गुरुवार, 15 मार्च 2012

तेरा पनिया मैं भरूं, मेरा भरे कहार

साधो ! पानी भरल एगो कला ह। एगो सेवा ह। एगो कर्तव्य ह। पानी पियावल पुन्य क काम ह। रमता जोगी आ बहता पानी के कहानी बहुते सुनले होखब सभे। पानी हम्मन के स्वच्छ राखे ला। मिजाज की ठंडई खातिर आ प्यास बुझावे खातिर पानी जरूरी ह। दूषित पानी से स्वास्थ के खतरा हो सकेला। पानीदार लोग ही पानी के महत्व समझ सकेलन। पानी भरला के अर्थ नौकरी -पेशा में भी बड़ा पवित्र बा। जमींदारी प्रथा में पानी भरे के काम ‘कहार’ करत रहलें। रेल में पानी पियावे वालन के ‘पानी पाड़े’ कहल गइल। देश-दुनिया में तमाम अइसन लोग भी नौकर हवें, जेकरा घर भी नौकर बाड़न।अइसने कुछ हालात पर कहल गइल-‘ तेरा पनिया मैं भरूं, मेरा भरे कहार।’ जमाना बदलला की साथ-साथ हम पानी के ना जाने कहां-कहां बहावत-गिरावत हई। पानी के महत्व पर ही रहीम दास जी कहलें- ‘पानी गये ना उबरे मोती मानुष चून’। हाल ही में संपन्न भइल विधान सभा चुनाव में मतदाता लोग कई प्रत्याशिन के पानी पिया दिहलें। प्रचार में राहुल भैया घाट-घाट के पानी पियलें। परिणाम निकरल त कांग्रेस पानी-पानी हो गइल। मैडम भी बहुत डूब के पानी पियली। चुनाव के ऐन वक्त पर दागदार मंत्रिन के बेपानी क के पार्टी से बाहर क दिहली। अपने सत्ता से बाहर हो गइली। आपन सिंहासन गइल त फरमान सुना दिहली कि नगर निकाय में पार्टी के कवनो कार्यकत्र्ता चुनाव ना लड़िहन। अब बड़े-बड़े पानीदार लोग जवन सपना सजा के तैयारी करत रहलें, कहत हवें-‘हेलल भंइसिया पानी में’। बहन जी दिल्ली जायेके तैयारी क दिहली। राज्य सभा के पर्चा भरि दिहली। भैया जी पानी देत हवें कि अगर लखनऊ रहि के हम्मे घेरती त बढ़िया रहत। भैया जी! आज शपथ ले ल। पांच साल में तोहरो पानी थहा जाई। चुनाव में जवन वादा कइलù अब निभावù पानी पी-पी के। काल्हि से बोर्ड के परीक्षा शुरू होखे जात बा, तोहरी पानीदार व्यवस्था के भी पोल खुल जाई। नकल पर नकेल लागी कि अपटे पाटी। पानी की येह कहानी की साथे हमार कुछ कवित्तई भी पानी अस बहि गइल
ते रा पनिया मैं भरूं, मेरा भरे कहार।
 आंख खोल के देख लें, यही जगत व्यवहार।।
 भत्ता के भूखे भये, सबहि बेरोजगार।
 पंजीकरण में याद नानी, कितना देगी सरकार।।
 भैया सीएम हो गये, बहन दिल्ली की राह।
 समय की गति नापते, कोई ना पाये थाह।।
 मंत्रिमंडल बन रहा, नवहन की तीर।
 अंदर अंदर सुलग रही, बुढवन के भीतर पीर।।
 शासन सत्ता बदल गई, कहीं हो ना व्यवस्था फेल।
 कल से ही दिख जायेगा, कैसे नकल नकेल।।
 - नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती का यह व्यंग्य राष्ट्रीय सहारा के १५ मार्च २०१२ के अंक में प्रकाशित है .

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