गुरुवार, 27 जून 2013

देवलोक में शिवलीला

मनबोध मास्टर के गम, कम ना होत बा। धर्म के प्रति आस्था में उ हरदम इहे याद कइले रहलेंिशव ही सत्य है। सत्य ही शिव है। शिव ही सुंदर है। अचानक इ का हो गइल? देवलोक में शिवलीला। शिव जब भी लीला करेलन त विनाश ही होला। देवलोक में बादर फटल। धरती धंसल। बारिश आ बाढ़ में सब कुछ बहि गइल। तबाही की मंजर में लोग काल की गाल में समा गइलन। बहुत लोग लापता हो गइलन। क्षुधा मिटावे के अन्न मुहाल हो गइल। प्यास मिटावे के पानी के अकाल हो गइल। पेड़-पौधन के पतई चबा के जान बचावला की जद्दोजहद में लागल पुन्यात्मा भी परेशान हो गइलन। सांच कहल गइल बा- कुदरत की लाठी में बड़ी जान होले, उ बहुत लोग के जान एके साथ ले सकेले। कुदरत जब मारेले त बचला के गुंजाइश ना बचेला। कुदरत के कोप के कारण का बा? येह पर भी विचार के समय बा। दोष प्रकृति की ऊपर ठेल के अपने ना बचल जा सकेला। प्राकृतिक संसाधन जइसे जल, वन, खनिज के दोहन कइला में मनई ही लागल बा। नदी के बांध में बांधत मनई ना सोचले रहे गंगा माई कोपि जइहन। जब जल पल्रय आवत बा त सजो बुद्धि फेल हो जाता। ओही पल्रय में मनई के संपूर्ण प्रताप समाप्त हो जाता। रुपया-पैसा, धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, गोल-गिरोह कुछ भी काम ना आवत बा। उत्तराखंड त देवलोक रहल। पर्यटकन के लुभावे खातिर, ललचावे खातिर,बोलावे खातिर, भरमावे खातिर देवलोक में का ना भइल। पहाड़ कटाइल, विस्फोट से उड़ावल गइल। जेसीबी लगा के पहाड़ के पेट चिचोहल गइल। वन-उपवन उजाड़ल गइल। नदी के किनारा काटल गइल। शहर बसावल गइल। बाजार लगावल गइल। पुन्य करे वाला देवलोक सैर-सपाटा स्थल बन गइल। होटल, धर्मशाला, आश्रम बनल। का होता येह जगहन पर, कबो सोचल गइल। अधरम बढ़ल त देवलोक के देवता लोग कोप गइलन। बाबा बदरीनाथ, बाबा केदारनाथ सब कोप गइलन। शिव की कोप पर एगो शिवभक्त अपनी कविता में बस इहे गोहरावत रहे-
 माथवाली गंगा , नाथ काहें बदे छोड़ि दिहलीं, 
सुसुकि-सुसुकि रोवत, नर-नारी दरबार में। 
लगल रउरी गटई के शेष खिसिआय गइलें, 
लील गइलें सब कुछ, एकै फुफकार में।
 देवलोक करवट, का ले लिहलसि बोलीं नाथ
, पुन्यात्मा लोग गइल रहलें, रउरी जयकार में। 
फाटल जब बादर, कफन-चादर ना बदा भइल, 
शिवलोक में समाहित केतने, बदरी-केदार में।।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के २७/६/१३ के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 20 जून 2013

गर्मी से राहत मिलल, पानी से सांसत..

मनबोध मास्टर मानसून के बून गिरते गर्मी से राहत पवलें त बड़ा इत्मीनान से टांग पसार के सुत गइलें। देवराज इन्द्र के कृपा गरगरा के बरसत रहे।सुतला में बरखा बहार वाला सपना देखत रहलें। अचानक देहिं पर गणोश जी के चरपहिया चढ़ि गइल। भइल इ रहे कि गणोश जी की वाहन वाला गैरेज में पानी समा गइल रहे आ उ अफना के उ मास्टर की उपरे चढ़ि गइल। मास्टर चिहुक के उठलें। आंख मलते पहिला पांव पलंग के नीचे उतारते छपाक.। चप्पल बहि के ना जाने कहां चलि गइल रहे आ नाला के पानी आ प्लास्टिक के कचरा घर में समा गइल रहे। मस्टराइन ना जाने कबे से फुफती खोंस से घर के पानी बहरा उदहला की उपक्रम में लागल रहली। मास्टर के देखते बादर जस फाटि पड़ली- कुंभकरन अस सुतल रहलù ह, सब सामान नुकसान हो गइल। गर्मी से राहत वाला मानसूनी बहार पर एकाएक बज्रपात हो गइल। कमरा के सामान रेक-ओक पर फेंक-सेंक के शहर के जायजा लेबे निकल पड़लें। सड़क पर उतरते समहुत बनि गइल। एगो चारपहिया बगल से गुजरल आ मास्टर पवित्तर हो गइलें। चेहरा के कानो-माटी काछत, कपड़ा के गति बनल निहारत धर्मशाला पुल की नीचे से निकरला की प्रयास में कच्छा में मेघुची समा गइल। अनुमान लगा लिहलन की देवराज इन्द्र के पुरहर कृपा भइल बा, तीन फीट से कम पानी ना लागल बा। मियांबाजार, घोषकंपनी, नखास, रेती, गीताप्रेस, साहबगंज, लालडिग्गी, सुमेरसागर, रुस्तमपुर, चस्काहुसेन आदि इलाका में मकान-दुकान में नाला के पानी समाइल रहे। शहर में नैहर के बरम बनि के जमल फुटपाथी दुकानदार जवन प्रशासन की अतिक्रमण हटाओ वाला डंडा से कबो ना डेराइल रहलें उ कीचड़-पानी की डरे आपन चाट-पकौड़ी, इडली-डोसा, पूड़ी-कचौड़ी, सतुआ-भूजा लेके भाग गइल रहलें। इंन्द्र की बज्जर से बचाव खातिर पंपसेट लगावे के व्यवस्था होत रहे। सूरजकुंड, रसूलपुर, हड़हवा फाटक, गोड़धोइया पुल, गोपालपुर आ धर्मशाला सहित कई जगह पर पानी उदहात रहे। जे बरखा की पानी से घेराइल रहे उ चिचियात रहे, चिल्लात रहे। नगर निगम पर भिनभिनात रहे- सुखरख में नाला त साफे ना करा पवलें अब सड़क पर नाव चलवा दें। शहर की दुर्दशा पर मन मसोस के मास्टर बस दु शब्द कहलें- ठेकेदारी आ हिस्सादारी नरक बना दिहलसि। शहर के इ दशा देखि के एगो कविता लिखाइल-
 गर्मी से राहत मिलल, पानी से सांसत।
 डूबत इलाका बा, लोग हवें हांफत।।
 मौसम विज्ञानी लोग नापेलन पानी।
 शहर भइल कचरा बढ़ल परेशानी।।
 कूड़ा से पाटल, सड़क भइल नाला।
 नरक के सुख भला केकरा सुहाला।
 जनप्रतिनिधि लोग मलाई बा चांपत। 
कहिया घटी पानी मुहल्लावाला नापत।।
-नर्वदेश्वर पांडे देहाती का यह भोजपुरी व्य्न्ग्य राष्ट्रीय सहारा के 20/6/13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 13 जून 2013

हो गइल युद्ध विराम बोलù बचवा जै श्रीराम

मनबोध मास्टर बिहाने-बिहाने अखबार खोलते झूम-झूम के नाचे लगलन। मुंह से बस एक ही लकार- ‘ हो गइल युद्ध विराम, बोलù बचवा जै श्रीराम।’ मस्टराइन बोलली- केइसन युद्ध आ केइसन विराम। सजो सेना त अपनी-अपनी खेमा में रहल। ना तीर निकरल ना तलवार, एगो बुढ़हठ की रुठले आ मनवले के खेल के भारत में महाभारत बना दिहल गइल। मास्टर बोलले- इ द्वापर युग के महाभारत ना रहल जवना में भीष्म पितामह का छह माह ले वाण शैय्या पर सुते के परी। इ कलिकाल के महाभारत रहल। गुजराती लाल खातिर महाभारत रहल। महज 24 घंटा में ही बुढऊ भीष्म पितामह वाण शैय्या से खड़ा होके गावे लगलन- ‘ चांद ना बदलल , सुरूज ना बदलल, ना बदलल आसमान रे। केतना बदल गइल हाई कमान रे.। जेकरा के बइठवलीं गोदी, लगता उहे लोटिया डूबो दी, बुढ़ौती पर दिहलसि ना ध्यान रे. केतना बदल गइल हाई कमान रे.। गंजा कप्तान बनते मारि दिहलें छक्का, देख के हो गइलीं हम हक्का बक्का, धक्का लागल बहल दिल के अरमान रे. , केतना बदल गइल हाई कमान रे.।’
दरअसल भारत के भाग्य गोवा में रचल जात रहे। राजनीति में खेल हो गइल। सजो मामिला तेल हो गइल। शौर्य शक्ति के केंद्र बनि गइलन एगो गुजराती लाल। तबे बुढ़ऊ फुला लिहलन गाल। देश में चारो ओर मचि गइल बवाल। विरोधिन की घरे बधाई बाजे लागल। बुझाइल की पत्थर पर दूब जाम गइल। गोल भहराये लागल। गुजराती लाल की समर्थन में नवहन के खून खौले लागल, कुछ नवहा लोग बुढ़ऊ की दुआरि पर धरना-प्रदर्शन तक करे लगलें। भारत भाग्य रचे वाला दल में संकट खाड़ हो गइल विकराल। कई योद्धा, पुरोधा खटिया पकड़ लिहलन। केहू का खोंखी उपट गइल त केहू का जड़इया, केहू का निमोनिया। सेनापति जी अइसन शंख बजवले की सब सन्न रहि गइल। बेमारी के बहाना बतावे वाला लोग आपन-आपन सफाई देबे लगलन। बुढ़ऊ के मनावन शुरू हो गइल। बुढ़ऊ भी सोचलें की रूठल रहब त भागि भी रूठ जाई , चलीं मान जाई और बुढ़ऊ मान गइलन, महाभारत के पटाक्षेप हो गइल। येह घटना पर एगो कविता-
 बुजुर्गन से मुंह कबो मोड़ल ना जाला।
 लरिकन-फरिकन के दिल कबो तोड़ल ना जाला।।
 कुछ पाकल फल ढेंपी के बहुते मजबूत होलन।
 डाल तब तक ना छोड़ेलन, जबले पत्थर छोड़ल ना जाला।।
-नर्वदेश्वर पांडे देहाती का यह भोजपुरी व्य्न्ग राष्ट्रीय सहारा के 13 जून13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 6 जून 2013

ढील बा पेंच, की मिस बा चूड़ी, की मुड़ी पर कइलें शनिचर सवारी....

मनबोध मास्टर बिहाने-बिहाने अखबार खोलते माथा पीट लिहलन। अपराध की समाचार से भरल अखबार देख के दिमाग चकरा गइल। देवरिया की एम पी साहब की मुनीब से भी दु लाख छिना गइल। कूड़ाघाट में सत्या के गहना छिना गइल। रेलवे के जीएम आफिस की समनवे बैंक से पैसा निकाल के आवत रिटायर रेलकर्मी लुटा गइलें। दिव्यनगर में रंगदारी खातिर घर पर चढ़ के बदमाश फायरिंग कइलें। रेती चौक पर रिक्शा से जात बैंककर्मी पर तमंचा तान के बदमाश नकदी लूट लिहलन। सिसवा आ कप्तानगंज की बीचे जननायक ट्रेन में जीआरपी वाला एगो व्यापारी के लूट लिहलन। बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर, कुशीनगर में लूट-छिनैती के तमाम समाचार से अखबार अंड़सल रहे। लगत बा लूट के छूट मिल गइल बा। कुशीनगर वाला स्वर्गीय धरीक्षण बाबा के कविता याद आ गइल-‘ गुंडा स्वतंत्र, गोली स्वतंत्र/ बदमाशन के टोली स्वतंत्र/ छूरा स्वतंत्र, कट्टा स्वतंत्र, हिस्ट्रीशीटर पट्ठा स्वतंत्र..।’ एतना लुटात-पिटात, मरात-कुचात मनई की मन में एक बात के संतोष बा। संतोष येह बात के की बाबुजी (नेताजी)के वयान भी आजुए की अखबार में आइल बा। वयान के लब्बोलुआब इ बा कि बाबुजी के कहनाम बा कि हम राजा रहतिन त 15 दिन में व्यवस्था सुधार देतीं। मतलब साफ बा कि राज-काज ठीक नेइखे चलत। इ बाबुजी के भलमनसहित बा कि बेटा के कसत हवें कि पुत्तर पेंच कस दें। बाबुजी के नराजगी मीडिया से बा। कहत हवें- सरकार ने अच्छा काम ना लउकत बा। बाबुजी! माफ करब, कइसे समझावल जा। सफेद चकाचक कमीज पर यदि कहीं दाग लउकी त निगाह ओहीं न पहिले जाई। येह में निगाह के कवन दोष बा। दागदार कमीज पहने वाला के चाहीं कि दाग धोआ दें। राजनीतिक दल जहां एक ओर सूचना अधिकार अधिनियम के खुल्लमखुला विरोध करत हवें वहीं बाबुजी सीना ठोंक के कहत हवें कि पुत्तर के राज-काज ठीक ना चलत बा। येह के कहल जाला पारदर्शिता, ईमानदारी से स्वीकारोक्ति। बाबुजी का ठीक से पता बा कि कानून -व्यवस्था के चुनौती देबे वालन तत्वन पर लगाम ना लगावला की चलते ही 2007 की चुनाव में उनकी पार्टी से सरकार में गइला के ही लगाम लाग गइल रहे। लेकिन एगो सवाल सीना में चुभत अइसन लागत बा, उ इ कि जब बाबुजी के पार्टी सरकार में आवेले तबे बदमाशी काहें बढ़ि जाला?
लूट के छूट मिलल जइसे, रोज लुटात हवें नर-नारी। 
अइसे ही राज चलि यदि भाय, त उत्तम प्रदेश होय गुणकारी।।
 ढील बा पेंच, की मिस बा चूड़ी, की मूड़ी पर कइलें शनिचर सवारी।
 बाप कहें हम ठीक कर देतीं, बेटवा तूहीं दिहलù ह राज बिगारी।।
-मेरा यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के ६ जून १३ के अंक में प्रकाशित है .
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