शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

शास्त्र परी जो पंसारी के पाला..., पढ़ी नाहीं, ऊ बेची मसाला...

मनबोध मास्टर कहलें- ‘ केकर-केकर लेई नाव, धोती खोलले सगरो गांव’। धोती से मतलब तन ढांके वाला पांच गज के कपड़ा से ही ना बा। धोती मर्यादा ह, इज्जत ह, प्रतिष्ठा ह, मान ह, सम्मान ह, पहिचान ह सभ्यता आ संस्कृति के। केतना लोग के धोती बांस की पुलई टंगा गइल। इ अनपढ़- गंवार के मटमैली धोती ना रहल। इ धोती बहुत झकास, चमकदार रहल। रूपांतर मे येके कहीं वर्दी कहीं बाना कहल गइल। बाना में जे बंधि के ना रहलन त संत, महंत, समाजसेवी, शासक, प्रशासक. के बड़ा छिछालेदर भइल। बचपन में पढ़ल गइल- ‘ महाजनो येन गत: स पंथा’। मतलब, समाज के श्रेष्ठ लोग जवना राह चलें, ओकर अनुकरण करे के चाहीं। केकर अनुकरण कइल जा। धर्म गुरु, बड़ अफसर, जज, नेता, शासक, प्रशासक, पत्रकार.। दूसरा के नैतिकता के पाठ पढ़ावल बहुत आसान बा। अपनी गिरेवान में झांकल बहुत विकट। बात बिरादरी (जाति ना पेशा) से ही करत हई। एगो समय रहे चारों ओर तहलका, तहलका। अब त- हलका हो गइल। तरुण की तरुणाई में एक से एक स्टिंग। भूचाल आ जात रहे। अब ईमानदार मीडिया ट्रायल पर कइसे लोग भरोसा करी जब अपने में छिहत्तर गो छेद। अवला जब अत्याचार के खिलाफ खड़ा होलिन त बला बन के पीछे पड़ेलिन। रउरा सभ की सामने उदाहरण बा कथावाचक आसाराम, स्वामी नित्यानंद, नारारण साई अइसन ऊंचा लोग भी मार्ग से भटकलें त ओछा लोग की श्रेणी में आ गइलन। हरियाणा बेहतर नस्ल की सांड खातिर विख्यात रहल। एगो डीजीपी तब कुख्यात हो गइल जब टेनिस खिलाड़ी रुचिका गिरहोत्रा छेड़छाड़ के आरोप लगवली। सांड नथाइल, जेल भेजाइल। पंजाब के डीजी भी अइसने एगो मामला में जेल के हवा खइलन। और भी बहुत उदाहरण बा। मोटा-मोटी कहे के बा कि मन के तरंग मारि लीं। जब मन बौराई त अइसने अनैतिक आ ओछा काम हो जाई जवना से धोती टंगा जाई। मन के तरंग ना मराई त बुरा विचार उठी। बुरा विचार की चलते ही कई जने साधु-संत, सांसद-विधायक, वकील-जज, पत्रकार-संपादक, शासक-प्रशासक पर भी संगीन आरोप लगल। धोती टंगल, जग हंसाई भइल। सभ्य, शिक्षित कहाये वाला समाज के अगुआ लोग जवन बहुत ज्ञानी हवें। बहुत शास्त्र पढ़लें, लेकिन एतना शास्त्र पढ़ला की बाद भी जेकर मन भटक गइल ओकरा पर इहे कविता-
शास्त्र परी जो पंसारी के पाला। 
पढ़ी नाहीं उ बेची मसाला।। 
संत की भेख में कालनेमि बन,
 जपल करी उ झूठ के माला।।
- भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 28/11/13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

भारत रत्न के महाभारत

भारत रत्न पर महाभारत जारी बा। मनबोध मास्टर महाभारत रत्न के मांग करत हवें। जबसे क्रिकेट के भगवान जी की बखरे भारत रत्न गइल। कई जने के पेट गुड़गुड़ाये लागल, कई जाने के उल्टी-दस्त शुरू हो गइल। बहुत बदहजमी, बहुत गैस, बहुत विकार। अरे भाई! खफा काहे होत हवù? सत्ता हमार, मर्जी हमार, रत्न हमार। हम जेके दे देई ,हमार मर्जी। रहल बात रत्न विवाद के त आदिकाल में जब समुद्र मंथन से 14 गो रत्न निकरल तबो विवाद भइल। उ विवाद देव आ दानव लोग की बीच के रहे आज मानव-मानव की बीच के बा। सचिन, सवा अरब हिंदुस्तानिन के निर्विवाद हृदय सम्राट हवें। सचिन महान हवें। क्रिकेट के भगवान हवें। नवहन के शान हवें। भारत के पहचान हवें। येह सबके बाद भी संन्यास लेबे की बेरा दिहल गइल सम्मान पर विवाद उठल बा। संन्यास के मतलबे होला देश-दुनिया, मोह-ममता, धन-दौलत, मान-अपमान, पद-प्रतिष्ठा आदि तमाम चीजन से विरक्ति के। सम्मान त कबो दिहल जा सकेला। कई लोग के मरणोपरांत भी मिलल। उ सरग से लेबे ना अइलें, परिजन ही पा के गदगदा गइलें। केतना रगरला की बाद भी लोग देश की सर्वोच्च सम्मान के हकदार ना बन पावेलन। बहुत दिनन ले पड़ल- पड़ल फाइल पर गर्दा के मोट पर्त पड़ जाला लेकिन अबकी चट मंगनी पट विआह हो गइल। सत्ता-शासन यदि संन्यास की समय सम्मान ना देत त शायद अइसन बात ना उठत। लगत बा भारत रत्न के राजनीतिकरण हो गइल बा। अगर राजनीतिकरण ना रहित त विवाद ना उठत। विवाद पहिला बेर भी ना उठल बा। पंडित भीमसेन, उस्ताद विस्मिल्ला खान, लता मंगेशकर, अमृत्य सेन, पंडित रविशंकर, एसएस सुब्बुलक्ष्मी, गुलजारी लाल नंदा, डा एपीजे अब्दुल कलाम, सत्यजीत राय, जहांगीर रतनजी दादा भाई टाटा, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, मोरार जी देसाई, सरदार वल्लभ भाई पटेल, राजीव गांधी, नेल्सन मंडेला, डा भीम राव अंबेडकर, खान अब्दुल गफ्फार, मदर टेरसा, वीवी गिरि, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, डा राजेंद्र प्रसाद, डा विधान चंद राय, गोविंद वल्लभ पंत, जवाहर लाल नेहरू, सर डाक्टर मोक्षगुंडम विश्वसरैया, सर्व पल्ली डा राधाकृष्णन, चंद्रशेखर बेंकेट रामन, चक्रवर्ती राजगोपाल चारी.. के भारत के सर्वोच्च सम्मान मिलल। लगता लाल बहादुर शास्त्री के छोड़ के हर वेर कुछ ना कुछ बात उठल। अबकी तनिका अधिका उठ गइल। सब कर आपन-आपन नजरिया। सचिन को सलाम। एक बेर ना हजार बेर। अब इ कविता -
 यदि काम का हो, तो चेहरा खिला-खिला दिखता है।
 किसी काम का नहीं, तो रोगी जस पीला दिखता है।।
 दोष चेहरे पर क्यूं , आंख के चश्मे पर लगाइए जनाब।
 कलमुंही राजनीति , कभी टाइट कभी नारा ढीला लगता है।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 21/11/13 के अंक मे प्रकाशित है .

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

उठहुं ये देव उठहुं सोवत भइले बड़ी देर..

देवोत्थानी एकादशी। देव के उठला के दिन। चार महीना से सोवल देव के जगावत इहे कहल गइल- उठहुं ये देव उठहुं, सोवत भइले बड़ी देर। एकादशी के दिन गन्ना के गांठ तोड़ला के परंपरा याद आइल। गांवन में कहल गइल- काहो भाई! ऊंख के गुल्ला फराइल? मनबोध मास्टर जब इ सवाल सुनलें त अतीत के पन्ना दिल-दिमाग में फरफरा के पलटे लागल। का जमाना रहे जब लोग कहे दस कट्ठा ऊंख बा , कवना बात के दुख बा। तब ऊंख खेत, ऊंखिहाड़, कोल्हुआड़ में मुफ्ते मिलत रहे। आज शहर में खरीदे गइलीं त चालीस रुपया जोड़ा। ऊंख की याद में बंसवारी तर के कोल्हुआड़ याद आ गइल। का जमाना रहे। कचरस, महिया, किकोरी,लवाही, भेली, पीड़िया आ चिटौरा..। आज की लक्ष्का त येह सबके नाम के अर्थ ना बुझिहें, स्वाद का बतइहें। बांस की सुपेली पर कराहा से गुरदम की सहारे निकालल गरमामरम महिया चेफुआ से चटला के स्वाद। गजब के टेस्ट। हमार पूर्वाचल चीनी के कटोरा कहल जात रहे। अंगरेजन की जमाना में 1903 में देवरिया जिला की प्रतापपुर में पहिलका चीनी मिल खुलल। समय आगे बढ़ल 1930 तक देवरिया जिला में 14 चीनी मिल लाग गइल। देश आजाद भइल। गन्ना आंदोलन की सहारे ही बहुत लोग लखनऊ-दिल्ली पहुंच गइलन। दिन-दशा खराब भइल। शासक लोग एका-एकी कर के मिल बेच दिहलन। अब गन्ना में ही ना क्षेत्र में ही कंडुआ, उकठा अइसन रोग लाग गइल। पूर्वाचल में दस लाख किसान गन्ना बोअत रहलें। अब गांव में खोजले दस मनई भी ना मिलत हवें जे ऊंख के सुख उठावत होंखे। ऊंख सामाजिकता- सामूहिकता के मिसाल रहे। खेत में गेड़ी गिरावला, गेंडसज, झोरला, सींचला, कटला, छीलला, पेरला, पकवला सब में सहयोग के मिठास रहे। ऊंख की सीजन में कोल्हू आ कराहा चाट के गांव के कुक्कुर भी पिलहठा हो जात रहलें। मसलन, ऊंख समृद्धि के फसल रहे। सब ओरा गइल। कालांतर में शंखासुर के मारि के युद्ध के थकान मिटावे खातिर देव क्षीरसागर में जाके सुत गइलें। आषाढ़ अंजोरिया की एकादशी के दिन से सुतल देव कार्तिक अंजोरिया की एकादशी के जगलें। देव के जगते गांव के लोग ऊंख के गुल्ला फारे लागल। शहर के लोग गन्ना के गांठ तोड़े लागल। अइसन सुअवसर पर एगो संकल्प लिहला के जरूरत बा- देव जाग गइलीं। हम्मन में देवत्व जगा दीं। जन- जन में प्रेम के प्रकाश फैला दीं। भ्रष्टाचार रूपी शंखासुर के वध कइल जाई, तब गन्ना के गांठ तोड़ला के पुण्य प्राप्त होई। अब इ कविता-
श्रीहरि विष्णुजी जग गइलें, अब रउरों जग जाई। 
शंखासुर की समर्थकन के, धरा से मार भगाई।। 
देवत्व के ज्योति जगा के, असुरत्व मेटाई।
 देव दीपावली की दीया से, अंधकार मिटाई।।
- नर्व्देश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 14/11/13 के अंक मे प्रकाशित है 

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

सूपा बाजल, दलिद्दर भागल

कातिक के महीना। पर्व के दिन। घर-घर दीया बराइल। लक्ष्मी जी आ गइली। सूपा बाजल। दलिद्दर भागल। गोधन कूटाइल। पीड़िया लागल। कलम-दावात के पूजा भइल। चित्रगुप्त महराज प्रसन्न हो गइलें। चांद लउकल। मोहर्रम शुरू हो गइल। इमामबाड़ा में शहनाई बाजल। इमाम चौकन पर ताजिया सजाये लगली। छठ आ गइल। नयाह-खाय-खरना-अघ्र्य की तैयारी में लागल लोग। सालोंसाल गंदगी आ कचरा वाली जगह पर साफ-सफाई की साथे छठ के बेदी बने लागल। पर्व के सफर, त्योहार के सिलसिला, अइसे ही चलत रही। मनबोध मास्टर सोचे लगलें- महंगाई पर रोज- रोज रोवे वाला मनई के हाथ भी त्योहार पर सकेस्त ना भइल। खूब खरीदारी भइल। इ भारतीय उत्सव ह। उत्सवधर्मिता में कहीं कवनों कंजूसी ना। धनतेरस की दिने से ही त्योहार के उत्साह शुरू बा। त्योहार हम्मन के संस्कृति ह। केतना सहेज के राखल बा। धनतेरस के एक ओर गहना-गुरिया, वर्तन- ओरतन, गाड़ी-घोड़ा किनला के होड़ त दूसरी ओर भगवान धन्वंतरि के अराधना- जीवेम शरदं शतम् के अपेक्षा। प्रकाश पर्व पर दीया बारि के घर के कोने-अंतरा से भी अंधकार भगा दिहल गइल। जग प्रकाशित भइल। मन के भीतर झांक के देखला के जरूरत बा, केतना अंजोर बा? ये अंजोर से पास- पड़ोस, गांव-जवार, देश-काल में केतना अंजोर बिखेरल गइल? दलिद्दर खेदला के परंपरा निभावल गइल। घर की कोना-कोना में सूपा बजाके दलिद्दर भगावल गइल लेकिन मन में बइठल दलिद्दर भागल? दुनिया की पाप-पुन्य के लेखा-जोखा राखे वाला चित्रगुप्त महराज पूजल गइलें। बहुत सहेज के रखल गइल दुर्लभ कलम-दावात के दर्शन से मन प्रसन्न हो गइल। अपनी कर्म के लेखा-जोखा जे ना राखल ओकरी पूजा से चित्रगुप्त महराज केतना प्रसन्न होइहन? मोहर्रम पर तलवार, बल्लम, बंदूक, लाठी-डंडा जुलूस में हर साल देखल गइल। इ जुलूस के शोभा ह। इ हथियार केहू की रक्षा खातिर केतना बार निकरल? येहू पर विचार करे के चाहीं। छठ माई के घाट अगर साल के तीन सौ पैंसठों दिन एतने स्वच्छ रहित त केतना सुन्नर रहित। पर्व-त्योहार के जड़ हमरी संस्कृति में बहुत गहिर ले समाइल बा। ओके और मजबूत बनावला के जरूरत बा। संकल्प लिहला के जरूरत बा की फिजुलखर्ची में कटौती क के ओह धन से कवनो जरूरतमंद के सहयोग क दिहल जा। अइसन हो जाय त त्योहारन के सार्थकता और बढ़ जात। खूब खुशी मनावल जा, लेकिन केहू के दुख ना पहुंचे येह पर ध्यान दिहला के जरूरत बा। येह कविता की साथे सबके प्रति शुभकामना, सबको मुबारक।
 दीया बराइल, लक्ष्मी अइली।
 सूपा बाजल, दलिद्दर भागल।
 भैयादूज के गोधन कूटइलें, 
 रड़ूहन के तिलकहरू अइलें।
 मोहर्रम के तासा बाजी ,
 इमाम चौक पर मेला लागी।
 छठ मइया के अघ्र्य दियाई, 
सब्जी आ फल खूब किनाई।
- नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 7/11/13 के अंक मे प्रकाशित है .
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