गुरुवार, 28 जुलाई 2011

देवरिया के रुद्रपुर में है दूसरी काशी

देवरिया  जनपद मुख्यालय से लगभग बीस किमी दूर स्थित रुद्रपुर नगरी को काशी का दर्जा प्राप्त है। यहां भगवान शिव, दुग्धेश्वरनाथ के नाम से जाने जाते है। शिवलिंग जमीन के अंदर कितने गहरे तक है, इसकी थाह कोई नहीं लगा पाया। शिव पुराण व स्कंद पुराण के साथ ही चीनी यात्री ह्वेंनसांग ने भी बाबा की महिमा का बखान किया है।
 उप ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के संबंध में पद्म पुराण की निमन् पंक्तियां उल्लिखित हैं-
खड़ग धारद दक्षिण तस्तीर्ण दुग्धेश्वरमिति ख्याति सर्वपाप:, प्राणाशकम यत्र स्नान च दानं च जप: पूजा तपस्या सर्वे मक्षयंता यान्ति दुग्धतीर्थ प्रभावत:।
ईसा पूर्व 332 में रघु वंश से जुड़े महाराजा दीर्घवाह के वंशज राजा ब्रजभान रुद्रपुर आए थे। तब क्षेत्र :जंगल से आच्छादित था। सैनिक मचान बनाकर रहते थे। एक रात उन्होंने देखा कि एक गाय आकर खड़ी हो गई और उसके थन से स्वत: दूध निकल रहा है। राजा ने जिज्ञासा शांत करने के लिए उस स्थान की खुदाई कराई। उन्हे वहां एक शिव लिंग दिखा। उस स्थान की साफ सफाई कराकर वेदपाठी, विद्वान ब्राह्मणों द्वारा शिव लिंग का रुद्राभिषेक कराया गया। चूंकि गाय ने प्रथम बार लिंग का दूध से अभिषेक किया था, इसलिए पीठ का नाम दुग्धेश्वर नाथ रखा गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल दधीचि व गर्ग आदि ऋषि-मुनियों की तपस्थली भी है।
देवारन्य की इस धरती को बार -बार नमन करने का जी करता है . हर हर महादेव ... om namah shivay

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

राहुल कोई भगवान् राम नहीं है .

 राहुल कोई भगवान्  राम नहीं है . लेकिन गोरखपुर में आये तो आमी के प्र्दुसन से त्रस्त लोगो ने उसी तरह गुहार लगाई <उतराई नाहीं चाही, पनिए शुद्ध करा देईं> मीडिया ने केवट -राम सवाद का सहारा लिया और दाग दी भोजपुरी की हेडिंग से एक खबर . और बना दिया राहुल को हीरो .
एक अख़बार ने लिखा - अयोध्या से जितनी दूर दक्षिण श्रृंगबेरपुर है लगभग उतनी ही दूरी पर पूरब दिशा मे बसा है गोरखपुर का कटका गांव। श्रृंगबेरपुर में भगवान श्रीराम ने केवट को सुई नदी पार कराने एवज में उतराई देने की कोशिश की थी। आज राहुल ने कटका में आमी नदी पार कराने के एवज में केवट को उतराई देनी चाही। राहुल के कटका दौरे में गांव के हर बड़े बुजुर्ग की जबान पर राम केवट संवाद बरबस चर्चा में आ गया था।दो नामों में र अक्षर ने इस चर्चा को और भी आगे बढ़ा दिया। तब तो केवट ने कहा था-
कहेउ कृपालु लेहु उतराई,केवट चरन गहे अकुलाई.
नाथ आजु मैं काह न पावा,तिटे दोष, दुख, दारिद दावा।
आज कटका गांव के दो मल्लाहों ने सपने में नहीं सोचा था कि उनकी नाव पर राहुल गांधी बैठेंगे। बाढ़ के सीजन में नदी में तीन माह तक नाव चलाने वाले जीतू निषाद एवं रमेश निषाद ने जब राहुल गांधी को नदी के पार उतारा तो राहुल ने उतराई देनी चाही । बस क्या था तपाक से जीतू ने कहा, साहब पइसा नाहीं चाही, आमी के पनिए शुद्ध करा देईं।
बतौर जीतू एवं रमेश अजीब संयोग था। जब राहुल गांधी का काफिला नदी के किनारे छताई पुल के पास पहुंचा तो वे सुर्ती मल रहे थे। जब वे उनके पास आये तो वे पहचान नहीं पाये कि यह लोग कौन हैं। नाव में पूछकर वे लोग बैठ गये नदी पार करने के दौरान जीतू से उसे परिवार के बारे में रीता बहुगुणा जोशी ने पूछा। जीतू ने उन्हें बताया कि उसके चार बेटे एवं दो बेटी हैं। बीस वर्ष से बाढ़ के वक्त नाव चलाने वाले जीतू के मन में एक व्यक्तिगत मुराद (बेटो ं को नौकरी) पूरी कर लेने की इच्छा हुई लेकिन उसने सामाजिक हित को महत्व दिया। वह कहता है कि मन में एक बार आया कि कि कह दे लेकिन आत्मा ने गवाही नहीं दी। जीतू कहता है कि नदी का पानी जब शुद्ध हो जाएगा तो कई लोगों के बेटे का जीवन संकट से बचेगा। रमेश निषाद कहता है कि उसकी जाति के पूर्वजों ने भगवान राम को नदी पार कराया था। वह अपने जीवन में इतने बड़ी हस्ती को पार कराकर काफी खुश है। सपने में भी उसने नहीं सोचा था कि ऐसा अवसर कभी उसके जीवन में आएगा। 
 दुसरे अख़बार ने लिखा -हैण्ड पम्प ले के  पानी जहर ugilat बा .पानी पि के larika bimar ho jat हवे .
 एक  ने लिखा - राहुल ने खरीदी  700 में तीन किलो प् कौ डी....
पढ़िए और इस राजनितिक ड्रामा पर अपनी प्रतिक्रिया भी दीजिये 

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

सबका खातिर चढ़ल बा सावन, उनका खातिर बसंत...


शहर में तेंदुआ फंसावे खातिर वन विभाग के लोग दू दिन से पिजरा में बकरी बान्हि के जाल बिछवले हवें लेकिन उ फंसते ना बा। लेकिन मेडिकल के छात्रा गुरुजी की जाल में फंसि गइली। बबुनी मेडिकल पढ़त-पढ़त प्रेम के पाठ पढ़े लगली। पुलिस महकमा परेशान रहे। ‘गोद में लक्ष्का शहर में डवरेरा’ की तर्ज पर पुलिस वाला जौनपुर से लखनऊ ले छान मरलन, लेकिन बबुनिया गोरखपुर के ही एगो होटल में गुरुजी से ‘एकांत शिक्षा’ लेत रहे। सुबह जब अखबार देखली तù पता चलल कि उ गायब हई,गुमशुदगी दर्ज बा। इश्किया रोगी डाक्टर व छात्रा कù इलाज पुलिस वाला ना कù पवलें। कारण ,दूनो बालिग हवें। अब सवाल इ उठत बा कि बालिग गुरु-शिष्या के संबंध जायज बा? अइसन गुरु समाज के कवन संदेश दीहन? डाक्टरी पढ़े बाली बबुनी माई-बाप की आंख में धुरि झोंक के इ कवन पढ़ाई पढ़त हई? भारतीय संस्कृति में अइसन संबंध के मान्यता कहां बा? इ तù एकदम अंगरेजी सभ्यता हù जवना में ‘लीव इन रिलेशनशीप’ कù पाठ बा। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य के संबंध पिता-पुत्र अइसन होला। समाज में जेतने शिक्षा बढ़त बा, ओतने संस्कृति खराब होत बा। लोक-लाज कù जनाजा निकरल जाता। अब तù गंउअन में भी इहे रोग फइलल जाता। पहिले का समय में ‘कुजतिहा’ छंटला के व्यवस्था रहल तù समाज के भय से भी लोग ‘लंगोट के पक्का’ होत रहलें। गांव में केहू एगो-दुगो लोग ‘बहकल’ तù जवार-पथार ले हल्ला हो गइल। फलनवां ‘पंद्रहआना’ हो गइल। मतलब की खांटी रहे खातिर सोरहआना रहल जरूरी रहत रहल। अब पंन्द्रहआना के कहे, आठ आना भी ना बचल बा। कानून से ‘लवलाइटिस’ ना रोकल जा सकेला। कानून तù अइसहीं आपन पल्ला झाड़ के खड़ा हो जाई कि बालिग हवें.। इ सब रुक सकेला संस्कार से, सामाजिक भय से, लोकलाज से। बबुनी मेडिकल के पढ़ाई पढ़ के पास होइती तù देश-समाज के नाम रोशन होइत। लेकिन उ पास हो गइली इश्कबाजी में.। एगो कवित्तई में घटना के अर्थ निकारीं सभें- 
सबका खातिर चढ़ल बा सावन, उनका खातिर बसंत। येह बरुअन के का कहीं, जेकर आदि न अंत।। शिष्या को जब पकड़ लिया, लवलाइटिस का रोग। गुरु की साथे मौज मनावे, कब तक सहे वियोग।। सोचले ना रहलें बाबा कि, इहो जमाना आई। गुरु अपनी गरिमा के त्यागी, मटुकनाथ बन जाई।।


बुधवार, 20 जुलाई 2011

आस्कर अवार्ड विजेता फिल्म स्लमडाग मिलेनियर की लतिका यानी रुबीना

आस्कर अवार्ड विजेता फिल्म स्लमडाग मिलेनियर की लतिका यानी रुबीना को ‘पूरब’ की आब-ओ-हवा खूब भा गयी. वह बुधवार १९-०७-११ को गोरखपुर आई. थी . गोला के बनरही गाव निवासी दिनेश दुबे के घर घूमने आई रुबीना अपने पापा रफीक अजगर अली कुरैशे के साथ सहारा के दफ्तर में पहुची . रुबीना संपादक श्री मनोज तिवारी जी से मिली . जाते-जाते वादा कर गयी की मौका मिला तो फिर आउंगी .

रविवार, 17 जुलाई 2011

पत्थर की नाव तैरती दिख जाए तो ...

आपने लकड़ी की नाव देखी होगी और उसके बारे में सुना भी होगा लेकिन मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में एक शिल्पकार ने पत्थर की ऐसी नाव बनाई है जो तैर भी सकती है.
लगभग एक साल की मेहनत के बाद दीपक विश्वकर्मा ने ग्वालियर सेंड पत्थर की नाव बनाई है.
दीपक की यह नाव है तो पत्थर की लेकिन तैरती ठीक लकड़ी की नाव जैसी है.
इस नाव में राम, लक्ष्मण, सीता सवार हैं तथा उसे केवट चला रहा है.
पत्थर की नाव पानी पर कैसे तैरती है,
इस पर दीपक का कहना है कि रामायण में भगवान राम की सेना को रामेश्वर को पार करना था तो हनुमान की बानर सेना ने पत्थर पर सिर्फ राम का नाम लिख दिया था, फिर वह तैरने लगा था.
वह कहते हैं कि यह राम के नाम का प्रताप था कि पत्थर भी तैरने लगा था.
दीपक के मुताबिक यह नाव दो फुट लम्बी तथा नौ इंच चौड़ी है. इसको बनाने में 70 हजार की लागत आई है.
वह कहते हैं कि नाव का संतुलन बनाने के लिए उन्हें काफी मशक्कत करना पड़ी.
संतुलन बनाने के लिए तीन माह तक कड़ी मेहनत करने के बाद वह पूरी तरह पत्थर से बनी इस नाव को पानी पर तैराने में सफल रहे. दीपक द्वारा बनाई गई इस पत्थर की नाव का दिल्ली की प्रदर्शनी के लिए भी चयन हुआ है. इस बात को लेकर दीपक व उनका परिवार काफी उत्साहित है.
- sahara samay

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

मुलायम बताये उनके लाडले ने सही प्रत्याशी का चयन किया है

यह कैसी निष्ठा है .गोरखपुर ग्रामीण से सपा के घोषित प्रत्याशी लाल अमिन खान जब गोरखपुर पहुचे तो सपाइयो ने उनका पुतला फुक कर विरोध जताया . अब मुलायम बताये उनके लाडले ने सही प्रत्याशी का चयन किया है .

धावत धोती ढील भई, सात रेस कù कोर्स



 mai bahut sapna sajaya tha, mere neta lalu ji ko kendriya mantrimandal me mantri pad milega,lekin kangressiyo ne aisa nahi kiaya. mai dipreson me dusra sapna dekhne laga....
लालू और पासवान एक दूसरे की कान्हे पर हाथ रखले, दिल्ली की राह पर गुनगुनात रहलें- ‘दो दिवाने दिल के.’। दिल्ली में ‘सिंह इज किंग’ कù मंत्रीमंडल विस्तार कù खेल होत रहल। लालू बीच राहि में ही पासवान के भुलकी मार के दस जनपथ पहुंच गइलन। पासवान गावे लगलें- ‘लालू भइया, तू बड़ा दगाबाज निकला’। हांफत-डांफत पासवान भी दस जनपथ पहुंचले, एकरा पहिले ही लालू सात रेस कोर्स में डेरा डाल के गुनगुनात रहलें-‘रेल मंत्री हो जइहे भइया तोहरे लालू, एसी में चलिहù जा टिकट लेके चालू’। येही बीचे मनमोहन विस्तार की नाव पर ‘कुछ साफ-सफाई, कुछ नया धराई’ कù कोरम पूरा कù दिहलन। लालू-पासवान दूनो की अरमान पर पानी फिर गइल। पासवान दाढ़ी खजुआवत कहलें‘ . आ जइहन जब नीक दिन, बनत न लगिहे देर’। लालू मुड़ी निहुरवले रास्ता में मिललें। पासवान बोललें-लालू भया, तोहरे वजह से हमरो काम खराब हो गइल। देश में चारो ओर भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार के शोर होत बा, येह बीचे तूं काहे कù मंत्री बनला के सपना देखे लगलù। लालू बोललें-चुप्प बुड़बक। जरला पर फोरन डारत हवे। चलù हम खटाल खोल लेत हई, तू ताड़ी कù दुकान। इ नेतागीरी-ओतागीरी छोड़ दिहल जा। पासवान समझवलें- वक्त के नजाकत समझù लालू भइया। हम्मन से खाली नेतागीरी कù दुकान चल सकेले। पासवान दिल्ली में ही रहि गइलें, लालू पटना अइलें। अपने घर की गेट पर ज्यों पहुंचलें,त्यों मलकिन से भेंट हो गइल। मिसिरी अइसन बोली आज बंदूक की गोली अइसन निकरे लागल। आ गइलें रेल मंत्रालय लेके.। मंत्रालय हाथ में रहे तù हमरे नैहर ले रेल लाइन दौरावत रहलें.। देवरिया से हथुआ ले छुकछुकिया चलावेवाला रहलें.। गइल रहलें हंù दिल्ली.। आठ करोड़ बिहारी लोग के नाक कटा दिहलें.। हाथ पसरलें.।  हम बेर-बेर बरिजत रहलीं., सोनिया की शरण में गइले कुछ ना भेटाई., राहुल के पकड़ù., सरकार में उनहीं के चलता.। कहत रहलें, राहुल चार दिन कù लवंडा से हम बात नहीं करेगा। लालू बोललें-ए बकबकाना बंद करù.., हम बिहार में ही अलख जगायेगा.., पार्टी को मजबूत करेगा.., कांग्रेस को उसकी औकात बतायेगा..। पांड़े बाबा कविता गुनगुनात रहलें- रावड़ी अंगारा हुई, ऐसा समय का खेल। मनमोहन विस्तार में लालू हो गये फेल।। दस जनपथ मिलते रहे,बहुत लगाये सोर्स। धावत धोती ढील भई सात रेस कù कोर्स।। पासवान ने तुरत मढ़ा, लालू पर एक आरोप। दोस्ती में अलकतरा लगा दिया तू छूरा घोंप।। अपने तो डूबे भया, हमको दिये डूबाय। आठ करोड़ बिहारी भइया मंद-मंद मुसकाय।।

सोमवार, 11 जुलाई 2011

बकरे का भाग्य



कोई मरता है तो कफ़न भी नसीब नहीं होता .देवरिया में एक बकरे का ऐसा भाग्य की ३३ किलोमीटर की शवयात्रा निकली और देवरिया के  रामपुर चंद्रभान से बरहज तक गूंजा <राम नाम सत्य है >.उसे बरहज के सरयू तट पर वैदिक मंत्रों के साथ  जल समाधी दी  गयी .मामला रामपुर कारखाना के गांव रामपुर चंद्रभान का है।
 नि:संतान दंपति गोबरी का अति प्रिय बकरा बालमती बीमारी के बाद रविवार को मर गया। । वे उसे 22 साल से पाले हुए थे। बकरे से उनका बेटे जैसा लगाव था। उन्होंने उसका बीमा करा रखा था। यह दृश्य देखने बहुत लोग जुटे थे। आमतौर पर लोग बकरा- बकरी या तो व्यवसाय के लिए पालते है या फिर उसका मांस खाने के लिए। पर गोबरी का प्रेम अद्भुत था। उसने बकरा पालकर औलाद न होने का गम कम कर लिया था। उसके लिए अलग बिस्तर, बेहतर चारा का इंतजाम था। बकरा भी दंपति के हर संकेत समझता था। उसका 50,000 का बीमा भी करा रखा था। पर 22 वर्षों का यह साथ रविवार को छूट गया। उन्होंने ट्रैक्टर ट्राली पर बैंड बाजे के साथ उसकी शव यात्रा निकाली और नदी में प्रवाहित कर दिया। इस अद्भुत दृश्य को देखने श्मशान घाट पर भीड़ जुट गई थी। कोई इसे पुनर्जन्म के रिश्ते से जोड़ रहा था तो कोई गोबरी के पशु प्रेम की तारीफ करते नहीं अघा रहा था। बातचीत में दुखी गोबरी ने बताया भी कि बालमती (बकरे का यही नाम रखा था) उसके लिए बेटे के समान था। 16 दिन बाद वह उसका ब्रह्मभोज कराएगा। बताया जा रहा है की बकरे का 50 हजार का बीमा था .वह अब गोबरी को मिलेगा . गोबरी का कहना है की मांसाहार पाप है .
- नर्वदेश्वर पाण्डेय , रास्ट्रीय सहारा , गोरखपुर

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

उसे बालिका बधू बना लिया

धन लोभियों ने एक लड़की का हाथ रस्सी से बांध क़र जबरिया उसके मांग में सिंदूर डलवा दिया . १० वर्षीय मराछी कुशीनगर जिले के नेबुआ नौरंगिया थाना के नर्चोचवा के रामलोचन कुशवाहा की बेटी है . गाव के ही वाशिन्द्र ने अपने बेटे पंडित उम्र ११ वरस से पुरामछाप्रा पिजावा स्थान कुटी पर ले जाकर मराछी का हाथ पीछे कर रस्सी से बांध कर अपने बेटे से जबरिया सिंदूर डलवा दिया . और उसे बालिका बधू बना लिया . लड़की के माँ को कचहरी ले जाकर उसकी जमीन भी लिखा लिया . लड़की के बाप रामलोचन ने पुलिस में तहरीर दिया है . रिपोर्ट नहीं लिखी गयी है. यह है हमारे समाज का घिनौना चेहरा ...
नर्वदेश्वर पाण्डेय , रास्ट्रीय सहारा , गोरखपुर

एक सवाल का जवाब दो राहुल

यूपी में दलालों की सरकार : राहुल
 किसान संदेश यात्रा के तीसरे दिन गुरुवार को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के तेवर माया सरकार के खिलाफ और तल्ख हो गए। करीब 21 किलोमीटर पदयात्रा के दौरान राहुल ने कई गांवों में छोटी-छोटी सभाओं को संबोधित करने के दौरान कहा, यूपी में दलालों की सरकार है।
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एक सवाल का जवाब दो राहुल -दलालों की सरकार को दाना पानी देकर तुम्हारी ही सरकार जिलाए है . यदि यूपी की  सरकार से इतनी नफ़रत है तो बर्खास्त करा दो . जनता उब चुकी है .

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

subhadra ki kawita se chhedchhad

 जनसत्ता अखबार ने ek khabar diya .खबर है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अपने यहां पाठ्यपुस्तकों से सुभद्रा
कुमारी चौहान की कविता से वह एक लाइन हटवा दी है जिससे सिंधिया राजघराने
के अंग्रेजों के मित्र होने का पता चलता है, जिससे पता चलता है कि
सिंधिया राजघराने ने रानी लक्ष्मीबाई का नहीं बल्कि अंग्रेजों का साथ
दिया था, जिससे पता चलता है कि सिंधिया राजघराने ने आजादी के आंदोलन के
दिनों में गद्दारी की थी और गोरों का साथ दिया था . चूंकि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा में ज्यादातर राजे-रजवाड़े-सामंत किस्म के लोग ही नेता, सांसद, मंत्री बनते हैं, सो
लगता है कि सिंधिया राजघराने के नए नेताओं ने शिवराज सरकार को प्रभाव में
लेकर अपनी बदनामी वाली कहानी को डिलीट करा दिया है. यहां कविता की वो
लाइन बोल्ड में दी जा रही है जिसे पाठ्यपुस्तक से हटाया गया है...

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो मध्य प्रदेश के बच्चे सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता झांसी
का रानी में इस लाइन ''अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी
थी'' को नहीं पढ़ेंगे क्योंकि वहां की सरकार ने इसे हटवा दिया है. सोचिए,
कितने नीच लोग हैं. अगर कविता पसंद नहीं है तो पूरा का पूरा हटा दो. या
पसंद है तो पूरा का पूरा लगा लो. ये क्या कि उसमें छेड़छाड़ कर देंगे. यह
घोर अपराध है और इसके लिए शिवराज सरकार की निंदा का जानी चाहिए.


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झांसी की रानी
-सुभद्राकुमारी चौहान-

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपुर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़|

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

२ जुलाई चौरी चौरा कांड के सेनानियों का वलिदान दिवस है

२ जुलाई चौरी चौरा कांड के सेनानियों का वलिदान दिवस है . यु पी में माया सरकार स्मारकों पर बहुत ध्यान दे रही है . लेकिन देश के गौरव चौरी चौरा का स्मारक भूल गयी है . ४ फ़रवरी १९२२ को चौरी चौरा के किसानो ने एक इतिहास रच दिया था . स्वाधीनता की लडाई में चौरी चौरा थाना फुक दिया गया था . आज से ८८ साल पहले २ जुलाई १९२३ को चौरी चौरा कांड के क्रांतिवीरो को देश के विभिन्न जेलों में फासी पर लटका दिया गया . चौरी चौरा छेत्र के १९ क्रांतिकारियों को फासी हुई थी .
इन  क्रांतिकारियों को दी गयी थी फासी 
१- अब्दुल्ला उर्फ़ सुकई 
२-भगवान
३-विकरम
४-दुधई 
५-कालीचरण 
६-लाल्मुहमद 
७-लौटू
८-महादेव 
९-लालबिहारी 
१०-नज़र अली 
११-सीताराम 
१२-श्यामसुंदर 
१३-संपत रामपुरवाले
१४-सहदेव 
१५- संपत चौरावाले 
१६-रुदल 
१७-रामरूप 
१८-रघुबीर 
१९- रामलगन 
क्रांतिकारियों की याद में चौरी चौरा में शहीदों की मुर्तिया लगायी गयी थी . खुराफाती बंदरो ने ५ मूर्तियों को तोड़ दिया. लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया .क्रांतिकारियों के शौर्य गाथा केप्रतीक  ३२ फिट उचे स्मारक  को देख कर सीना गर्व से चौड़ा  हो जाता है , लेकिन यहाँ की दुर्दशा  देख सर भी शर्म  से झुक जाता है .शहीदों की मुर्तिया यही कहती है -
<किसी मर्तवे की ख्वाहिस न मुकाम चाहते है .जो बदल सकें जमाना वो निजाम चाहते है >
नर्व देश्वर पाण्डेय देहाती , रास्ट्रीय सहारा , गोरखपुर










अन्ना अउअल रामदेव दोयम हो गए

 भ्रस्टाचार के खिलाफ एक रेस हुआ .अन्ना अउअल रामदेव दोयम हो गए .

धरती के भगवान जबसे बिकने लगे ..

डाक्टर्स डे पर यह सोचेते ही यही उत्तर मिला . धरती का भगवान बिकता है . सेवा का भाव समाप्त हो चूका है .फिर भी नेक लोगो की कमी इस धरती पर नहीं है . इन नेक लोगो में गोरखपुर के  कुछ डाक्टर है , जिन्हें गरीबों का  मसीहा कह सकते है. 82 वर्षीय नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. नरेन्द्र मोहन सेठ, महानगर में पिछले 58 साल से लगातार असहायों, मजदूरों, रिक्शा चालकों व कुलियों का इलाज मुफ्त कर रहे हैं। शहर का प्रतिष्ठित सीतापुर आंख अस्पताल डा. सेठ की ही देन है। डा. सेठ के अनुसार उन्होंने शहर के रीड साहब धर्मशाला में दस कमरों के क्लिनिक से शुरुआत की। यहीं से नए अस्पताल के निर्माण की नींव रखनी शुरू की। यहां चैरिटी बाक्स रखा जिसमें इलाज कराकर लौटने वाले लोग स्वेच्छा से धन देते हैं। इसी धन से 1959 में सीतापुर आंख अस्पताल का निर्माण हुआ। इस अस्पताल में भी वह लगभग तीस फीसदी मरीजों का इलाज मुफ्त में करते रहे। 1991 तक सीतापुर अस्पताल में सेवा में बाद अब बेतियाहाता में अपनी क्लिनिक में मरीज देखते हैं। डा. सेठ की राह पर ही चलते हुए वरिष्ठ सर्जन डा. आनन्द मोहन पाठक ने बीते साल में बारह गरीब मरीजों के आपरेशन मुफ्त में किया। इसमें पित्त की थैली, गुर्दे सहित अन्य आपरेशन शामिल हैं। अब एक कदम आगे बढ़कर डा. पाठक डाक्टरों की एक टीम के साथ अपने क्लिनिक पर हर रविवार को गरीब मरीजों को मुफ्त देख रहे हैं। यहां मरीजों को देखने के बाद उन्हें बीमारी के अनुसार विभिन्न विशेषज्ञता वाले चिकित्सकों के पास रेफर कर दिया जाता है। डा. पाठक के अनुसार उनके साथ महानगर के दूसरे वरिष्ठ चिकित्सक भी जुड़ रहे हैं। गरीबों की सेवा का यह सिलसिला लगातार जारी रहेगा। इसी तरह सर्जन डा. सिद्धार्थ अग्रवाल व उनकी पत्‍‌नी स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ डा. मीता अग्रवाल शहर के जेल रोड स्थित अपने नर्सिग होम में हर मंगलवार को मरीजों को मुफ्त देखते हैं। आर्यन अस्पताल के फिजीशियन डा. डी.पी. सिंह भी हर रविवार को दोपहर बारह बजे से अपरान्ह छह बजे गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करते हैं।डाक्टर वाई डी सिंह का कहना है की अज के समय में डाक्टरी पेसे में भ्रस्टाचार बढ़ गया है .डाक्टर आंनंद सिंह के मुताबिक अछे व ख़राब लोग हर जगह है .
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