गुरुवार, 26 सितंबर 2013

चलि गइलें मोहन बिसारि के पिरितिया

आज सरयू उदास हई। बहुत उदास। सरयू की गोद में सदा खातिर समा गइलन समाजवादी चिंतक मोहन बाबू। बस रह गइल उनकर याद। गांव-जवार से बहुत प्रेम रहल। अब सबकी मुंह से इह निकरत बा- ‘चलि गइलें मोहन, बिसारि के पिरितिया’। जे आइल बा, उ जाई । इ सास्वत सत्य ह। कुछ लोग होलन जवन गइला की बाद भी याद रहेलन। मोहन बाबू भी अइसने रहलन। मनबोध मास्टर की जेहन में मोहन बाबू के गइला के दुख चस्पा बा। बड़ा करीब से मोहन बाबू के नीति-रीति देखल गइल रहे। आज सियासत के अलम्बरदार अर्थी के कन्धा देत हवे। इ खाली फर्जअदायगी ना ह। बहुत कुछ सोचे-समझे के भी मौका देत बा। केतना ऊंच बा अर्थी आ केतना नीचे बा कन्धा। तस्वीर त सांच ही बोलति बा। उमड़त जनसैलाब, टूटत दलीय सीमा आ चारों ओर मोहन बाबू के जय-जयकार। सियासत में चाल-चरित्र-चेहरा के बात कइल जा त छात्र जीवन से ही राजनीति में कूदल सामाजिक पहुरुआ अंत समय तक समाजवादी ही रह गइल। जवना विचारधारा के डोर जवानी में धराइल बुढ़ारी तक ओही के धइले रहि गइलें। धीर-गंभीर, बात- बेबाक, चिंतन-मंथन, लोकप्रिय-जनप्रिय, विनम्र- कुशाग्र सब विश्लेषण मोहन बाबू से जुड़ल लउकेला। सब की बाद भी उ एगो नेक इंसान रहलन, इंसानियत कूट-कूट के भरल रहे जवन नेतागीरी में कमे पावल जाला। जे उनकी लेखन के मुरीद रहे उनकी चेहरा में ओकरा नेता कम लेखक, साहित्यकार, पत्रकार के अक्स ज्यादा ही लउकत रहे। मोहन बाबू से जुड़ल कुछ स्मृति रउरा सभ से साझा क के दुख के बोझ कुछ हल्लुक कइल चाहत हई। मोहन सिंह बहुत धीर- गंभीर नेता रहलन। तीन गो घटनाक्रम बतावत हई जवना पर मोहन बाबू बहुत हंसले रहलें, आ का कहले रहलें, उहो याद बा। 1989 की विधान सभा चुनाव में बरहज से मोहन बाबू चुनाव लड़त रहलें। हमरे गांव में प्रचार करे आइल रहलें। गांव में यादव जी लोग के दुआरि पर बांस की पुलुइ पर निर्दल प्रत्याशी के चुनाव चिन्ह सायकिल ( तब सपा के जन्म ना भइल रहे) बान्हल देख के कहले- ‘ जतिगो ज्यादा होता का? लगता अब जातिवाद की ही भरोसे लोग राजनीतिक वैतरनी पार करी।’ मोहन बाबू के बात सच साबित भइल आ समाजवाद के परंपरागत वोट निर्दल प्रत्याशी की ओर खिसक गइल आ मोहन बाबू चुनाव हार गइलन। 1996 में सलेमपुर से संसदीय सीट खातिर पर्चा भरलन। बहुत विरोध भइल। बाद में मोहन बाबू के टिकट कट गइल आ सहाय जी के टिकट मिलल त कहले रहलन- ‘ पार्टी में अंदरुनी लोकतंत्र जिंदा बा।’ 2009 में देवरिया से संसदीय सीट के चुनाव लड़त रहलन। जनता के रुझान बसपा प्रत्याशी की ओर बढ़ल जात रहे। मोहन बाबू से फोन पर पूछलीं- नेता जी ! राउर का पोजिशन बा? मोहन बाबू कहलें-‘ प्रत्याशी टिकट खरीद के ले आइल बा, अब वोट खरीदत बा। अइसन खरीद-फरोख्त में हमार पोजिशन ठीक ना बा।’ इ तीन बेर के तीन बात आज की राजनीति पर बहुत कुछ सोचे समझे आ बतकुचन करे खातिर काफी बा। अपनी येही शब्दन से मोहन बाबू के श्रद्धांजलि देत इ कविता-
 रुष्ट होके भी कभी, दल से नाता ना तोड़ा।
 राह में आई मुश्किल बहुत, मंजिल से मुंह ना मोड़ा।।
 सियासत की चाल ऐसी है, लोग बदल जाते हैं चंद लम्हों में।
 मोहन ने ताउम्र कभी समाजवादी विचारधारा ना छोड़ा।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्यन्ग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 26/9/13 के अंक मे प्रकाशित है . 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

डीजे बाजे, डंडा बाजे बाज रहे इंसान..

 बाज रहे इंसान.. साधो! झूठ ना बोलावें। झूठ बोले त कौआ ना, कुक्कुर काट ले, पागल., अवारा., सनकी.। मनबोध मास्टर आज सब कह दीहें अपने मन की। चारों तरफ बजनी-बजना के माहौल बा। बात कहां से शुरू कइल जा, इहे ना बुझात बा। पब्लिक बिजली खातिर बाजति बा। पुलिस के डंडा बाजत बा। पॉलिटिशयन श्रेय लूटे खातिर चंग बजावत हवें। पुलिस के लीला भी गजबे बा। अपने क्षेत्र की विधायक के ना पहिचानत हवें, अपराधिन के का पहिचनिहें? रहनुमा की गिरेवान में हाथ डाल सकेलन लेकिन कवनो रहजन के ना पकड़ सकेलन। शहर के पुलिस ‘ बबरुबाहन के सेना’ बन गइल बा। अट्ठारह दिन के महाभारत एके दिन में खत्म कइला में लागल हवें। सिंघड़िया में बिजली खातिर बवाल होखे, चाहे रुस्तमपुर में सड़क खातिर प्रदर्शन। तरंग क्रासिंग के मामला होखे चाहें हट्ठी माई थान के गणोश प्रतिमा विसर्जन। बबरुवाहन के सेना जनता के खूब सेवा कइलसि। जब-जब पुरुआ बही सेवा याद रही। एगो बात और बेबाक। चुनावन में कई रंग के झंडा लउकेला, बहुते नेता लउकेलन। मौजूदा वक्त में जनता परेशान बा त उ नेता लोग कवना कन्दरा में लुकाइल हवें? पब्लिक जहां-जहां पिटाति बा, बाबाù-बाबाù चिल्लाति बा। बाबा आवत हवें, बाबा धावत हवें। घाव पर मरहम लगावत हवें, प्रशासन के गरमावत हवें। जनता जयकार लगावति बा। सजो दर्द खत्म। सवाल इहो उठत बा कि विसर्जन चाहें विदाई त जुदाई के माहौल होला। भक्त लोग काहें डीजे बजावेलन? काहें डांस देखावेलन? काहें ज्यादा चढ़ावेलन? नर्सेज हास्टल चाहे महिला छात्रावास देखते जोश काहें दूना हो जाला? अइसन श्रद्धा की सहारे काहें भक्ति के श्राद्ध कइल जाता? येह बारे में कबो सोचल गइल? पूजा नेम-धरम के चीज रहल। नेम-धरम ताक पर रख के चंदाउगाही, पियक्कड़ई, नाच-गाना( भक्तिरस के ना, भोड़ा रस के) बढ़त जाता। इ के रोकी? धीरे-धीरे इहे परंपरा बनल जाता। प्रतिमा स्थलन पर बाजत लाउडस्पीकर से मंत्र, अराधना, भजन, प्रार्थना, आरती के स्वर कम सुनाई आ गंदा गीत के संगीत से पांडाल पवित्र होई त देवी-देवता कइसे प्रसन्न होइहन। जिला की बड़का साहब के एगो बात बहुत नीक लागल-‘ शहर की तीस-चालीस मूर्तियन के विसर्जन करावला में इ हाल बा त दुर्गापूजा में चार हजार प्रतिमा विसर्जन के स्थिति कइसे सम्हराई?’ बोल-बबरुबाहन। ना बोलबù त सुनù कविता 
डीजे बाजे, डंडा बाजे, बाज रहे इंसान। 
बांस की पुलुई कानून के लुग्गा, टांग करे घामासान।।
 बिगड़ रहल कानून व्यवस्था, चहुंओर बस हुड़दंग। 
पब्लिक-पुलिस-पॉलिटिशियन पीटें, आपन-आपन चंग।।

-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्य्नग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 19/9/13 के अंक मे प्रकाशित है.




गुरुवार, 12 सितंबर 2013

कहां-कहां पेवन सटब$

मनबोध मास्टर प्रदेश की दुर्दशा पर बहुत दुखी हवें। सीधा सवाल सूबा की नरेश से ही दाग दिहलन- का हो नरेश! लगता कुछऊ ना बची शेष। ‘ कहां-कहां बादर फाटी, कहां-कहां पेवन सटबù’। प्रदेश के छवि तार-तार होत बा। प्यार के बात रार के बात हो जात बा। मामला एतना खार हो जात बा की मार हो जाता। लोकतंत्र में हिंसा के जगह ना होला लेकिन रउरी राज में दु दर्जन से ऊपर त सांप्रदायिक दंगा हो गइल। सांप्रदायिक हिंसा जेतने दुर्भाग्यपूर्ण ओतने चिंताजनक। वैमनस्यता बढ़त बा। प्रदेश जरत बा। लोग राजनीति करत बा। दंगा-फसाद तù सभ्य कहाये वाला शहर में सुनल जात रहे। गांवदे हात त सामाजिक सद्भाव की मजबूत ताना-बाना से बनल रहल। बगैर एक दूसरे की सहयोग से कमवे ना चलत रहे। कबुरगाह की बगइचा में दूल्हा के परछावन,रामलीला मैदान में तजिया के मेला हमरी गांव के पहचान रहे। फगुआ की दिने करिंयाय में ढोलक बांध के सुलेमान चाचा दुआरी-दुआरी ‘ सदा आनंद रहे येही द्वारे.’ के दुआ देत रहलन। रंग-अबीर से सराबोर सुलेमान चाचा पर जब पंडीताइन छपाक से एक बाल्टी पानी फेंक दें त चचवा के कबीर शुरू हो जात रहे। एतना भद्दा..एतना फटहा. एतना गंदा..। केहु बाउर ना मानल। रमई तिवारी मोहर्रम पर जवन तासा बजावें मियां लोग का बजायी। दस दिन ले रमई तिवारी के तासा आ घरभरन सिंह के तमाशा देखे खातिर तिवारी टोला के पंडीताइन लोग अदालत मियां की बंगला पर जुटत रहे। घरभरन सिंह के गदका भांजल देखे खातिर मियांइन लोग झरोखा से बुरका हटा के झंकले बिना ना रहें। कहीं कटुता ना। कवनो द्वेष ना। ‘ माहौल अशांत, स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंतण्रमें’ अइसन शब्द शहर में रहल। गांव-देहात के लोग एकर मतलब तक ना बुझत रहे। बड़-बड़ विवाद अदालत मियां की बंगला चाहे जंगली पांड़े की घोठा पर पंचाइत में निबटा दिहल जात रहे। अब महापंचायत के जमाना आ गइल। मुजफ्फरनगर, मेरठ, शामली सांप्रदायिक उन्माद की आग में जरता। सेना लगावे के परता। जालीदार टोपी पहिन के मुख्यमंत्री जी मीडिया के संबोधित करत हवें। वोट बैंक के विकृत राजनीति आ तुष्टीकरण के एतना घटिया प्रदर्शन। यूपी रसातल में जाता आ लोग का मिशन 2014 लउकत बा। इ राजनीति बहुत बेह्या, बहुत बेर्शम बा। गांव-देहात, घर-परिवार में दरार डार दिहलसि। अब अदालत मियां की बंगला आ जंगली पांड़े की घोठा पर कवनो पंचाइत ना होई। अब होई ‘ महापंचायत’। सुलेमान मियां की ऊपर रंग के एको छींटा पड़ी त दंगा हो जाई। रमई तिवारी आ घरभरन सिंह अपनी दुआर से तजिया ना निकले दीहें। केहू रामलीला मैदान में तजिया मेला लगवा के देखा दे। कबुरगाह की बगइचा में परछावन ना होखे दिआई। इ सब काहे होत बा? सबकी पीछे एके कारन बा-
 गांव जर जाय त जर जाय। 
लरिका के अल रह जाय।।
-नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह भोजपुरी व्य्नग्य राष्‍ट्रीय सहारा के 12/9/13 के अंक मे प्रकाशित है.

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

देश होता खोंखड़, घाव होता गहीर.

मनबोध मास्टर सरकार की प्रशंसा में पुल बांध दिहलें। भाई पुल त जरुरिये बा। ‘ सियार के विआह ’ एतना बरखा में भी शहर की सड़क पर पानी जवन हिलोर मारे लागत बा। अब कई जने पढ़लिलखल कहिंहे- यह सियार का विवाह क्या होता है? अरे भाई! गांव-देहात में जब एक ओर दइब घाम कइले रहलन आ दूसरा सिवान में पानी बरसत लउकेला त ओके सियार के विआह ही कहल जाला। सरकार के प्रशंसा होखहि के चाहीं। सरकार बहुत उदार बा। छप्परफाड़ के देत बा। जे बेरोजगार बा ओके बेरोजगारी भत्ता देत बा। भइया लोग के लवलाइटिस ध लिहलसि। मोबाइल चार्ज कराके दिन-रात बैट्री डाऊन कइला की चक्कर में पड़ल हवें। लैपटॉप भी बंटे लागल। गांव में बिजुलिया अइबे ना करी त मोबाइल आ लैपटॉप चार्ज कइसे होई। लक्ष्की लोग के साइकिल बंटाइल। चलावे लगली त माई-बाप से स्कूटी मांगे लगली। गरीब मेहरारू लोग के साड़ी मिली। बुजुर्ग लोग के कंबल मिली। सत्तर वर्ष की उम्र में भी चाचा लोग डाक्टरी पढ़इहें। लाभ त बहुत भइल,बहुत होई। बहुत विकास भइल। बहुत कुछ बाकी बा। सड़क की मामला में एतना पिछुआइल बानी जा की- ‘ सड़क बीच गड़हा है कि गड़हा बीच सड़क है कि सड़किये गड़हा है कि गड़हवे सड़क है’ टाइप के संदेहालंकार हो गइल बा। हाईबे के हाल तक बेहाल बा। जब टूटता कवनो ट्रक के गुल्ला त बहुत होत बा हल्ला-गुल्ला। लागत बा जाम त तेजी पर लाग जाता विराम। एक दिन के जाम दूसरा दिने खुलत बा। सड़क पर लुटावल धन कवना जन की कामे आइल। जमाना बहुत बदलल बा। लेकिन चित्त आ चिंतन उहे पुरनके बा। रोटी-दाल-बाजार के चिंता। देश बहुत तरक्की करत बा। केंद्र के होखे चाहे सूबा के, सरकार ‘ दोऊ हाथ उलिचिए यही सयानो काम’ की लाइन पर चलति बा। अब त संसद में हंटर भी चलत बा। सीमा पाकिस्तान आ चीन बढ़त आवत बा त हंटर उठते ना बा। रुपया लगातार गिरत बा। पहिले गांव-देहात में लरिका खेलावत में लोग कहत रहे- ‘
हेले हेले बबुआ, कुरुई में ढेबुआ’। ढेबुआ के जमाना त बीत गइल। रुपया के आइल लेकिन उ केतना किकुरल जाता। रुपये पर सब दबाव बा त किकुरबे करी। पहिले रुपया के डालर से दोस्ती रहल। अब फासला 68 के बा। हे रुपया! तूं और गिर जा। एतना गिर जा कि सड़क पर गिरल रहù त केहू उठावे के चाहत ना करे। चोरी-डकैती-लूट के डर समाप्त हो जा। हाथ के मैल होजा। रुपया गिरला से सबसे बड़ा फायदा ई होई की अमीर-गरीब के खाई स्वत: ही मिट जाई। जमाखोरी, घूसखोरी, हेराफेरी, धोखाधड़ी समाप्त हो जाई। आई येह कविता के अर्थ खोजल जा-
देश होता खोंखड़, घाव होता गहीर। खूब चिंचियाइल करीं, बनल लोग बहीर।।

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