"बाबागर्दी"की गुमान में मचल बा गर्दा गर्दा
मनबोध मास्टर पूछलें - बाबा! का हाल बा? बाबा बतवलें-हाल त बेहाल बा। बड़ा बवाल बा। तीरथराज प्रयाग में राजनीति के चकरगति भईल बा। हिन्दू एकता के बात करत- करत हिन्दू लोग ही दु फाड़ हो गईल। कुछ शंकराचार्य के समर्थन त कुछ सरकार के समर्थक। सनातन के अइसन उपहास सनातनी राज में ही देखे के मिलला पर बड़ा कष्ट होता। मौनी अमवस्या से लेके सात दिन में भगवा भिड़ंत की आपसी दम्भ और अहंकार में आस्था के अस्थि विसर्जन पर लागल संत समाज हिन्दू समाज के केतना भला करता? रउरा खुद देखीं। सनातन के नारा रहे - धर्म की जय हो। कवना धर्म के जय कईल जा? जवना धर्म में नियम कानून की मर्यादा के तोड़ल जाता । दूसरका नारा ह - अधर्म का नाश हो। सनातनी सरकार बा आ ब्रह्मचारी बालकन के चोटी उखाड़ के, लँगोटी खोल के पीटे वाला अधर्मी पर कार्रवाई नईखे होत त अधर्म के नाश कईसे होई? तीसरा नारा ह -प्राणियों में सदभावना हो। जब साधु ही साधु से लड़त बाड़न, एक दूसरा के नीचा दिखावला में लागल बाड़न त सद्भावना कहां रह गईल? विश्व के कल्याण के बात का होई ज़ब हिन्दू समाज में ही विघटन करे वाला कईगो कालनेमि दुनो ओर भेष बदल के छल खातिर आपन -आपन जाल बिछवले बाड़न। <br>माघ महोत्सव के पुण्य क्षेत्र में भगत प्राणी शांति खोजत बा। साधु संत लोग भी सादगी त्याग, सेलिब्रेटी सुख लुटता। मंचन से वैराग्य के प्रवचन करे वाला बाबा लोग अपने त राग से विरत ना होत हवें आ भोली भाली जनता के राग द्वेष से मुक्ति के प्रवचन देत हवन। साधु की अनुचित क्रोध से अनर्थ होता। अहंकार एतना प्रबल बा कि जीवन में पछतावा से अधिका कुछ हासिल ना होई। धर्मरक्षा की लड़ाई में उहो दौड़ल आके पीठ सुघरावता जवन अपनी समय में लाठी से पीठ लाल करा देले रहे। सच्चा इंसान के हृदय में क्षोभ बा। भगत धर्मसंकट पड़ल बा। कवना ओर से खड़ा होखल जा ज़ब दुनो ओर हमरे अराध्य हवन। एक तरफ क्रोधातुर वाणी त दूसरा तरफ क्रोधातुर व्यवहार बा। दुनो ओर हठ बा। जब केहू झुके के तैयार ही ना बा त भगत के दिल दुख के दरिया बहबे करी। प्रयागराज की घटना के सच्चा भगत ना अनुमोदन करत हवें ना प्रतिकार। रात में दुख दूना तब हो गईल जब कुछ नवहा बुलडोजर बाबा जिन्दावाद के नारा लगावत संत जी की शिविर पर चढ़ गईलेन। सीसीटीवी लागल बा, वीडियो वायरल बा। लेकिन वाह रे मेला प्रशासन! कहीं कानून तोड़ला पर टूट पड़लें आ कहीं अराजकता पर छूट करेलें।
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