गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

हंस चुगिहे दाना-तिनका अब कौवे मोती खाई..

मौसम के मिजाज भले कुंहासा की धुंध से भरल बा। लोग किकुरल बा, लेकिन परमोशन में आरक्षन की बात पर सियासत गरम बा। सूप त सूप अब चलनियो हंसति बा, जवना में बहत्तर गो छेद बा। नोकरी में आरक्षन की चलते मनबोध मास्टर पहिलहीं से दुखित रहलें, अब जबसे परमोशन में आरक्षन के बात सामने आइल त उनकर दुख दूना हो गइल बा। कहलें- हंस चुगिहे दाना-तिनका , अब कौवे मोती खाई..। बात कहब फरिछा, चाहे मीठ लागी चाहे मरीचा। एफडीआई की मसला पर सरकार के समर्थन देके ‘चाचा’ सीना फुलावत रहले। उनकर समाजवादी स्वरूप लोग पहिचान लिहल। जब परमोशन में आरक्षन के भांजा आइल त सरकार की सुर से अलगा सुर बना लिहलें। लोग बुझता, उनकर वोट बैंक बढ़ता। भगवावालन की साथे जीयत-मुअत रहे वाला सबरन लोग ठगा गइलन। अब कवना घाटे जांस, बड़ा असमंजस में जीव परल बा। सब माया के खेल बा। जवना दलित खातिर मैडम लड़ाकू भइल हई, ओके चुनाव में टिकट की बेर काहे ढकेल के पीछे क देली। सांच बात इ बा कि दलित समाज से ही जब केहू ऊंचकी कुरसी पर पहुंच जाला त उ दलित ना रहि जाला। उहो मनुवादी हो जाला। पांव छुअआवे लागे ला। बाबा साहेब कानून बनवले, तबसे बहुते दलित लोग के आरक्षन दियाइल। सुविधा दियाइल। गांवन में आके देखीं केतना सुधरल बा स्थिति। जे गांव छोड़ दिहल उ सुधरगइल। जे गांव में बा अबो दलित बा। असली आरक्षन के जरूरत जाति पर ना आर्थिक आधार पर होखे के चाहीं। कोटा में कोटा पर जे लंगोटा कस के लड़े के तैयार बा ओहु के आपन गुणा-गणित बा। एगो बात त बटले बा, योग्य आ प्रतिभाशाली लोग के रोक के कमजोर के बलशाली बनावे वाला नीति चली त इ अनीति ही कहल जाई। आरक्षन स्थायी समाधान ना हो सकेला। जरूरत येह बात के बा कि जे कमजोर बा ओके भोजन, आवास, शिक्षा, संसाधन देके मजबूत कइल जा। नोकरी पवला की बाद उ कमजोर ना बलजोर होई गइल हवें अब परमोशन की नाम पर काहे केहू के हक मारल जाई? मनबोध मास्टर के विचार से अपना के जोड़त हमार इहे कविता आज सधावल जाई-
मान बड़ाई देखकर, ‘सौदा’ कइले भाजपाय।
अब सबरन लोग का करे, कवना घाटे जाय।।
साई सजो आरक्षना, अब जाई दक्खिन टोल।
 आरक्षन की चलते सबरन बनल रही ‘बकलोल’।।
 â€˜प्रतिभा’ धंसि पाताल में, ‘कोटा’ उड़ी आकाश।
 काहें जांगर पेरी केहू, खूब होई उपहास।।
चाह जाई चिंता जाई, ‘उ’ होइहन बेरपरवाह।
संगे के साथी ओहीजा रहिहें ‘उ’ होइहन शाहनशाह।।
 रगरत रही सवर्ण सब, सुनी ना केहू टेर।
 कोटा कारन ऊंचकी कुरसी, मिलत ना लागी देर।।
फरक ना लउकी अब कहीं, कौन सिंह को स्यार।
आरक्षन की कारने, जइहे अगली कतार।।
 पांव के पनही उठ चली, कपारे ले चढ़ि जाय।
सिर के शोभा वाली टोपी, खूब जाय कचराय।।
 सिसक जाइ काबिलियत, ठहाका जाति लगाय।
दफ्तर दफ्तर विद्वेष बढ़ी, कोटा आंख देखाय।।
- मेरा यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 20/12/12 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

केहू खातिर बारह बज गइल केहू के पौ-बारह

बारह-बारह के महासंयोग। बुध की दिने सब शुद्ध रूप से निपट गइल। जीवन में 12 के बहुत महत्व बा। बारह घंटा के रात, बारह घंटा के दिन, साल में बारह महीना, हिंदू धर्म में 12 ज्योर्तिलिंग, एक फुट में 12 इंच, जन्मांग में 12 राशि। केहू के परेशानी में बजल बारह। केहू के खुशी में पौबारह। जनता साल में रियायती दर के 12 गैस सिलेंडर खातिर लालायित। अइसने कुछ बारह बतासी के बीज मनबोध मास्टर के बौराइल करेक्टर। राजनेतन के दोहरा चरित्तर। खामखयाली पोलाव खा के झूठ डकारे के प्रयत्न। जवना धरती की कोख से आजाद, भगत, सुभाष अइसन क्रांतिकारी पैदा भइलन ओही कोख से राजनीतिक व्यापारी भी पैदा होत हवें। जनता की बीचे बात कुछ और आ सदन में साथे केहू और के। बारह यादगार रही। बाहर चक्रवाहिनीवाला आ हाथीवाला एफडीआई की खिलाफ में खूब चोंकरत रहलें। सदन में ना जाने कवना सौदा पर हौदा से उतर सरकार की साथे हो गइलन। बर्हिगमन त बहाना रहल। हे भगवान! बारह में लोग के रूप बदलत देख के गिरगिट भी सरमाए लागल। चरखा दांव के माहिर पहलवान भी हाथीचाल चलि दिहलन। उनकर सायकिल जवन गांव, गरीब, छात्र, मजदूर, किसान के प्रिय सवारी रहल उ राजधानी में जाते सठिया गइल। ओकरा कैरियर पर एफडीआई के बंडल ढोवल जाता। अब उ वालमार्ट वाली अंग्रेजी भी बुझे लागलि बा। एगो बाति के प्रसन्नता बा पहलवान साहब, परमोशन में रिजर्ववेशन की खिलाफ लंगोट बांध के खड़ा हवन। खड़ा रहिहन त बारह के इतिहास जब भी लिखाई उनकर र्चचा होई। हाथीवाली मैडम दलित भाई लोग के परमोसन में भी रिजर्ववेशन खातिर लड़त हई त एगो सवाल मिसिर बाबा से उठावल जरूरी हो गइल बा। मिसिर जी! अब रउरे बताई, काहें कवनों पंडी जी शंख बजइहें आ हाथी के दिल्ली पहुंचइहें। पंडी जी लोग का कवन फायदा बा? बौराह लोग बारह से भी सवक सीख लीतें त 2014 में सब साफ हो जाइत, लेकिन तुलसी दल बनि के सबके पवित्तर कइला में लागि के अपने टुकड़ा -टुकड़ा होत हवें। नौकरी में त लेइ लिहलन, परमोसनवो में आरक्षन ले लीहें त सबरन लोग की लक्ष्कन खातिर बारह बजत रही आ ओ लोग के पौबारह होत रही। बारह-बारह-बारह की महासंयोग पर इहे कवित्तई मजा देई-
भाव के सुगना टें-टें बोले, बुद्दि के कुक्कुर भोंके।
 प्रेम में धोखा दिहल जाता, केहू ना रोके टोके।।
 मुख में राम बगल में छूरी, इहे दरसन दिखलाता।।
 हाथी दांत देखावे खातिर, भीतरे-भीतरे खाता।। 
जवना रात चान ना लउकल, कहेंले पूरनमासी।
 देख दशा देश के अपनी, कटता बहुत उदासी।। 
समय काल चक्र की चलते, आईल बारह-बारह। 
केहू खातिर बारह बज गइल, केहू के पौबारह।।

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

नारद बाबा झूम उठे,बजा-बजा करताल का सांचो में पूरा होई, पाल के उठल सवाल


गैस से बहुत परेशानी बा। जबसे सरकार रियायती सिलेंडर में कटौती कइले बा और गैस चढ़ि गइल बा। गैस की चढ़ला से घर- घर में घरकच, करकच बढ़ल बा। मरद- मेहरारू में रार, सासु-बहू में तकरार, जेठानी-देवरानी में दरार। इ गैस के सिलेंडर का-का ना करा दिहलसि। अच्छा-अच्छा शांतिप्रिय घरन में कलह चालू बा। केवाईसी की चलते सासु-बहू में बंटवारा, बाप -बेटवा में निबटारा, भाई-भाई में ललकारा होत बा। गैस की हाल पर बहुत बवाल बा। सबकर हाल बेहाल बा। अइसने माहौल में संसद में पाल साहब शून्यकाल में सवाल उठा के अपने सरकार के असहज क दिहलन। सवाल में दम बा। रियायती सिलेंडर बहुते कम बा। साल में कम से कम बारह गो सिलेंडर त चहबे करी। पाल साहब की सवाल पर लोग का राहत लउकत बा, लेकिन नारद बाबा के जीव चिहुकत बा। कहीं इ सवाल पाल साहब की सियासी शास्त्र की विधि से सेंकल राजनीति के रोटी गरम तावा पर सेंके खातिर ना न उठावल गइल। मामला कुछ भी होखे लेकिन पाल साहब खातिर घर की चुहानी से बड़की भौजी, काकी, चाची, दादी के दुआ बरसत बा। सब इहे कहत बा- जुग -जुग जीं ए पाल साहब! रउरा साल में बारह गो रियायती सिलेंडर दिया देतीं त लोगन के पौबारह हो जाइत। सिलेंडर की महंगी से जवना घर में दाल,भात, रोटी, सब्जी एक साथ चारो व्यंजन ना बनला के उम्मीद रहे, लगत बा ओहू घर में छप्पनो भोग लागी। लेकिन एगो सवाल त नारद बाबा की दिमाग में भी बवाल उठा दिहलसि। सवाल इ बा कि जवना कांग्रेस के पाल साहब नेता हउअन उहे कांग्रेस गुजरात की चुनाव में अपनी घोषणापत्र में दावा कइले बा कि जब सरकार में आई त रियायती दर के साल में बारह को सिलेंडर देई। का इ रियायत यूपी के लोग पवला के हकदार ना बा? आकी एइजा के लोग तब रियायती सिलेंडर पाई, जब एहुजा सपा-बसपा के बारी-बारी पारी दिहला की जगह पर भाजपा के शासन होई। भाजपा के बेदखल कइला खातिर ही कांग्रेस रियायती सिलेंडर देत बा। गैस की बवाल पर, आज की हाल पर, पाल की सवाल पर इहे कवित्तई मजा देई-
  नारद बाबा झूम उठे, बजा-बजा करताल।
 शून्यकाल में सवाल?, जुग-जुग जीयù पाल।।
 गैस की कारण होत बा, घर-घर में बहुत बवाल।
 कम से कम बारह गो सिलेंडर, चहबे करी हर साल।।
 महंगी की मरले से वइसे, लोग के हाल बेहाल।
रियायत पर मिली सिलेंडर, राहत कुछ तत्काल।।
 का सांचों पूरा हो जाई? पाल के उठल सवाल।
याकी खाली बाजत रही, राजनीति के झाल।।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

कूटù छांटù, हाउर-हाउर, खुद्दी अधिका, कम बा चाउर


मनबोध मास्टर मिललें। जैरमी भइल। पूछलें- काहो बाबा! का हाल बा? बाबा बोललें- हाल त बेहाल बा। लेकिन झूठों गाल बजावल जाता। ‘हउहाई के विआह कनपटिये ले सेनुर’ के दशा बा। यूपी में सरकार हाउर-हाउर सब माफ करति बा। लाभ केके केतना मिलता? जवना नहरन में सालों साल धूल उड़त रहे ओकर पनिवट माफ। जवना सरकारी टय़ूबवेल की गुल से सालों साल पानी के एगो बूंद ना बहरियाइल ओकर केइसन पनिवट? कहीं मोटर जरल बा, कहीं ट्रांसफार्मर। कहीं नाली टूटल बा त कहीं टंकी फूटल बा। नहर में टेल ले पानी आ सरकारी टय़ूबवेल से ठेल के पानी पहुंचावला की बाद यदि पनिवट माफ होइत त किसान गदगद हो जइतन। चुनाव में कहल गइल रहल कि सिंचाई मुफ्त। हम जनलीं प्राइवेट टय़बवेल जे लगवले बा ओकर बिजली के बिल माफ हो जाई, लेकिन हाल इ बा कि बिना बिजुलियो के बिल आवत बा। सरकार बैंक के पचास हजार तक के कर्जा माफ क दिहलसि। कवना बैंक के कर्जा माफ भइल? किसान भाई लोग त ग्रामीण बैंक, सेंट्रल बैंक आ स्टेट बैंक से कर्जा लेले हवें आ माफ भइल ओह बैंक के जवन पहिलहि के डूबल बा। प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री घोषणा कइले रहलें कि 15 नवंबर ले सजो सड़क ठीक हो जाई। गनीमत रहे कि इ ना कहलन कि फलां हीरोइन की गाल अइसन चिकन हो जाई। सड़क एतना चकाचक बा कि तनि देवरिया बाईपास पर आ जाई आ फकाफक धुर्रा फांक लीं। देसी पाउडर देहि पर एतना गिरी कि दिनवे में रउरा भूत अइसन लागब। अब तनि कानून व्यवस्था के अवस्था देखल जा। सोमवार की दिने लखनऊ की दूनों सदन में बसपाई भाई लोग खूब हंगामा कइल। करत रह हंगामा। जवना खाकी पर सूबा के सेवा आ सुरक्षा के जिम्मेदारी बा उहे लूट डकैती दुराचार में लागल बा। कई जगह पुलिसवाला पब्लिक की हाथे पिटइले। कई जगह पुलिसवाला गुंडई पर उतर गइलें। मोहद्दीपुर चौराहा पर ठेलावाली की जलेबी मुफ्ते में उड़ावेवाला लफंगा पइसा मंगला पर ठेलावाली से र्दुव्‍यवहार पर उतर गइलें। जब उ भाग के मोहद्दीपुर चौकी पर गइल त लफंगा ओहुजा लफड़ा क दिहलन। तोड़-फोड़ कइलन। पुलिस भींगल बिलार बनि गइल रहे, लेकिन शाहपुर की शक्तिनगर में पुलिस बहुत बहादुरी देखवलसि। दारू पी के दुगो सिपाही महिला सिपाहिन की कमरा के फाटक तोड़ के रात की बेरा घुसि गइलन। अब उनकर नीयत का रहे इ रउरा बुझते होखब। खैर बहुत कुटले -छंटले का होई। हम त इहे कहब-
कूटù-छांटù हाउर-हाउर।
खुद्दी अधिका, कम बा चाउर।
रसियाव के कहले जाउर।
अइसन बाटे राज इ राउर।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 29 नवबर 2012 के अंक में प्रकाशित है .

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

बीतल माह खूब तिहुआर चारु ओर जय-जयकार

बीतल माह खूब तिहुआर चारु ओर जय-जयकार
मनबोध मास्टर बहुत दिन बाद मिललें। रमरमी की बाद पूछलें- काहो बाबा! का हाल बा? बाबा बोललें- चारु ओर जय जयकार बा। महीना भर तरउपरिए तिहुआर पर तिहुआर पड़ल। सब अपना- अपना ढंग से मनावल। सालों साल मरद-मेहरारू के घरकच, करकच, कचाइन करंवा चौथ की दिने ना जाने कवना अंतरा में लुका गइल। चलनी में चनरमा के निहार-निहार मेहरारू चवनिया मुसकी मारि-मारि अपने मरदे के आरती उतारत रहली। करवाचौथ की बाद आइल दुर्गापूजा। नवहन के पूजा-पाठ में बड़ उत्साह लउकल। अपना माई के पयलग्गी कइला में परहेज करेवाला कुपुत्तर लोग भी दुर्गा माई के बड़का भक्त बनि गइलें। चंदा के धंधा त चलबे कइल, नचला-गवला-कमर हिलावला के भी खूब मौका मिलल। रहल-सहल कसर त विसर्जन की दिने पूरा हो गइल। आखिरकार बिना नशा-पानी के सड़क पर लोटा-लोटा नागिन छाप डांस बगैर कच्ची-देशी के कइसे होइत। दुर्गा जी विदाई भइल तवले धनतेरस के धूम मचल। अपनी-अपनी हैसियत की अनुसार चम्मच से लेके चांदी के सिक्का, गहना-गुरिया, मोटर-गाड़ी के खरीददारी भइल। ओकरा बाद आइल दियादियारी। सब के एक्के ललसा की लक्ष्मी माई आपन चंचला रूप छोड़ के हमरे घर स्थिर हो जाईं। माटी के दीया, मोमवत्ती आ हिंदुस्तानी झालर से लगत रहे लक्ष्मी मइया कम प्रसन्न होइहन सो चाइनिज झालर के झुला-झुला कुबेर के खजाना चीन भेजला के अप्रत्यक्ष इंतजाम भइल। दीवाली बीतल तवले गोधना आइल। गोबरो के दिन लौटल। गांव-गांव गोबर से गोबरधन बाबा बनावल गइल। बहिन लोग गोधन बाबा की दरबार में बइठ के अपनी-अपनी भाई लोग के खूब खाइल- चवाइल, श्रापल। ओकरा बाद गोधन बाबा के मूसरे से कूट दिहल गइल। गोधन बाबा के गजबै के लीला ह। उनकी दरबार में बहिन लोग जेतने अपने भाई लोग के श्रापल ओतने आशीर्वाद मिलल। गोधन कूटाते पिड़िया माई बनि गइलें। अब गांव-गांव पिड़िया माई की दरबार में रात की बेरा महीना भर लक्ष्की लोग के मंगलाचरन होई। भैया दूज की दिने ही चित्रगुप्त महराज के पूजा भइल। उहां का धरम-करम, पाप-पुन्य के लेखा जोखा राखिलन। परंपरा बा कलम-दावात के पूजा के। अब कलम त डॉट हो गइल आ दावात दुलर्भ। फिर भी चित्रांश भाई लोग पूजा पाठ खातिर दावात के सहेज के रखले हवन। चित्रगुप्त पूजा की बाद आइल छठ। नदी, ताल, पोखरा, गड़ही की किनारे जहां सालो- साल गंदगी पटल रहे,ओहु घाटन के दिन बहुरल। दीया-बाती जरल, धूपबत्ती सुनुगल। प्रसाद चढ़ल। मतलब की पूरा महीना पर्व की जय जयकार में बीतल।
बीतल माह खूब तिहुआर,
 चारु ओर जय- जयकार।
करवां चौथ आ दुर्गा पूजा,
 धनतेरस आ लक्ष्मी पूजा।
गोधन बाबा कूटल गइलें,
 चित्रगुप्त जी पूजल गइलें।
छठ मइया भी खूब अघइली,
 ताल पोखरा गड़ही अइली।

- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के 22 नवम्बर 2012 में प्रकाशित है

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

पिता रत्न’ की प्राप्ति पर बधाई हो, बधाई..

पुत्र रत्नकी प्राप्ति के खबर के बाति पुरान हो गइल। अब नया दौर मेंपिता रत्नकी प्राप्ति के चलन बा। शर्मा लमहर लड़ाई जीत लिहलें। उनके बहुते बधाई। अदालत सावित ù दिहलसि कीतिवारीही शर्मा के बाबुजी हवें। महतारी के दामन उज्ज्वल हो गइल। उनकी लड़िका के पिता रत्न के प्राप्ति हो गइल। मगन होके मनबोध मास्टर सोहर गावे लगलें- ‘जुग जुग जीयù तू ललनवां, भवनवां के भागि जागल हो। करि लिहल आपन मुंह उजियार, तिवारी के करिखा लागल हो .मस्टराइन कहली- सोहर लक्ष्का भइला पर गावल जाला, बाप भइला पर का गावत हई ? शर्मा के पिता रत्न ù एगो नमूना ह। राजनीति की गलियारा में तमाम अइसन पिता लोग अबहिन सांड-भैंसा अइसन घूमत हवें। जेइसेजियता बाछाके जवरिया ढाहि के कूट दिहल जाला, ओइसने कुछ उनका साथे कइला के जरूरत बा। केतने माता लोग अपनी संतान के बाप के नाम दिलवावे खातिर संघर्ष करत हई। चित्रकूट की घाट पर कवो संतन के भीड़ जुटत रहे। तुलसीदास चंदन घिसत रहें। रघुबीर जी तिलक लगावत रहलें। येह घरी ओह घाट पर लंठन के भीड़ होत बा। चित्रकूट की पवित्र धरती पर कमला नाम की एगो नारी के अस्मत लूटि के ओकरा कोख में आपन अंश पलवावे वाला दद्दू के दबंगई दादागिरी की प्रवृति ओह महतारी की संतान के पिता रत्न से वंचित ù दिहलसि। दद्दू बसपा सरकार में मंत्री रहलें। बहुजन के हीदुरजनपुरुषोत्तम शीलू नाम की एगो नाबालिग के शील भंग ù दिहलन। अब जेल में मजा मारत हवें। कवियित्री मधुमिता जब कोख में पल रहल बच्चा खातिर पिता रत्न के मांग कइली, ù जान से गइली। अइसन बहुत उदाहरण खद्दरधारी जमात से मिली। गोरखपुर रेलवे प्लेटफार्म पर तीन लक्ष्का। नाम- प्रिंस, कुमार गोलू.. उम्र- क्रमश: 10,11, 12 बरिस। निवास- फुट ओवरब्रिज के नीचे के कोन्हाड़ी। काम-रेलवे ट्रैक से प्लास्टिक के खाली बोतल बिन के फिर पानी भरके ट्रेन में बेचल। पिता रत्न के महरूम। लावारिस। बहुत पता कइला पर बस इहे जानकारी मिलल कि अंहरी के लक्ष्का, पगली के लक्ष्का,भिखमंगिनियां के लक्ष्का। अइसने बहुत उदाहरण रउरो के मिल जाई।तिवारी जीके मौसिआउत भाई लोग आपन पाप उत्पन्न ù दिहलें लेकिन बाप बनला में परहेज ù गइले।इ समाज के एगो बिद्रुप चेहरा ह। येही चेहरा में कई पिता रत्न हवें। काश! हर लावारिस लक्ष्कन के पिता रत्न के प्राप्ति हो जाइत। कानूनी वारिस मिल जइतन। लेकिन असंभव बा, काहें कि हर लावारिस लक्ष्का रोहित अइसन जंग ना लड़ सकेलन। चार लाइन के कविता देखीं केतना सधत बा
प्िाता रत्न की प्राप्ति पर, बधाई हो बधाई।
 मुहब्बत से अदावत तक, वफा से बेवफाई।।
तिवारीतो बस नमूना हैं, गली कूंचे में मौसरे भाई।
 पिता का नाम अज्ञात, पुत्र ले भटक रही माई।।
हम अपनी ब्लॉग पर राउर स्वागत करतानी | अगर रउरो की मन में अइसन कुछ बा जवन दुनिया के सामने लावल चाहतानी तअ आपन लेख और फोटो हमें nddehati@gmail.com पर मेल करी| धन्वाद! एन. डी. देहाती

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