जुड़ल रहे। देवरिया के घटना बड़वर पुलिस अधिकारी से जुड़ल बा। दुनों घटना में जमीन-आसमान के अंतर बा, लेकिन एगो समानता मनबोध मास्टर का लउकत बा। घड़ियाली आंसू। इमाम साहब, मुख्यमंत्री जी,आजम साहब, नसीमुद्दीन साहब, मौर्य जी,राहुल जी.. और केतना जी के नाम गिनायी। बहुत लोग आइल। मुख्यमंत्री के छोड़ दिहल जा त के का दिहल? खाली झूठ के सांत्वना, देखावटी सिसकी आ कुछ घड़ियाली आंसू। मुख्यमंत्री जी दिहले तवन सरकारी खजाना के खोल के लुटवला के स्टाइल में दिहलन। ईमानदारी से देखीं त जुआफर ज्यादातर नेतन के ‘पिकनिक स्पाट’ बन गइल रहल। कुछ देखा-देखी में आ गइलन। कुछ एक दूसरा की काट में आ गइलन। जुआफर की जज्बा आ जोश, शराफत आ शहादत के सलाम करत मनबोध मास्टर एगो बात कहलन-जुआफर बहुत आफर दिहलसि। शहीद के परिजनन के पचीस- पचीस लाख के चेक के आफर। नौकरी के आफर। बीवी के सरकारी नौकरी के आफर। एगो वर्ग विशेष के एकजुटता के आफर। दूसरा वर्ग विशेष के तुष्टिकरण विरोध के आफर। डा. अयूब की पीस पार्टी से टिकट के आफर। राहुल जी पर्सनल नंबर देके शहीद की हत्यारन के फांसी झुलवला के आफर तक दे दिहलन। एकरा पहिले मुख्यमंत्री के मिलल भीड़ के वापस जाओ नारा वाला आफर, डीजीपी के मिलल चूड़ी के आफर। चर्चित हीरोइन जयाप्रदा पत्रकार भाई दे गइली लाफा के आफर और भी बहुत आफर के फेहरिस्त बा, केतना गिनाई। समय-काल की चक्र में सब कुछ दफन हो जाला। आज कविता ना एह शेर की साथे बात खत्म होई-
 â€˜ किसको रोता है, उम्र भर कोई। आदमी जल्द भूल जाता है’।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय  सहारा  के 14/3/13 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 7 मार्च 2013

जान बची ना, लाखों पाये

मनबोध मास्टर मौजूदा हालात पर बहुत दुखित हवें, कुपित हवें। लोग कहत बा- गजब के सरकार बा। कहीं कुंडा जरत बा, कहीं टांडा जरत बा। विरोधी कहत हवें- सूबा में गुंडा राज चलत बा। एतना धैर्यवान, दयावान, उदार सरकार के आलोचना अब बर्दास्त से बाहर होत बा। एगो जमाना रहल जब कहावत कहल जात रहे- ‘जान बची तो लाखों पायें’। अब कहावत बदल गइल-‘ जान बची ना, लाखों पाये’। कुंडा की गुंडा राज से लेके, जुआफर में चूड़ी-चप्पल सहला तक। टांडा के कर्फ्यू से लेके बलीपुर में नन्हें प्रधान की परिजनन की अनशन तक बहुत बात बाड़िन। एक ही सरकार के कई स्वरूप के दर्शन कर के जीवन धन्य कइला के जरूरत बा। कुंडा में सरकार की एगो मुलाजिम के हत्या हो गइल। छींटा सरकार के वफादार मंत्री पर पड़ल। केतना सराफत से भइया इस्तीफा दे दिहलन। गुंडाराज रहित त केकरा में दम रहल कि इस्तीफा मांग लीत। सब नजर के दोष ह। कवनो सरकार आवेले त राजा के पोटा से पीट के जेल में ठेल देले आ दूसर सरकार आवेले त भइया के ओही जेल के मनिस्टर बना देले। कुंडा में मराइल सरकार के मुलाजिम देवरिया के रहलन। देवरिया की बारे में एगो कहावत मशहूर ह-‘ ले लउरिया चल देउरिया’। इ देवरिया के प्रतिरोध क्षमता ह। जुआफर गांव में प्रतिरोध के क्षमता जब प्रदर्शित भइल त दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम भी चल दिहलन। सरकार भी चल दिहलस। सरकार चलल त इमाम की काट खातिर एगो मंत्री के भी ले आइल, कहलसि तू भी आ-जम। सरकार के सहनशीलता देखे लायक रहल। भीड़ वापस जाओ के नारा लगावत रहल, सरकार पिछुआरे से गली की रास्ते निहुरल-निहुरल संवेदना जतावे पहुंच गइल। बउराइल भीड़ कहीं चूड़ी देखावत रहल, कहीं चप्पल देखावत रहल। कहीं कार पर मुक्का मारत रहे, कहीं लोग के धकियावत रहे। एतना विरोध की बादो सरकार की सहनशीलता के बांध ना टूटल। सरकार अपनी दानवीरता में कमी ना कइलसि। जेतना हो सकत रहल ओतना न्योछावर कइलसि। देखा देखी लाग गइल। बलीपुर में अनशन करत लोग भी सरकार के बोलावल चाहत रहे। अरे भाई! सरकार एतना सस्ता बा? जहां खोजब तुरंत पहुंच जाई। बलीपुर में दो दिन बाद सरकार पहुंचल। जफुआर में बुखारी की बोखार से समुदाय के ताप ना बढ़े, येह लिए सरकार दउरल चल आइल। अब टांडा में लोग सरकार के खोजत बा त सरकार डंडा-बंदूक लेके दउरावति बा। कर्फ्यू लगावति बा। हिंदूवादी लोग की भिनभिनइले का होई। सरकार खूब बुझति बा, कहां नरमाये के बा, कहां गरमायेके बा। सरकार ही अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता देले बा जवना की माध्यम से रउरा दहाड़ लेत हई, हमहूं कुछ भौंक लेत हई। सरकार चाही त इमरजेंसी लगाके मुंह पर ताला लगा दी। सरकार चाही त राष्ट्रपति शासन लगा दी। आई एगो कविता के निहितार्थ तलाशल जा-
                                  कितनी दया दिखावे आखिर, मेरी प्यारी ये सरकार।
चिचिंयाने पर नहीं सुने फिर, दौड़ी आवे ये सरकार।।
 जान बचा ना, लाखों पाये, आखिर करती क्या सरकार।
गली-गली में सभी दहाड़ें, मौका भी देती सरकार।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ७/३/१३ के अंक में प्रकाशित है .
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